पूरे प्रेमीजन रे ( २ ) : बापू की गोद में

सत्याग्रह – आश्रम में भी पाठशाला थी . लेकिन कु. प्रेमाबहन कंटक हम लोगों को पढ़ाने आने लगीं , तब तक उसका हमें भान ही नही था . प्रेमाबहन के आने के कारण हमें पाठशाला के अस्तित्व का भान हुआ . पढ़ाने के काम में वे बहुत उत्साही थीं . आज मुझे उनके नाम के पूर्वार्ध का भी पर्याप्त अनुभव हुआ है . उन दिनों हम उनके नाम के उत्तरार्ध को ही सही मानते थे . हमारी इच्छा हो या न हो , वह पढ़ाये बगैर नहीं छोड़तीं . इस घटना के पांच – सात वर्ष बाद १९३७ में वर्धा में शिक्षा – शास्त्रियों के सामने बापू ने जब नयी तालीम के सम्बन्ध में विचार रखे , तब कई शिक्षा – शास्त्रियों ने कहा कि बापू के विचार में कोई नयी बात नहीं है . यदि मैं गलती नही कर रहा हूं , तो नागपुर की तरफ के एक शिक्षक ने तो यहां तक कह दिया कि ‘ ग्यान के साथ हाथ का उपयोग करने के विचार का अमल तो मैं पहले से ही करता आया हूं . बच्चे मेरे काबू में नहीं रहते हैं , तब छड़ी का उपयोग करके ग्यान के साथ हाथ का अनुबन्ध मैं करता हूं . ‘ नागपुर की तरफ के शिक्षक की नयी तालीम की यह व्याख्या प्रेमाबहन शायद बम्बई , पूना से सीखकर आयी होंगी . जब से हम उनके हाथ सौंपे गये , तब से वह भी ग्यानवर्धन के लिये अपने हाथों का प्रयोग हम पर करती थीं .

    ‘ उनके पास तो सीखना ही नहीं ‘ इस निश्चय को हम सत्याग्रही की तरह निभाते थे . कुछ – न – कुछ छोटे – बड़े प्रसंगों का निमित्त करके हम वर्ग में से या उद्योग में से गायब रहते थे . लेकिन ऐसा करते हुए जब हम पकड़े जाते , तब प्रेमाबहन तरह – तरह से सजाएं देतीं . उसमें एक समय का खाना बन्द करवाने की सजा तो आम हो गयी थी . लेकिन उपवासवीर बापू के आश्रम में एक समय का भोजन छोड़ना कोई नयी बात थोड़े ही थी . इसकी पूर्ती हम लोग आश्रम के खेतों के टमाटर आदि फल भरपेट खाकर फलाहार से कर लेते थे .

    ‘ छुट्टी मनाने ‘ का ऐसा ही एक प्रसंग था . बारिश हुई थी . सभी ऋतुओं में वर्षा ऋतु ही ऐसी कि गाती – बजाती आकर , अपने अस्तित्व का परिचय कराती है .  आश्रम में जगह – जगह छोटे – बड़े गड्ढों में पानी भर गया था . मैं घर से निकला तो था वर्ग के में जाने के लिए , लेकिन रास्ते में रीठे के पेड़ के नीचे एक डबरा मिल गया . उसमें छोटे – छोटे कीड़ों को डूबकर मरते देखा तो मेरे अन्दर का ‘ दीनबन्धु ‘ जाग उठा . पाठशाला में जाने के बदले इन उत्पीडित पिपीलिकाओं का उद्धार करने की मैंने ठान ली . रीठे का एक पत्ता लेकर उस से एक चीटी को किनारे पर रखा . एक ही चीटी क्यों ? एक साथ सब क्यों नहीं ? एक – एक करके सब चीटियों को उबार लेने की योजना थी . इस पद्धति में डबरे में डूबनेवाली चीटियों के उद्धार के साथ वर्ग के वातावरण में डूबनेवाले बाबला का भी उद्धार था .

    लेकिन इतनी आसानी से हार मान जांए तो वह प्रेमाबहन कैसी ? वर्ग में सौ फीसदी उपस्थिति होनी चाहिए , यह उनका आग्रह रहता था . इस आग्रह की पूर्ति के लिए वह सारे आश्रम का चक्कर लगा कर आ जातीं . पिपीलिकोद्धार के पुण्य कार्य में मैं एकचित्त हो गया था . तब रीठे के पेड के पीछे से आकर प्रेमाबहन ने मेरा कान पकड़ लिया . यहां गजग्राह की लड़ाई का प्रसंग नहीं बना और मैं भीगी बिल्ली की तरह प्रेमाबहन के साथ चल दिया . पता नहीं उनको क्यों मेरे कान से इतना प्यार हो गया कि वर्ग में पहुंचने तक उनके हाथों ने मेरे कान का सत्संग किया .

