नयी तालीम का जन्म : बापू की गोद में (७)

राष्ट्र – जीवन के धड़कनों के साथ यदि आपका व्यक्तिगत जीवन भी धड़कता हो तो एक अपूर्व भाग्य ही माना जाएगा . मुझे यह भाग्य प्राप्त हुआ था . गांधीजी ने दुनिया को एक के बाद एक जो नयी देनें दीं , उनमें नयी तालीम एक अमूल्य रत्न माना जाएगा . नयी तालीम का विकास और मेरी पढ़ाई की व्यवस्था एक ही समय हुई ,  यह एक विचित्र संयोग था .

    प्रसंग निजी था , लेकिन उसका महत्त्व सार्वजनिक था . कई वर्षों में हम सब परिवार की तरह एक साथ नहीं रह पाये थे . काका या तो जेल में या सफ़र में रहते थे . १९३२ में माँ भी जेल चली गयीं . तब हमारी स्थिति ‘ कहाँ चन्दन और कहाँ मलयागिरि ‘ की तरह हुई . बापू वर्धा से सेगाँव रहने गये . तब डाक और मेहमानों की व्यवस्था के लिए काका वर्धा में ही मगनवाड़ी में ठहर गये .  कुछ स्थिरता से रहना होगा , ऐसा मानकर काका ने हम लोगों को साबरमती से वर्धा बुला लिया . यह तक किया था कि वर्धा में रहेंगे और मुझे किसी अच्छे स्कूल में दाखिल कराया जाएगा . स्व, जमनालाल बजाज की प्रेरणा से उन दिनों वर्धा में ‘मारवाड़ी विद्यालय ‘ चल रहा था .उसीका नाम आगे चल कर ‘नवभारत विद्यालय ‘  रखा गया था . इस स्कूल में मुझे भेजा गया . शान्ति – निकेतन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर के पास काम किये हुए स्व. ई.डब्ल्यू. आर्यनायकम उन्हीं दिनों बापू के पास नये – नये पहुँचे थे और विद्यालय में आचार्य – पद पर काम करने लगे थे .

    एक भाई मुझे विद्यालय में छोड़ आए . गुजरात विद्यापीठ के विनय मन्दिर की पाँचवीं कक्षा पूरी करके वहाँ मैं छठी में गया था , लेकिन यहाँ मुझे सातवीं में दाखिल किया गया यह समझकर कि उसमें मैं साथ चल सकूँगा . बस, यहीं दिक्कतें प्रारम्भ हुईं . गुजरात – विद्यापीठ में मैं हिन्दी भाषा में आगे था . लेकिन यहाँ की हिन्दी कुछ अटपटी लगी . फिर यहाँ के शिक्षक के अंग्रेजी के उच्चारण समझ ही नही पाता था . भूगोल मेरा प्रिय विषय था . लेकिन यहाँ के शिक्षकों ने भूगोल के जितने प्रश्न पूछे , उनमें से एक का भी जवाब मैं सही नहीं दे पाया . मैंने भारत का भूगोल सीखा था . यहाँ प्रश्न पूछा गया था दक्षिण अमेरिका के किसी देश का . क्लास में कुछ समझ में नहीं आता था , यह मुख्य नहीं थी . वास्तव में कठिनाई दूसरी ही थी . स्कूल के वातावरण से थोड़े ही समय में मेरा दम घुटने लगा . वर्ग – शिक्षक के कक्षा में आते ही सारे विद्यार्थी खड़े हो गये . पाठशाला के विनय का यह प्राथमिक पाठ मैं सीखा ही नहीं था . मुझे उसमें गुलामी की गन्ध आयी . गरमी की छुट्टी के बाद स्कूल खुला था , इसलिए छुट्टी के दिन कैसे बिताये , यह वर्ग – शिक्षक हरएक से पूछ रहे थे . उसमें शिक्षक कुछ – कुछ विनोद भी करने लगे . यहाँ तक तो ठीक था . लेकिन १२ – १३ साल के बच्चों के साथ पूरा समय उन्होंने विवाह और तत्सम्बन्धी मजाक की बातें करने में बिताया , यह बात मेरे गले नहीं उतरी . क्लास पूरा होने पर बाहर आया , तो करीब – करीब हर शिक्षक के मुँह में बीड़ी ! अधिकतर शिक्षकों के बदन पर खादी भी नहीं थी . बिना खादी के लोग उन दिनों मुझे किसी दूसरी ही बिरादरी के लगते थे . काका के पास घर लौटने पर पहले तो मैं रो ही दिया और फिर अपना निर्णय जाहिर करते हुए कहा , ‘कुछ भी हो ऐसे स्कूल में तो कभी नहीं पढ़ूँगा .’ काका ने मुझे समझाने की कोशिश की . लेकिन उनके समझाने में उत्साह दिखाई नहीं दिया . पाठशाला का जो वर्णन मैंने उनको सुनाया , उससे उनका उत्साह भी ठण्डा पड़ गया था . उन्होंने अन्त में कहा , ‘ देख तू बापू को यह सब लिख कर बता दे और वे कहें उसके अनुसार निर्णय कर .’ मैंने बापू को पत्र लिखा . उन्होंने बात करने के लिए मुझे सेगाँव बुलाया .

