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डेढ़ रुपए का सिक्का

डेढ़ रुपए का सिक्का

आपने यह सिक्का देखा है ? इसके पृष्ट भाग पर 150 अंकित है और यह 2004 में टकसाल से निकला है । मेरे घर के कपड़े लोहा करने वाले मित्र मनोज को कल जब इस सिक्के को दिखाया तब उसने कहा,’डेढ रुपए के सिक्के के बारे में सुना जरूर था,पहली बार देख रहा हूँ।’

मैंने कल ही इसे प्राप्त किया है ‘केशव पान भण्डार’ में कार्यरत राजू यादव से । राजू ने इसे करीब दो वर्षों से सहेज कर रक्खा था।

क्या आप लोगों ने डेढ़ रुपए का सिक्का देखा है?जानकारी का स्वागत है। पाठकों में जानकारी का अभाव रहा तो ‘आलोकपात’ किया जाएगा।

करीब २७-२८ वर्ष पहले पचास की नोट पर बने संसद-भवन के चित्र पर तिरंगा नदारद था।मित्र सुशील त्रिपाठी ने उसका चित्र ‘दिनमान’ या ‘रविवार’ में छपवाया।संसद-भवन शोक से बाहर आ गया था और झण्डा फहराने लगा।

तब कैसा मौसम ठंडा जी !

 

तब कैसा मौसम ठंडा जी

आया फिर जाड़े का मौसम

लगता सबको ठंडा जी

खुले बदन फिर भी बैठे हैं

नदी किनारे पण्डा जी

मास्टर जी के हाथ कोट में

कहां गए वो डंडा जी

कहता है हर साल यही

गणतंत्र दिवस का झण्डा जी

हो सबके पास गरम कपड़े

तब कैसा मौसम ठंडा जी !

राजेन्द्र राजन

मानव मानव एक समान

मानव मानव एक समान

निर्धन हों चाहे धनवान

मानव मानव एक समान

चाहे गोरे हों या काले

मानव मानव एक समान

बनाएंगे हम ऐसी दुनिया

ऐसा सुंदर एक समाज

जिसमें न हों ऊंच नीच के

भेदभाव के रस्म-रिवाज

हम चाहेंगे मानव के सब

गल जाएं झूठे अभियान

मानवता का अर्थ यही है

मानव मानव एक समान ।

राजेन्द्र राजन

[ रेखाचित्र कांजीलाल का बनाया है। सुधेन्दु पटेल द्वारा लिखी पुस्तक 'एक कलाकार की दृष्टि में काशी में' से लिया है। ]

ईसाई और मुसलमान क्यों बनते हैं ? - स्वामी विवेकानन्द

अगर हमारे देश में कोई नीच जाति में जन्म लेता है , तो वह हमेशा के लिए गया - बीता समझा जाता है , उसके लिए कोई आशा - भरोसा नहीं । ( पत्रावली भाग २ , पृ. ३१६ ) आइए , देखिए तो सही , त्रिवांकुर में जहाँ पुरोहितों के अत्याचार भारतवर्ष में सब से अधिक हैं , जहाँ एक एक अंगुल जमीन के मालिक ब्राह्मण हैं,वहाँ लगभग चौथाई जनसंख्या ईसाई हो गयी है ! ( पत्रावली भाग १ , पृ. ३८५ ) यह देखो न - हिंदुओं की सहानुभूति न पाकर मद्रास प्रांत में हजारों पेरिया ईसाई बने जा रहे हैं , पर ऐसा न समझना कि वे केवल पेट के लिए ईसाई बनते हैं । असल में हमारी सहानुभूति न पाने के कारण वे ईसाई बनते हैं । ( पत्रावली भाग ६ , पृ. २१५ तथा नया भारत गढ़ो पृ. १८)

    भारत के गरीबों में इतने मुसलमान क्यों हैं ? यह सब मिथ्या बकवाद है कि तलवार की धार पर उन्होंने धर्म बदला । जमींदारों और पुरोहितों से अपना पिंड छुड़ाने के लिए ही उन्होंने ऐसा किया , और फलत: आप देखेंगे कि बंगाल में जहाँ जमींदार अधिक हैं , वहाँ हिंदुओं से अधिक मुसलमान किसान हैं । ( पत्रावली भाग ३ , पृ. ३३०, नया भारत गढ़ो, पृ . १८ )

