मोहन और महादेव : बापू की गोद में (१२)

    बापू के पास आने के बाद इक्कीस वर्षों में काका ने दो बार छुट्टी ली थी । पहली बार टाइफाइड हो जाने पर और दूसरी बार ब्लडप्रेशर ( रक्तचाप ) बढ़ जाने पर । काका के पिताजी का देहान्त हुआ , तब भी काका का काम जारी ही था । इक्कीस साल के बाद की बीमारी में बाकायदा छुट्टी लेकर काका आराम करने शिमला गए । इसके बाद की तीसरी बीमारी में तो वे सदा के लिए छुट्टी मनाने चले गए । इन दो अपवादों को छोड़ कर पचीस वर्षों में काका ने एक भी रविवार , दीवाली , होली या गरमी की छुट्टी नहीं ली थी ।

    सन १९३८ में जब मगनवाड़ी में रहते थे , तब काका का रक्तचाप बढ़ गया था । बीच – बीच में चक्कर आने लगे थे । इसका प्रमुख कारण था वर्धा की कड़ी गरमी । धूप में काका रोज वर्धा से सेवाग्राम पैदल आते – जाते थे ।कभी – कभी तो दो बार आना – जाना हो जाता था । २२ मील की पैदल यात्रा हो जाती थी ! वर्धा में गरमी के मौसम में ११५ से १२० डिग्री (फ़ैरन्हाइट) तक तापमान हो जाता है ।

    इतने परिश्रम के बाद बापू के काम का बोझा तो काका ही ढो सकते थे । पिचले दस – पन्द्रह वर्षों में मैंने काका को हर रोज पन्द्रह घण्टे से कम काम करते नहीं देखा था । जब हम मगनवाड़ी से सेवाग्राम रहने गये , तब वर्धा से सेवाग्राम जाने – आने का श्रम बच गया । लेकिन उतने घण्टों का काम बढ़ गया । दिनभर करके रात को सोने से पहले कोई-न-कोई पुस्तक पढ़ने की काका की आदत थी । वाचन के सम्बन्ध में वे हमेशा अद्यतन रहते थे । एक वालजीभाई देसाई और दूसरे प्यारेलालजी को छोड़कर बापू के आश्रम में काका से अधिक पढ़नेवाला कोई नहीं था ।

    काका को आम तौर पर जो काम करने पड़ते थे , उनमें मुख्य रूप से रोज की डाक देखकर बहुत सारे पत्रों का जवाब लिखना , बापू  से मिलने आनेवालों के साथ पहले बात करके बापू का समय बचाना , मुलाकातों की रिपोर्ट लिखना , ‘हरिजन’ साप्ताहिक के लिए लेख लिखना या अनुवाद करना , ये काम थे । हर रोज के इन कामों के अलावा कभी कोई पुस्तक लिखना , दैनिक समाचार – पत्रों के लिए बीच – बीच में लेख लिख कर देना , या सभाओं में भाषण के लिए जाना इत्यादि अतिरिक्त काम माने जायेंगे ।

    बापू के साथ काम का प्रमाण भी असाधारण था । इतने सारे काम काका कैसे कर पाते थे , यह एक बड़े आश्चर्य का विषय था। मुझे लगता है कि बापू और काका के बीच जो असाधारन एकात्मता सध गयी थी , उसी कारण यह बन पाता था । इस सम्बन्ध में दास्यभक्ति और सख्यभक्ति के लक्षणों का अजीब मेल था । सन १९१५ में पहली बार काका बापू से मिलने अहमदाबाद के पास के कोचरब – आश्रम में गये , तब काका की लिखी हुई सामग्री को देखकर बापू ने कहा , ‘तुम्हारा स्थान तो मेरे ही पास है।’ उस दिन एलिस ब्रिज पर से वापस आते समय काका ने स्व. नरहरिभाई परीख से कहा , ‘सारी जिन्दगी किसीके चरणों के पास बैठकर बिताना चाहूँ तो इस पुरुष के पास बिताऊँ ऐसा लगता है।’ प्रथम दृष्टिभेट में जो तारा-मैत्रक का नाता बँध गया , उसका धीरे – धीरे परिपाक एकात्मता में हो गया ।

     काका का व्यक्तिमत्व बापू से एकदम अलग और स्वतंत्र था । बापू का विभूतिमत्व प्रखर सूर्य जैसा था , तो काका का चन्द्रमा के जैसा शीतल था । बापू अनास्क्त कर्मयोगी थे तो काका रसिक भक्त , बापू हिमालय की तरह ऊँचे और उज्जवल थे तो काका गंगा के समान करुणा से भरे थे । इतना भिन्न व्यक्तिमत्व होते हुए भी दोनों में अजीब आत्मिक अभिन्नता थी ।

    कुछ उदाहरण लीजिए । साहित्य की दृष्टि से देखा जाए तो बापू यथार्थवादी थे , शब्दलाघव में सम्राट थे । एक शब्द से काम चलता हो तो दो शब्दों का उपयोग न करनेवाले । काका थे स्वैर विहार करने वाले । समुचित अलंकारयुक्त रसमय शैली से लिखनेवाले । फिर भी लेखों में बापू की शैली को काका ने ठीक आत्मसात किया था । ‘हरिजन’ या ‘हरिजन बंधु’ के कई पाठकों के पत्र आते थे कि लेख के अन्त में एम. के. जी. (मो. क. गां. ) या एम. डी. (म.दे.) अक्षर पढ़ने तक पता ही नहीं चलता था कि लेख बापू का है या महादेवभाई का । ‘हरिजन’ पत्र में जो भी काका लिखते , वह बापू को बताये बिना प्रेस में नहीं भेजते थे । बापू भी उन लेखों को बारीकी से पढ़ते और आवश्यक सुधार भी करते थे । लेकिन कई बार ऐसा होता कि काका लिखा हुआ लेख बापू के देखने के लिए रखा हो , उसे पढ़ कर बापू अपना हस्ताक्षर कर देते और वह लेख बापू का बन जाता ।