    इस बीच आर्यनायकमजी के पास इस स्कूल में न पढ़ने के मेरे निर्णय की खबर पहुँची . उन्होंने काका से कहा , ‘ बाबला अभी खेलकूद की उम्र का है , इसलिए स्कूल में न जाने का बहाना बना रहा है . मैंने अभी – अभी पाठशाला का चार्ज सँभाला है , तो थोड़े ही दिनों में वातावरण सुधार दूँगा . आज वह स्कूल में नहीं जायगा , तो आश्रम के दूसरे बच्चों की तरह पछतायेगा और आपको ही दोष देने लगेगा .’

    बापू के साथ बात करने आर्यनायकमजी भी सेवाग्राम पहुँचे . घूमते समय बापू की एक ओर मैं और दूसरी ओर आर्यनायकमजी उनकी लकड़ी बनकर चलने लगे . आर्यनायकमजी के साथ बापू की कुछ देर बातें हुईं . तब मैंने बापू से कह दिया , ‘वे विद्वान हैं . उनकी दलीलों का ठीक – ठीक जवाब तो मैं नहीं नहीं दे सकूँगा , लेकिन स्कूल में न जाने का मेरा निर्णय पक्का है .’

    बापू ने मेरी पीठ थपथपाकर कहा , ‘ बस, मुझे तो तेरा यही निश्चय चाहिए . अब तेरा वकील बनकर मैं आर्यनायकमजी को समझा दूँगा . ‘

    इसके बाद की चर्चा में मैं केवल साक्षी बनकर रहा . आर्यनायकमजी की दलीलें सुन लेने के बाद बापू ने कहा , ‘ इस तरह के शिक्षण को त मैं शिक्षण मानने को तैयार नहीं हूँ . किसी भी बच्चे को मैं ऐसे स्कूल में जाने की सलाह नहीं दूँगा . फिर बाबला तो आश्रम का लड़का है और इस स्कूल में न जाने का उसने निश्चय कर लिया है . तो फिर मुझे और अच्छे शिक्षाशास्त्री के नाते आपसे भी इस स्कूल में जाने के लिए उससे कैसे कहा जाय ? ‘

    आर्यनायकमजी की दलीलें बाद में कई दिनों तक चलती रहीं . इस चर्चा का परिणाम यह निकला कि थोड़े ही दिनों में बापू ने नायकमजी को भी नवभारत विद्यालय से छुड़ा कर अपने पास बुला लिया .

    उन दिनों कांग्रेस के मन्त्रिमण्डल प्रदेशों में बन चुके थे . कांग्रेस सरकारें सोच रही थीं कि शिक्षा में क्या परिवर्तन किया जाय . भारत की शिक्षा – प्रणाली सिर्फ किताबी तो होनी ही नहीं चाहिए , प्रत्यक्ष उद्योग के साथ वह जुड़ी होनी चाहिए . इतना ही नहीं , बल्कि उस शिक्षण में से ही पाठशाला का खर्च निकल आना चाहिए , इत्यादि विचार बापू ‘ हरिजन ‘ पत्र में प्रस्तुत करने लगे थे . इन विचारों के पीछे बापू का जीवनभर का अनुभव , गहरा चिन्तन और दीर्घ दृष्टि थी . एक वर्ष के विचार – मंथन के बाद ‘नयी तालीम शिक्षा – पद्धति’ सामने आयी , जिसका दुनियाभर के शिक्षा-विशेषज्ञों ने उत्तम पद्धति के तौर पर स्वागत किया है .