    हमने राष्ट्र की हैसियत से अपना व्यक्तिभाव खो दिया है और यही सारी खराबी का कारण है । हमे राष्ट्र में उसके खोये हुए व्यक्तिभाव को वापस लाना है और जनसमुदाय को उठाना है। ( पत्रावली भाग २ , पृ. ३३८ ) भारत को उठाना होगा , गरीबों को भोजन देना होगा , शिक्षा का विस्तार करना होगा और पुरोहित - प्रपंच की बुराइयों का निराकरण करना होगा । सब के लिए अधिक अन्न और सबको अधिकाधिक सुविधाएँ मिलती रहें । ( पत्रावली भाग ३ , पृ ३३४ )

    पहले कूर्म अवतार की पूजा करनी चाहिए । पेट है वह कूर्म । इसे पहले ठंडा किये बिना धर्म-कर्म की बात कोई ग्रहण नहीं करेगा । देखते नहीं , पेट की चिन्ता से भारत बेचैन है।धर्म की बात सुनाना हो तो पहले इस देश के लोगों के पेट की चिंता दूर करना होगा । नहीं तो केवल व्याख्यान देने से विशेष लाभ न होगा । (पत्रावली भाग ६ , पृ १२८ ) पहले  रोटी और तब धर्म चाहिए । गरीब बेचारे भूखों मर रहे हैं , और हम उन्हें आवश्यकता से अधिक धर्मोपदेश दे रहे हैं ! ( पत्रावली भाग ५ , पृ. ३२२ )

लोगों को यदि आत्मनिर्भर बनने की शिक्षा न दी जाय तो सारे संसार की दौलत से भी भारत के एक छोटे से गाँव की सहायता नहीं की जा सकती है । ( पत्रावली भाग ६ , पृ ३५० )

    लोग यह भी कहते थे कि अगर साधारण जनता में शिक्षा का प्रसार होगा , तो दुनिया का नाश हो जायगा । विशेषकर भारत में , हमें समस्त देश में ऐसे सठियाये बूढे मिलते हैं , जो सब कुछ साधारण जनता से गुप्त रखना चाहते हैं । इसी कल्पना में अपना बड़ा समाधान कर लेते हैं कि वे सारे विश्व में सर्वश्रेष्ठ हैं । तो क्या वे समाज की भलाई के लिए ऐसा कहते हैं अथवा स्वार्थ से अंधे हो कर ? मुट्ठी भर अमीरों के विलास के लिए लाखों स्त्री-पुरुष अज्ञता के अंधकार और अभाव के नरक में पड़े रहें ! क्योंकि उन्हें धन मिलने पर या उनके विद्या सीखने पर समाज डाँवाडोल हो जायगा ! समाज है कौन ? वे लोग जिनकी संख्या लाखों है ? या आप और मुझ जैसे दस - पाँच उच्च श्रेणी वाले !! ( नया भारत गढ़ो , पृ. ३१ )

    यदि स्वभाव में समता न भी हो , तो भी सब को समान सुविधा मिलनी चाहिए । फिर यदि किसी को अधिक तथा किसी को अधिक सुविधा देनी हो , तो बलवान की अपेक्षा दुर्बल को अधिक सुविधा प्रदान करना आवश्यक है । अर्थात चांडाल के लिए शिक्षा की जितनी आवश्यकता है , उतनी ब्राह्मण के लिए नहीं । ( नया भारत गढ़ो , पृ . ३८ )

    जब तक करोड़ों भूखे और अशिक्षित रहेंगे , तब तक मैं प्रत्येक उस आदमी को विश्वासघातक समझूँगा , जो उनके खर्च पर शिक्षित हुआ है , परंतु जो उन पर तनिक भी ध्यान नहीं देता ! वे लोग जिन्होंने गरीबों को कुचलकर धन पैदा किया है और अब ठाठ-बाट से अकड़कर चलते हैं, यदि उन बीस करोड़ देशवासियों के लिए जो इस समय भूखे और असभ्य बने हुए हैं , कुछ नहीं करते , तो वे घृणा के पात्र हैं । ( नया भारत गढ़ो , पृ. ४४ - ४५ )