सन १९४२ के आन्दोलन के पूर्व इस प्रकार के एक लेख ‘एन अपील टु एव्री ब्रिटन’ (An appeal to every Briton ) था और शायद ‘ एन अपील टु एवरी जापानीज़ ‘ ( An appeal to every Japanese ) भी ऐसा ही लेख था ।

    बापू के साथ चर्चा में अधिक समय नष्ट न हो , इस दृष्टि से राजाजी , भूलाभाई और कभी- कभी जवाहरलालजी भी काका के साथ चर्चा करके बहुत सारा काम निपटा लेते थे ।उन दिनों सरदार का ट्रंक काल न आया हो , ऐसा शायद ही कोई दिन जाता था। ‘क्यों? बुड्ढा क्या कहता है ? इस वाक्य से बात शुरु होती थी और पूरे छह मिनट तक चलती थी ।

    काका शीघ्र-लिपि नहीं जानते थे,लेकिन उनकी लिखने की गति असामान्य थी । कई शब्द वे संक्षेप में लिखते थे , लेकिन बापू के मुँह से निकला एक भी शब्द भी वे छोड़ते नहीं थे ।एक बार बापू से चर्चा करने के लिए कुछ अमरीकी मित्र आये थे । काका अपने ढंग से उस चर्चा का नोट ले रहे थे । अमरीकी मित्रों में से एक बहन शीघ्रलिपि में लिख रही थी। दूसरे दिन काका और वह बहन अपनी – अपनी रिपोर्ट एक-दूसरे सेमिलान करने लगे । काका का नोट देखकर वह बहन बोली,’आपने तो मुझे बिलकुल हरा दिया – ‘ Yousimply beat me hollow !’

    बापू के भाषणों की रिपोर्ट लिखते समय काका को सिर्फ बापू जो बोलते थे , उतना ही नहीं लिखना होता था । बापू का भाषण अक्सर सिलसिलेवार या व्यवस्थित नहीं रहता था। उनके भाषण में सहजता होती थी , लेकिन क्रमबद्धता नहीं होती थी । काका भाषण की रिपोर्ट लिखते समय उसको ठीक कर लिया करते थे । फैजपुर-कांग्रेस के समय बापू के हिन्दी भाषण को काका ने सीधे प्रेस-टेलिग्राम फार्म पर अंग्रेजी में ही लिख लिया,ताकि भाषण समाप्त होते ही उसे प्रेस के लिए रिलीज किया जा सके।कभी-कभी तो बापू के निकट के साथी भी बापू ने भाषण में क्या कहा , यह स्पष्ट रूप से नहीं बता सकते थे । ‘ महादेवभाई की रिपोर्ट आयेगी,तब पढ़ लेंगे ।’ऐसा कहकर सन्तोष मान लेते थे ।

    इस तादात्म्य की कल्पना सबको नहीं आ सकती थी। एक बार एक पंजाबी भई बापू से मिलना चाहते थे । उनके साथ बात करके काका ने उस भाई से कहा कि ‘अब आपको बापू से मिलने की आवश्यकता नहीं है ।’ लेकिन उस भाई को सन्तोष नहीं हुआ।दुबारा काका से चर्चा करके वह वापस चला गया ।लेकिन जाते-जाते आश्रमवालों को सुनाकर गया कि ‘ मैं महादेवभाई को जरूर गोली से मार दूँगा ।’ यह सुनकर मेरी माँ घबड़ा गयी , लेकिन काका ठहाका मार कर हँसने लगे ।

    एक बार बापू और काका की एकात्मता का एक अजीब प्रसंग देखा।बापू अपनी कुटी के सामने खड़े थे। काका के साथ कुछ बात हो रही थी। इतने में उनको कुछ लिखने की याद आयी । काका से कहा,’महादेव,लिखो।’ काका ने वहीं खड़े-खड़े लिखना शुरु किया। बापू बोलते गए और काका लिखते गए। मैं बगल में खड़ा देख रहा था । कुछ देर बाद् बापू के बोलने की गति से काका की लिखने की गति तेज हो गयी,यानी आगे बापू क्या बोलेंगे,इसका अनुमान लगाकर काका ने उसे पहले ही लिख दिया । बीच में बापू ने एक ऐसा शब्द कहा, जो काका ने लिखा नहीं था,तो काका ने बापू को रोककर कहा,’बापू,जरा ठहरिए। मैंने इस जगह पर दूसरा ही शब्द लिखा ह्दिया था,आपने इस शब्द का प्रयोग क्यों किया?’ बापू एक क्षण के लिए विचार में पड़े।लेकिन वे भी शब्दों के बारे में बड़े आग्रही थे।’महादेव,तुमने यह शब्द लिखा ही कैसे?मेरे मुँह से तो वही शब्द निकला,जो मैंने तुमको लिखाया ।’

    पत्र लिखाने में जितना समय गया,उससे कहीं अधिक समय उस चर्चा में गया कि बापू की भाषा में कौनसा शब्द ठीक बैठता है। जहाँ तक मुझे स्मरण है,शब्द बापू का ही रखा गया। लेकिन महादेव के लिखे शब्द में भी सार है,यह बापू के स्वीकार करने के बाद ही ।

 

   

1 टिप्पणी

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  1. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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