    उन दिनों बापू आश्रम में नहीं थे , इसलिए मैंने उनको एक पत्र लिखा . लिखा नहीं , लिखवाया . क्योंकि पत्र लिखना सीखें इसके बहुत पहले से बापू के साथ हमारा पत्र – व्यवहार चलता था . पण्डित खरे हम सबकी ओर से पत्र लिख देते और बापूजी कागज के टुकड़ों पर अपने हाथ से सबको जवाब लिखते . इस व्यवस्था के अनुसार मैंने बापूजी को पत्र लिखकर रीठे के पेड़ के नीचे जो घटना घटी , उसकी शिकायत दर्ज कर दी और यह भी पूछा कि ‘ आप अहिंसा में विश्वास रखते हैं फिर आपके आश्रम में ऐसी हिंसा क्यों ? ‘ जारी

    किसी प्रसंग के उचित या अनुचित होने के सम्बन्ध में दो रायें हो सकती हैं . यह हो सकता है कि आज वह प्रसंग मुझे जिस तरह याद आता है , उससे भिन्न प्रकार से प्रेमाबहन को याद आयेगा . लेकिन इतनी बात पक्की है कि बड़ों के साथ हम बच्चों का झगड़ा हो जाय , तो बापू हम लोगों के पक्ष में रहते थे . कुछ दिन बाद प्रेमाबहन को बापू ने पत्र लिखा . पत्र में क्या लिखा था मैं नही जानता . लेकिन इतना जानता हूं कि उसके बाद से ताड़न का प्रयोग हमेशा के लिए समाप्त हो गया .

     इस तरह बापू द्वारा मेरा पक्ष लेने के और भी प्रसंग याद आते हैं . यथास्थान उनका जिक्र करूंगा . अभी तो पण्डित खरे के मार्फत पत्र लिखवाने के समय का ही एक और प्रसंग याद आ रहा है . उसको दिये देता हूं .

    हर सप्ताह हम पत्र लिखते थे . उसमें आम तौर पर बापू से एक प्रश्न ही पूछते थे . सप्ताह में एक बार बापूजी का जवाब अवश्य मिल जाता था . जिस सप्ताह में जिसने प्रश्न पूछा होगा , वह बापू का जवाब जानने के लिए बड़ा उत्सुक रहता था . उसमें भी कौन अच्छी तरह प्रश्न पूछता है और बापू ने किसको कितना लम्बा जवाब दिया , यह भी स्पर्धा का विषय रहता था . मनुष्य के मन  से ही स्पर्धा समाप्त नही होती , तब तक आश्रम से वह कैसे समाप्त हो सकती थी .

    एक सप्ताह मैंने प्रश्न पूछा , ‘ बापूजी , हम इतने सारे बच्चे आपको इतने सारे प्रश्न पूछते हैं , लेकिन आप तो छोटे-से कागज के टुकडे पर जवाब लिख देते हैं . आश्रम में हम गीता कंठस्थ करते हैं . उसमें देखते हैं कि अर्जुन एक छोटा -सा प्रश्न पू्छता है और भगवान उत्तर में पूरा अध्याय बोल जाते हैं . फिर आप क्यों छोटा-सा जवाब देते हैं ?’

    इस प्रश्न की बड़ों ने प्रशंसा की , तो मुझे भी लगा कि यह बड़ा अहम सवाल मैंने उठाया है . इसके उत्तर की मैं बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा करने लगा .

    अपने छोटे पत्रों में भी सम्बोधनों का चुनाव करते समय बापूजी किसी नये प्रेमी के जितनी भावना भर देते थे . इस तरह मुझे भी कई प्रकार के सम्बोधन मिल चुके थे . ‘चि.बाबा’ से लेकर ‘चि. नारायण राव’ तक . इस बार भी ऐसे ही कुछ सम्बोधन का उपयोग बापू ने किया था . बदकिस्मती से वह पत्र आज मेरे संग्रह में नहीं है . लेकिन श्रुति भले न हो , स्मृति तो है ही .

    बापू ने लिखा था , ‘तेरा प्रश्न अच्छा है . लेकिन इतना ध्यान में रख कि श्रीकृष्ण को तो एक ही अर्जुन था . मेरे लिए तो तेरे जैसे कई अर्जुन हैं न ? ‘

    अगला प्रसंग ‘ हर्ष – शोक का बंटवारा’

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  1. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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