पूरे प्रेमीजन रे : बापू की गोद में (३)

    बापू की लड़ाई की पद्धति का मुझे बचपन में ही अनुभव हो गया था . प्रसंग इस प्रकार था :

    शान्तिकुमार नरोत्तम मोरारजी ने बम्बई से मेरे लिए किसीके हाथ कुछ खिलौने भेजे थे . काका ( मेरे पिताजी ) जहां जाते , वहां उनके मित्र हो ही जाते थे . किन्तु उनमें से कुछ की मित्रता घनिष्ठ हो जाती . काका के साथ जिनकी घनिष्ठ मित्रता हो जाती , उनका हमारे साथ भी घरेलू सम्बन्ध जुड़ जाता था . शान्तिकुमारजी का बापू की तरह काका से घनिष्ठ सम्बन्ध था . इसलिए ये खिलौने उन्होंने मेरे लिए भेजे . साबरमती – आश्रम में यों तो खेलने को बहुत मिल जाता था , लेकिन खिलौने हमेशा नही मिलते थे . हमारे दुर्भाग्य से शान्तिकुमारजी के भेजे हुए खिलौने विदेशी थे . इसलिये हमारे पास पहुंचने के पहले ही बापू ने उन पर कब्जा कर लिया था . बापू ने अपने कमरे में दराज पर उनको रखवा दिया था . हमारी ‘ खूफिया – पुलिस ‘ को पता चल गया कि बाबला के लिए बम्बई से आये खिलौने बापूजी ने छिपाकर रखे हैं . ऐसे सरासर अन्याय के खिलाफ़ लड़ने के लिए हम लोगों ने तैयारियां शुरु कर दीं . कांग्रेस – युग का अनुकरण करते हुए लड़ाई का पहला कदम अपना प्रतिनिधि भेजकर उठाया जाय , ऐसा तय किया गया . खिलौने मेरे नाम से आये थे , इसलिए हमारे बाल – प्रतिनिधि – मण्डल की ओर से मुझे ही प्रवक्ता के रूप में चुना गया .

    उन दिनों बापू मगनकुटी में रहते थे . नित्य की तरह मेरे पिताजी बापू की बगल में बैठकर कुछ लिख रहे थे . दूसरे भी कुछ अन्तेवासी बापू के अगल – बगल बैठे थे . मोटी बा ( कस्तूरबा ) वहीं पर थीं . हमारा प्रतिनिधिमण्डल वहां जा पहुंचा .

    मैंने ही पहला वार किया , ‘ मेरे लिये बम्बई से खिलौने आये हैं , यह बात सही है ? ‘

    लड़ाई की शुरुआत में ही प्रतिपक्षी से सत्य को स्वीकार करा लेना उपयोगी होता है . बापू भी उस समय कुछ लिखने में मशगूल थे . लेकिन उन्होंने कागज पर से दृष्टि उठा कर मेरी तरफ देखा और कहा और कहा , ‘ कौन ? बाबला ? हां खिलौने के बारे में तूने जो सुना है , वह सही है . ‘

    ‘ मेरे खिलौने कहां हैं ? ‘ मेरे दूसरे प्रहार के पीछे बरामद माल का ठिकाना जानने की उत्सुकता थी , क्योंकि हमारे पास खबर पहुंची थी कि बापू ने खिलौने कहीं छिपा रखे हैं .

    ‘ वे रहे खिलौने दराज पर ‘ बापू ने उंगली से इशारा किया . तो , बरामद माल छिपा कर नहीं रखा था . अच्छी खासी डलियाभर खिलौने थे और सुन्दर इतने कि देखकर मुंह में पानी भर जाय !

   ‘ ये खिलौने हमें सौंप दीजिये ‘ न्याय अपने साथ हो तो घुमा – फिरा कर बात करने की क्या आवश्यकता ? सीधे न्याय की मांग क्यों न की जाय ?

     तब बापू ने अपनी बात पेश की , ‘ तुझे मालूम है न कि ये खिलौने विदेशी हैं ? ‘ आश्रम तो स्वदेशी – आन्दोलन का पीठ – सा था . तो वहां के बच्चे विदेशी खिलौनों से कैसे खेल सकते हैं ? बापू को यह बात कहनी थी . लेकिन हम बच्चे उनकी बात समझने को राजी हों तब न ?

    ‘ स्वदेशी – विदेशी मैं कुछ नही जानता . मैं इतना जानता हूं कि खिलौने मेरे हैं . मेरे लिये वे भेजे गये हैं , इसलिये मुझे मिलने चाहिए ‘ मैंने अपना अधिकार सिद्ध करने के लिए कहा . मुझे विश्वास था कि बापू मेरे अधिकार से इनकार नहीं कर सकेंगे . लेकिन बापू ने बात को ऐसा मोड़ दे दिया , जिसकी हमने कल्पना ही नही की थी .

    ‘ हम क्या विदेशी खिलौनों से खेलेंगे ? ‘  ( जारी )

    हिन्दी ‘ हम ‘ शब्द में मैं का बहुवचन का अर्थ है . साथ – साथ ‘तू’ और ‘मैं’ का संग्रहवाचक भी वह शब्द है . लेकिन गुजराती में ‘आपणे’ शब्द में ‘तू’ और मैं यही भाव व्यक्त होता है . ‘मैं’ के बहुवचन के लिये गुजराती में ‘अमे’ शब्द अलग से है .

    और इस ‘आपणे’ शब्द में मानो बापू का ब्रह्मास्त्र भरा था . एक ही वाक्य में उन्होंने खुद को और मुझ को एक पक्ष का बना दिया . हम कमर कस कर लड़ने आये थे . कहां गया वह आवेश ? कहां गया वह प्रतिनिधिमण्डल ? कहां गयी वह आमने – सामने वागयुद्ध की वह तैयारी ? जब दुश्मन खुद ही मित्रपक्ष बन जाय , वहां युद्ध की तुला ही डगमगाने लगे तो क्या आश्चर्य !

    इन खिलौनों से खेलने का अपना अधिकार मुझसे छीना जा रहा था , लेकिन उनसे खेलने का अपना अधिकार भी तो बापू छोड़ रहे थे . तभी तो उन्होंने ‘हम’ कहा !

    और जब अधिकार केवल मेरा ही नहीं , बल्कि प्रतिपक्षी का भी है , यह बात ध्यान में आती है , तब अधिकार की जगह कर्तव्य – भावना का उदय हो जाता है .

    ‘विदेशी वस्तुओं के खिलाफ़ हम आन्दोलन चला रहे हैं’ और हमारे ही घर में विदेशी खिलौनों से खेला जाएगा ? ‘ बापू के सामने दलील करने या उन्हें समझाने की जरूरत ही नहीं रह गयी , प्रतिनिधिमण्डल के प्रवक्ता को ही परास्त होते देखकर मण्डल के दूसरे सदस्य चुपचाप खिसक रहे थे .

    विख्यात बाल – मनोवैग्यानिक नील का कहना है कि ‘ किसीका पक्ष लेना ‘ यही प्रेम करने की व्याख्या कही जा सकती है . ‘ इस स्थूल व्याख्या के अनुसार भी बापू को हमने अपने प्रेमीजन के रूप में देखा है . [ अगली प्रविष्टी में जारी ]

   

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  1. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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