    बापू की खूबी यह कि उन्होंने इस शिक्षा – पद्धति का प्रयोग अपनी संस्था में करने के लिए आर्यनायकम-दंपति को पकड़ा और आज ये दोनों नयी तालीम शिक्षा – प्रणाली के विश्वविख्यात आचार्य बने हैं . [श्री आर्यनायकमजी अब जीवित नहीं है . श्रीमती आशादेवी आर्यनायकम यह कार्य चला रही थीं,वह भी अब जीवित नहीं हैं .]

    चालू विद्यालय में न पढ़ने का मेरा निर्णय तो स्वीकृत हो गया , लेकिन प्रश्न यह था कि अब मेरी पढ़ाई कहाँ और कैसी हो ? मुझे कैसे सूझा पता नहीं, लेकिन मैंने बापू से कह दिया , ‘ आपके साथ रहूँगा , आपका काम करूँगा , और उसमें से जो सीखने को मिलेगा , सीखूँगा . ‘

    बापू ने मेरे इस विचार को भी मेरे वकील की तरह उठा लिया . उनकी चर्चाओं में से ही शायद यह विचार सूझा होगा , ऐसा आज मुझे लगता है .

    कौन – सा काम ? कौन – सी पढ़ाई ? किस तरह की शिक्षा ? इन सब प्रश्नों का उत्तर उसी समय कैसे मिल सकता था ! लेकिन बापू ने यह फैसला किया कि ‘ बाबला महादेव के साथ रहेगा , महादेव सौंपे वह काम करेगा और वह जो पढ़ायेगा सो पढ़ेगा . ‘

    महात्मा के मन्त्री को ‘ पीर , बबर्ची ,भिस्ती,खर’ तो बनना ही पड़ता है . लेकिन अपने बच्चे का पूरे समय का शिक्षक बनने की जिम्मेवारी भी उसके सिर पर आयी .

    काका ने यह जिम्मेवारी तो उठा ली , लेकिन साथ ही मुझसे कहा , ‘ देख बाबला , आश्रम के अनेक लड़कों को आश्रम की पढ़ाई से असंतोष था और वे अंग्रेजी पढ़ने के लिए आश्रम छोड़कर गये , यह तू जानता है . तेरे सामने अनेक उदाहरण हैं . अपनी ओर से मैं इतना कह देता हूँ कि तुझे चाहे जब , जिस उम्र में भी , बाहर का चालू शिक्षण प्राप्त करने के लिए जाने की इच्छा हो जाए , तो मन में यह संकोच नहीं करना कि मैंने ही निश्चय किया था तो मैं ही उसे कैसे तोड़ूँ . तुझे निश्चय करने का अधिकार है तो उसे बदलने का भी अधिकार है . तू यदि चालू शिक्षण लेने के लिए गया तो मैं बाधक नहीं बनूँगा . इतना ही नहीं , बल्कि यथासम्भव सारी सहूलियत उसके लिए कर दूँगा . साथ ही आज के तेरे निश्चय को डिगाने का प्रयास भी मैं अपनी ओर से नहीं करूँगा . मेरे साथ रहकर तेरी जितनी पढ़ाई हो सकती है , उतनी कराने का प्रयत्न करूँगा . लेकिन मुख्यतया तुझे ही अपनी शिक्षा प्राप्त करनी होगी . मेरी मदद रहेगी , मेहनत तुझे करनी होगी . ‘

    इस दिन से मेरी पढ़ाई का नयी तालीम की राष्ट्रीय धारा के साथ संगम हो गया .

1 टिप्पणी

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One response to “नयी तालीम का जन्म : बापू की गोद में (७)

  1. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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