Posts Tagged as ‘rajendra rajan’

February 25, 2009

कविता : पेड़ : राजेन्द्र राजन

छुटपन में ऐसा होता था अक्सर
कि कोई टोके
कि फल के साथ ही तुमने खा लिया है बीज
इसलिए पेड़ उगेगा तुम्हारे भीतर
मेरे भीतर पेड़ उगा या नहीं
पता नहीं
क्योंकि मैंने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट
लेकिन आज जब मैंने
एक जवान पेड़ को कटते हुए देखा
तो मैंने सुनी अपने भीतर
एक हरी – भरी [...]

August 28, 2008

कविता / तीसरा आदमी / राजेन्द्र राजन

मैदान में जैसे ही पहला पहलवान आया
उसकी जयकार शुरु हो गई
उसी जयकारे को चीरता हुआ दूसरा पहलवान आया
और दोनों परिदृश्य पर छा गए

पहले दोनों ने धींगामुश्ती की कुछ देर
कुछ देर बाद दोनों ने कुछ तय किया

फिर पकड़ लाए वे उस आदमी को जो खेतों की तरफ़ जा रहा था
दोनों ने झुका दिया उसे आगे की [...]

July 9, 2008

यह कौन-सी अयोध्या है ? : राजेन्द्र राजन

अयोध्या का यही अर्थ हम जानते थे
जहाँ न हो युद्ध
हो शांति का राज्य

अयोध्या की यही नीति हम जानते थे
जहाँ सबल और निर्बल
बिना भय के
पानी पीते हों एक ही घाट

अयोध्या की यही रीति हम जानते थे
जहाँ प्राण देकर भी
सदा निभाया जाये
दिया गया वचन

यह था अयोध्या का चरित्र
गद्दी का त्याग और वनवास
गद्दी के लिए खूनी खेल नहीं

अयोध्या का [...]

July 8, 2008

शब्द बदल जाएं तो भी

वे जान गए हैं
कि नहीं उछाला जा सकता
वही शब्द हर बार
क्योंकि उसका अर्थ पकड़ में आ चुका होता है

इसीलिए
वे जब भी आते हैं
उछाल देते हैं कोई और शब्द

गिरगिट के रंग बदलने की तरह
जब बदल जायें शब्द
तो अर्थ वही रहता है
शब्द बदल जायें तो भी
- राजेन्द्र राजन
   १९९५.

June 27, 2008

पश्चाताप : राजेन्द्र राजन

महान होने के लिए
जितनी ज्यादा सीढ़ियाँ मैंने चढ़ीं
उतनी ही ज्यादा क्रूरताएं मैंने कीं

ज्ञानी होने के लिए
जितनी ज्यादा पोथियां मैंने पढ़ीं
उतनी ही ज्यादा मूर्खताएं मैंने कीं

बहादुर होने के लिए
जितनी ज्यादा लड़ाइयां मैंने लड़ीं
उतनी ही ज्यादा कायरताएं मैंने कीं

ओह , यह मैंने क्या किया
मुझे तो सीधे रास्ते जाना था
- राजेन्द्र राजन .
 

February 8, 2008

तब कैसा मौसम ठंडा जी !

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तब कैसा मौसम ठंडा जी
आया फिर जाड़े का मौसम
लगता सबको ठंडा जी
खुले बदन फिर भी बैठे हैं
नदी किनारे पण्डा जी
मास्टर जी के हाथ कोट में
कहां गए वो डंडा जी
कहता है हर साल यही
गणतंत्र दिवस का झण्डा जी
हो सबके पास [...]