स्नेह और अनुशासन ( २ )

[ बापू का अनशन तो उनके शरीर और मन को निचोड़ ही देता था . बापू के आखिर – आखिर के कुछ उपवासों के समय खाना छोड़ने के कारण बापू का जितना वजन घट जाता था,उतना ही वजन कस्तूरबा और काका का खाते-पीते भी घटता हुआ मैंने देखा है . ] 

    साबरमती – आश्रम के बाहर बापू और काका के साथ रहने का मौका कुछ दिन के लिए मिला था , पूना में . काका कुछ दिनों के लिए मुझे साथ ले गए थे . इन्हीं दिनों बापू के इक्कीस दिन के उपवास हुए थे . और इसी समय मैंने मलेरिया के कारण खाट पकड़ ली . काका के लिए वह कसौटी का समय था . खुद चाहे जितना कष्ट सहने वाले काका मुझे या माँ को जरा कुछ हो जाए , तो घबड़ा जाते थे . बापू का अनशन तो उनके शरीर और मन को निचोड़ ही देता था . बापू के आखिर – आखिर के कुछ उपवासों के समय खाना छोड़ने के कारण बापू का जितना वजन घट जाता था , उतना ही वजन कस्तूरबा और काका का खाते – पीते भी घटता हुआ मैंने देखा है . इस तरह बापू के अनशन और मेरे बुखार ने काका पर दोहरा बोझ डाला .

    मेरा बुखा सख्त था . दो दिन तक नार्मल नहीं हुआ . तीसरे दिन १०५ डिग्री के बदले १०६ डिग्री  तक बढ़ गया . काका अपना दफ़्तर मेरे बिस्तर के पास ले आए . मुख्यतया पत्र – व्यवहार का ही काम रहता था . बापू के स्वास्थ्य की जानकारी दुनिया के कोने – कोने तक पत्रों द्वारा पहुँचाने और बापू से मिलने के लिए या उनका समाचार लेने आये हुए लोगों को प्रेमपूर्वक बाहर से ही विदा करने का मुख्य काम काका को करना पड़ता था . पत्र – व्यवहार तो मेरे बिस्तर के पास बैठकर ही काका करने लगे . बीच – बीच में सिर पर ठण्डे पानी की पट्टी रखते जाते या एकाध बार बापू के पास हो आते थे . माँ से दूर रहने का यह मेरा पहला ही प्रसंग था . इसलिए बुखार में मेरा यही जाप चलता रहता , ‘ माँ को बुलाओ , माँ को बुलाओ . ‘ मेरे स्वास्थ्य की चिन्ता बापू को न करनी पडे़ ‘ इसीकी अधिक चिन्ता काका के मन में थी . पूना में सेवा करने वालों की कमी तो थी नहीं कि उसके लिए माँ को बुलाने की जरूरत हो . तीसरे दिन सन्निपात शुरु हुआ . शरीर को भान नहीं था , लेकिन यन्त्रवत माँ का जाप चालू था . काका ‘हाँ’  भी नहीं कह सकते थे और ‘ना’ भी नहीं कर सकते थे .

    एक बार मेरी बगल में मनु गाँधी ( अब मशरूवाला ) आकर बैठी . मैंने पूछा,’  माँ आई है ?’ यत्नपूर्वक रोके हुए आँसू काका की आँखों से बहने लगे . मनुबहन ने वह देखा . उन्होंने यह बात कस्तूरबा से कही . उन्होंने बापू से कह दिया . बापू नी काका को पास बुलाकर कहा , ‘महादेव,एक तार लिखो .’ जब भी तार देना हो तो बापू इसी तरह काका को बुलाकर लिखवाते थे . इसलिए काका कागज – कलम लेकर हाजिर हो गये . लेकिन माँ को बुलाने के लिए तार लिखा जा रहा है , यह देखते ही काका ने उसका विरोध किया – ‘उसको बुलाने की क्या आवश्यकता है ? यहाँ बाबला की देखभाल के लिए काफी लोग हैं . मनु है , बा हैं और डॊ. दीनशा तो हररोज दो बार देख जाते हैं . उसका बुखार मलेरिया का है . दुर्गा के यहाँ पहुँचने तक तो उतर ही जाएगा . खामखा खर्च…’

    काका का वाक्य बीच ही में काट कर बापू ने कहा , ‘मैंने तुमको तार लिखने के लिए बुलाया है,मुझसे बहस करने के लिए नहीं . ‘

    काका और बापू को काफी बहस करते हुए मैंने देखा है – एक – एक शब्द या एक – एक विराम – चिह्न के लिए बहस चलती . कभी – कभी यह बहस मौखिक न रह कर पत्र – व्यवहार में भी जारी रहती और ऐसा पत्र – व्यवहार कई दिनों तक चलता रहता . लेकिन इस समय बाबला की की बीमारी के सम्बन्ध में बहस का अधिकार महादेव को नही था , वह बापू की आग्या थी और आग्या है , ऐसा मालूम होते ही महादेव उसको शिरोधार्य करते थे . फिर दलील का कोई स्थान नहीं रहता था . तार किया गया और माँ पहुँच गयी और सचमुच माँ के पहुँचने से पहले ही मेरा बुखार उतर गया था . काका का दफ़्तर मेरे बिस्तर के पास से उठकर बापू के पास पहुँच गया था . इअ प्रसंग की जानकारी दो – तीन दिन के बाद काका ने मुझे दी , तब तब उनके चेहरे पर मुस्कान झलक रही थी .

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  1. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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