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मैसूर और राजकोट (२)

गत प्रविष्टी से आगे :  काका ने पूछा , ‘यानी कैसे ?’

मैंने कहा , ‘ वुड्रो विल्सन प्रथम महायुद्ध के बाद जब इंग्लैंड गये , तब उनका वहाँ अभूतपूर्व स्वागत हुआ और जगह-जगह सम्मान किया गया । इस स्वागत के बहाव में अपने चौदह मुद्दे विल्सन भूल गये , यह आपने ही मुझे बताया था न ? वैसे यहाँ आपका भव्य स्वागत हो रहा है । लेकिन यहाँ आप जाँच करने आये हैं , यह मत भूलिएगा। ‘

    काका ने कहा ,’ वा रे वाह , तू तो अब मेरा सलाहकार बन गया । ‘

    लेकिन सचमुच काका ने मेरी सलाह मानी। उसके बाद उन्होंने मैसूर राज्य के गुण-दोषों का वर्णन मुझसे नहीं किया । चुपचाप सब देखते गये । पूरे राज्य में घूमने का उनका कार्यक्रम बनाया गया। आम सभाओं में , जेलों में , व्यक्तिगत तथा जाहिर मुलाकातों में , सरकारी अफसरों की उपस्थिति में और उनके प्रतिप्रश्नों के जवाब में अत्याचारों की जो कहानियाँ सुनाई गयीं ,वे शरीर कँपा देने वाली थीं । मुझे तो तभी मलूम हुआ कि भारत के स्वराज्य-आन्दोलन की तुलना में रियासतों के जिम्मेवार शासन-तंत्र के लिए चलाये गये ये आन्दोलन कितने अधिक कष्टप्रद और कठिन थे । स्वराज्य के आन्दोलन में एक आधुनिक सरकार से लड़ाई थी । उसको कानून और न्याय का कम-सेकम दिखावा तो करना ही पड़ता था। लेकिन रियासतों में तो राज्य चाहे जितना सुधरा हुआ हो , फिर भी वहाँ की राज्यसंस्था तो मध्ययुगीन ही थी । मैसूर जैसे प्रगतिशील राज्य में भी पुलिस अत्याचारों के वीभत्स प्रकार लोगों ने हमारे सामने बयान किये। कैदियों के मुँह मे जबरदस्ती पेशाब डालने की शिकायत तो सुनी हुई अन्य शिकायतों की तुलना में बहुत मामूली कही जाएगी । यह सब बातें सुनकर काका का पुण्यप्रकोप उग्र होता गया । गेरसप्पा का प्रपात देखने के लिए मेरे अकेले जाने की व्यवस्था की गयी थी ।लेकिन स्थानीय कार्यकर्ताओं ने आग्रह करके काका को भी साथ ले लिया । वहाँ हमने प्रकृति के इस अद्वितीय सौन्दर्य के साथ वहाँ की जनता की कमाल की दरिद्रता भी देखी । सब जगह घूमकर वापस आने पर मिर्जा साहब से काका की फिर लम्बी बातचीत हुई । इस समय मिर्जा साहब के घर भोजन का निमंत्रण भी हमें मिला। लेकिन इतने दिनों में राज्य में जो देखा और सुना , वह काका की आँखों से ओझल नहीं होता था । आखिर के दिन बँगलोर में जाहिर सभा हुई । अपनी जाँच के सम्बन्ध में काका कुछ कहनेवाले नहीं थे , क्योंकि उन्हें तो अपनी रिपोर्ट बापू के पास देनी थी । फिर भी काका ने उस सभा में इतना जिक्र तो किया ही , ‘ मैंने आपका यह सुन्दर राज्य देखा है और इस राज्य में हुए भयंकर अत्याचारों की कहानियाँ भी सुनी हैं। जिसे दुनिया का आश्चर्य कहा जाएगा , ऐसा यहाँ का का गेरसप्पा का प्रपात भी देखा । साथ – साथ यह भी देखा कि वहाँ के गरीब लोग अपनी कमर में रस्सी बाँधकर उस प्रपात के पीछे कबूतरों द्वारा जमा करके रखे हुए अनाज में से कुछ दाने प्राप्त करके पेट की आग बुझाने की कोशिश में जान जोखिम में डालकर नीचे उतरते हैं । जिस राज्य में इतनी गरीबी है, उसको कैसे प्रगतिशील कहा जाय, समझ में नहीं आता । ‘

