[ मीनाक्षी पय्याडा के माता - पिता दोनों शुद्ध मलयाली हैं , यानी केरलवासी । उसकी माँ , केरल के कन्नूर जिले में केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षिका है इसलिए मीनाक्षी को अपने स्कूल ( केन्द्रीय विद्यालय) में हिन्दी पढ़ने का मौका मिला। मीनाक्षी को अब तक किसी हिन्दी भाषी राज्य की यात्रा का मौका नहीं [...]
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December 5, 2008
खतरनाक हुआ वर्ष : चन्द्रकान्त देवताले
खतरनाक हुआ वर्ष
अपने असंख्य वर्षों के बारे में
चुप ही रहेगी पृथ्वी
पर मेरे छप्पन वर्षों के बाद
उगा यह तबाही से खतरनाक हुआ वर्ष
मनहूस दस्तावेज की तरह
फड़फड़ाता ही रहेगा
बची – खुची जिन्दगी की छाती पर
इतनी बर्बरता और इतनी जल्दी और इतनी फुरती से
कौन थे उन्मत्त घोड़ों पर सवार
जिनकी दहलाती टापों ने रौंद दिये
बच्चों के भविष्य [...]
July 27, 2008
नल की हड़ताल
आज सुबह से नल था मौन ,
पता नहीं कारण था कौन ?
मैंने पूछा तनिक पास से ,
भैय्या दिखते क्यों उदास से ?
बोला , ‘क्या बतलाऊं यार ,
रोज सहन करता हूं मार .
कान ऐंठता जो भी आता ,
टांग बाल्टी मुझे सताता .
लड़ते मेरे पास खड़े हो ,
बच्चे हों या मर्द बड़े हों .
नहीं किसी को दूंगा पानी [...]
July 9, 2008
यह कौन-सी अयोध्या है ? : राजेन्द्र राजन
अयोध्या का यही अर्थ हम जानते थे
जहाँ न हो युद्ध
हो शांति का राज्य
अयोध्या की यही नीति हम जानते थे
जहाँ सबल और निर्बल
बिना भय के
पानी पीते हों एक ही घाट
अयोध्या की यही रीति हम जानते थे
जहाँ प्राण देकर भी
सदा निभाया जाये
दिया गया वचन
यह था अयोध्या का चरित्र
गद्दी का त्याग और वनवास
गद्दी के लिए खूनी खेल नहीं
अयोध्या का [...]
July 8, 2008
शब्द बदल जाएं तो भी
वे जान गए हैं
कि नहीं उछाला जा सकता
वही शब्द हर बार
क्योंकि उसका अर्थ पकड़ में आ चुका होता है
इसीलिए
वे जब भी आते हैं
उछाल देते हैं कोई और शब्द
गिरगिट के रंग बदलने की तरह
जब बदल जायें शब्द
तो अर्थ वही रहता है
शब्द बदल जायें तो भी
- राजेन्द्र राजन
१९९५.
July 6, 2008
जहाँ चुक जाते हैं शब्द : राजेन्द्र राजन
शब्दों में शब्द जोड़ते
मैं वहाँ आ पहुंचा हूं
जहां और शब्द नहीं मिलते
मैं क्या करूँ
अब मैं कैसे लिखूं
समय के पृष्ट पर
अपनी सबसे जरूरी कविता
शब्दों में शब्द जोड़ते
जहां चुक जाते हैं शब्द
मैं क्या करूं ?
क्या मैं वहीं खुद को जोड़ दूं ?
मगर
क्या अपने शब्दों जैसा मैं हूं ?
- राजेन्द्र राजन
१९९५.
June 27, 2008
पश्चाताप : राजेन्द्र राजन
महान होने के लिए
जितनी ज्यादा सीढ़ियाँ मैंने चढ़ीं
उतनी ही ज्यादा क्रूरताएं मैंने कीं
ज्ञानी होने के लिए
जितनी ज्यादा पोथियां मैंने पढ़ीं
उतनी ही ज्यादा मूर्खताएं मैंने कीं
बहादुर होने के लिए
जितनी ज्यादा लड़ाइयां मैंने लड़ीं
उतनी ही ज्यादा कायरताएं मैंने कीं
ओह , यह मैंने क्या किया
मुझे तो सीधे रास्ते जाना था
- राजेन्द्र राजन .
April 16, 2008
कविता : ब्लैक बोर्ड : ज्ञानेन्द्रपति
औचक पहुँचे , उस दिन हमने
साँझ को शुरु होते देखा
चनमा सट्टी चौराहे पर की
उस चाय – दुकान में
ढलती साँझ हमारे पहुँचने तक
जो गहगह होती थी
अब जानता हूँ
उस चाय – दुकान की साँझ
बहुत पहले शुरु हो जाती है
दोपहर ढलते ही
तिपहरी के साथ
उस चाय – दुकान [...]
February 8, 2008
तब कैसा मौसम ठंडा जी !
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तब कैसा मौसम ठंडा जी
आया फिर जाड़े का मौसम
लगता सबको ठंडा जी
खुले बदन फिर भी बैठे हैं
नदी किनारे पण्डा जी
मास्टर जी के हाथ कोट में
कहां गए वो डंडा जी
कहता है हर साल यही
गणतंत्र दिवस का झण्डा जी
हो सबके पास [...]
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