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बापू की गोद में (१४) : मैसूर और राजकोट

    रियासतों में जिम्मेवार शासनतंत्र के लिए जो संग्राम चल रहे थे, वे भारत के स्वराज्य – आन्दोलन के ही अंग थे । लेकिन बापू ने खुद उस आन्दोलन में शरीक न होने और राष्ट्रीय महासभा को भी उससे अलग रखने की नीति दीर्घकाल तक अपनायी थी । इसी नीति में से दो अच्छे परिणाम निकले। एक यह कि कांग्रेस को एकाग्रता से ब्रिटिश-सरकार के साथ लड़ने में अपनी सारी शक्ति लगाने का मौका मिला और दूसरा यह कि अनेक रियासतों में लोगों ने अपनी-अपनी परिस्थिति के अनुसार अलग – अलग प्रकार के आन्दोलन चलाये और स्थानीय नेतृत्व का विकास हुआ । स्वराज्य के बाद सरदार की जादू की छड़ी से सैंकड़ों रियासतें भारत के साथ आसानी से विलीन हो गयीं । इस घटना के अनेक कारणों में से एक कारण यह भी था कि करीब सभी प्रमुख रियासतों में जन-आन्दोलन हो चुके थे और वहाँ के नेताओं के साथ सरदार का प्रत्यक्ष या परोक्ष सम्बन्ध रहा था ।

    रियासतों के इन आन्दोलनों से बिलकुल अलिप्त रहना बापू के लिए संभव नहीं था। वैसे अलिप्त रहने की उन्होंने प्रतिज्ञा भी नहीं ली थी । कई र्यासतों के नेता सलाह और नैतिक मार्गदर्शन के लिए बापू के पास आते थे। संकट के समय उनका सहारा भी तो बापू ही थे ।

    मैसूर राज्य में जिम्मेवार शासन-तंत्र के आन्दोलन के समय जब प्रजा पर सरकार की ओर से अत्याचार किये गये, तब वहाँ के नेता बापू के पास दौड़कर आय्र । मैसूर रियासत भारत की सब रियासतों में आगे थी। वहाँ मिर्जा इस्माइल जैसे कुशल दीवान थे । वे इन अत्याचार की कहानियों को क्यों कबूल करते ? उन्होंने बापू से कहा कि ‘ आप खुद ही आकर परिस्थिति की जाँच कीजिए।’ बापू ने जाँच के लिए काका को भेजा।उनके टाइपिस्ट के तौर पर मैं उनके साथ गया ।

    बँगलोर स्टेशन पर दो-तीन मोटर गाड़ियाँ हमें लेने के लिए आयी थीं। एक गाड़ी में के.सी. रेड्डी , एच.सी. दासप्पा,भाष्यम,ऐय्यंगार आदि वहाँ के नेता थे। दूसरी गाड़ी सरकार की ओर से आयी थी। दीवान के प्रतिनिधि ने कहा कि ‘ आप लोग राज्य के अतिथि हैं,इसलिए आपके ठहरने की व्यवस्था राज्य के अतिथिगृह में की गयी है।’

    भारत के सबसे प्रथम श्रेणी के इस राज्य के अतिथिगृह मे सुख-सुविधाओं की क्या कमी! फिर बँगलोर एक अत्यन्त रमणीय नगरी थी। हमारे कमरे फूलदानियों से सुशोभित किये हुए थे। खाने-पीने में भी कोई कसर नहीं थी।यह सब देखकर सौन्दर्योपासक काका बड़े खुश हो रहे थे।पहले दिन ही दीवन के साथ लम्बी बातचीत हुई।मिर्जा साहब की बातों का काका के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा,ऐसा मुझे लगा।दो[पहर की कॊफ़ी पीते-पीते काका मैसूर राज्य की प्रगति का गुणगान मेरे पास करने लगे। सब सुन लेने के बाद मैंने गम्भीर मुखाकृति से कहा,’काका आपकी हालत भी वुड्रो विल्सन जैसी होगी,ऐसा लग रहा है।’ (जारी)

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