    वर्धा पहुँचने के बाद पता चला कि इस जाहिर सभा का काका का भाषण दीवान साहब को जरा भी अच्छा नहीं लगा था । बापू के साथ के अपने पत्र-व्यवहार में उन्होंने कहा कि महादेवभाई की यात्रा एकतरफा हुई । लेकिन बापू ने काका की रिपोर्ट को ही ठीक माना । बाद में यह भी सुना कि मैसूर राज्य के अत्याचारों में जो अधिकारी कुप्रसिद्ध हुए थे , उनको दीवान साहब ने नौकरी से हटाया था ।

    रियासतों के संग्राम में बापू का सीधा सम्बन्ध आया राजकोट में । इस संग्राम में कस्तूरबा ने पहले प्रवेश किया। उन्होंने वृद्धावस्था में और कमजोरी की हालत में राजकोट राज्य की जेलयात्रा भी की । बापू नी राजकोट में दो बार अनशन किया ।सरदार तो पूरे आन्दोलन को मार्गदर्शन दे ही रहे थे । उस समय अस्वस्थ होने के कारण काका दिल्ली में थे । वहाँ रहते हुए भी राजकोट के आन्दोलन का कुछ काम उनके जिम्मे आ ही जाता था।बीच में राजकोट का मामला उस समय के भारत के मुख्य न्यायाधीश स मॊरिस ग्वायर को सुपुर्द किया गया था । उनसे मिलने और मामले की सारी बातें समझाने काका गये थे । ग्वायर का फैसला सम्पूर्ण रूप से प्रजा की तरफ़ का हुआ । स्वाभाविक ही सारी प्रजा में आनन्द की लहर दौड़ गयी । लेकिन उस समय के दीवान श्रीवीरावाला टस से मस न हुए । बापू से उन्होंने पूछा, ‘ आपको मेरे साथ बातचीत करनी है या ग्वायर के फैसले की धौंस बतानी है ? ‘ बापू की सूक्ष्म अहिंसा ने प्रतिपक्षी की यह दलील तुरंत मान ली । उन्होंने जाहिर किया कि ग्वायर के फैसले के आधार पर मैं किसी का हृदय-परिवर्तन नहीं कर सकता। मुझे तो ऐसे किसी फैसले का आधार लिए बिना ही दीवान साहब या ठाकुर साहब के साथ बातचीत करनी चाहिए । उन्होंने ग्वायर के फैसले का आधार छोड़ दिया । राज्य की प्रजा को और भारत की जनता को बापू की यह बात समझने में थोड़ी देर लगी । उनको लगा कि हाथ में आई बाजी बापू मुफ्त में खो रहे हैं । लेकिन बापू के मन में राजकोट के मामले का तुरंत निपटारा करने की अपेक्षा अपने अहिंसा के प्रयोग को विशुद्ध रखने का मह्त्व अधिक था । इसीलिए वे ग्वायर-फैसले के बाहरी दबाव को सत्याग्रह के बीच में लाना पसन्द नहीं करते थे । बापू के लिए वह साधन-शुद्धि का प्रश्न था । सिद्धि साधक के हाथ की चीज नहीं होती,वह परमेश्वर के हाथ में होती है , लेकिन साधन तो साधक के हाथ की चीज है । इसलिए साधक को उसीका आग्रह रखना चाहिए । साधन के आग्रह के खातिर हाथ में आये हुए साध्य को छोड़ देने का यह एक अनोखा उदाहरण था । देश के कई राजनीतिज्ञों को बापू के इस कदम में राजनीतिक बुद्धिमत्ता की कमी दिखाई दी । बापू के इस कदम के कारण राजकोट के आन्दोलन को तुरंत सफलता प्राप्त नहीं हो सकी, यह कबूल करना होगा । लेकिन बापू के इस निर्णय के कारण रियासतों के आन्दोलनों में एक नया आयाम दाखिल हुआ ।देश के कोने-कोने में पहिले देशी राज्यों की जागृत हो रही प्रजा के नताओं के ध्यान में एक बात आ गयी कि उन्हें यदि बापू के नेतृत्व को स्वीकारना हो तो अपने आन्दोलनों को सुवर्ण के समान शुद्ध ही रखना पड़ेगा ।राजकोट की लड़ाइ तो आखिर सफल ही होने वाली थी । इतिहास के जिस जोरदार प्रवाह में ब्रिटिश सल्तनत टिक नहीं सकी , वहाँ बेचारे वीरावाला का साहस ही क्या था ? लेकिन बापू के इस कदम के कारण देश के समूचे आन्दोलन को सात्विकता का स्पर्श हुआ । राष्ट्र के चरित्र-निर्माण में बापू की यह अनोखी देन थी ।

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