    एक ऐसा समय आयेगा जब शूद्रत्वसहित शूद्रों का प्राधान्य होगा , अर्थात आजकल जिस प्रकार शूद्र जाति वैश्य्त्व अथवा क्षत्रियत्व लाभ कर अपना बल दिखा रही है , उस प्रकार नहीं , वरन अपने शूद्रोचित धर्मकर्मसहित वह समाज में आधिपत्य प्राप्त करेगी । पाश्चात्य जगत में इसकी लालिमा भी आकाश में दीखने लगी है , और इसका फलाफल विचार कर सब लोग घबराये हुए हैं। ‘सोशलिज्म’ , ‘अनार्किज्म’,’नाइहिलिज्म’ आदि संप्रदाय इस विप्लव की आगे चलनेवाली ध्वजाएँ हैं । ( पत्रावली भाग ८ , पृ. २१९-२०, नया भारत गढ़ो पृ. ५६ )

 

सुकरात की सगाई

    सुकरात मेरा प्यारा भतीजा है । ४ अगस्त १९७५ को बनारस के महिला अस्पताल में पैदा हुआ तब रणभेरी , चिन्गारी आदि नामों से साइक्लोस्टाइल्ड भूमिगत बुलेटिन निकालने वालों में प्रमुख उसका पिता- नचिकेता , खुद भी भूमिगत था । ‘ गिन रही ,सुन रही, हिटलर के घोड़े की एक-एक टाप को ‘ बाबा नागार्जुन ने इन शब्दों में जिन इन्दूजी का वर्णन किया था, उनकी थोपी सेन्सरशिप का मुकम्मल जवाब थीं - रणभेरी जैसी बुलेटिनें । नचिकेता के पत्रकारीय जीवन की ठोस बुनियाद । रणभेरी लुटा कर ‘ लोकनायक जयप्रकाश -जिन्दाबाद’ सिर्फ एक बार लगाना डी.आई.आर. के अन्तर्गत जेल जाने के लिए पर्याप्त होता था।

    बनारसीपने में सुकरात का घर का नाम मैंने दिया - बमबम । बमबम की बुआ -संघमित्रा की शादी के वक्त आशीर्वाद देते वक्त हुए प्रख्यात गाँधीजन दादा धर्माधिकारी ने हम तीनों भाई बहन के लिए कहा था :” ये गुजबंगोड़िया हैं । गुजराती पिता , बंगाली नानी और ओड़िया नाना होने के कारण ।” जीजाजी मराठी हैं इसलिए उनकी बच्ची - महागुजबंगोड़िया - यह दादा कह गए ! सुकरात ने इस प्रक्रिया को जारी रखा , व्यापक बनाया ।

    सुकरात की सगाई कल सम्पन्न हुई । सगाई के लिए गंगटोक से पूर्णतय: स्त्री सदस्यों का दल तीन दिन की यात्रा कर अहमदाबाद पहुँचा था । सुकरात अहमदाबाद टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में कॉपी एडिटर है और उसकी मंगेतर पूजा कम्प्यूटर साइन्स की प्रवक्ता है , गंगटोक में । कल हुए आयोजन में नचिकेता ने आभासी नाते के प्रत्यक्ष सम्बन्ध बन जाने पर खुशी व्यक्त की । सुकरात ने पूजा को अँगूठी पहनाई उसके पहले उसे नेपाली टोपी पहनाई गई , एक खुकरी दी गयी तथा पूजा की माँ और चाची ने घोषणा की : ” गोरखा समाज सुकरात को दामाद के रूप में कबूलेगा । ” नेपाली टोपी मेरे भाई और मेरे जीजाजी को भी पहनाई गई । असम के लाल किनार वाले अँगोछे की तरह इस टोपी के महत्व का अहसास हुआ । हमें कोई टोपी न पहना सका लेकिन काशी में बैठे-बैठे हमने बमबम और पूजा को आशीर्वाद दिया ।

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[ चित्र : १. सुकरात और पूजा , २.  सिलीगुड़ी का दल , ३. नेपाली टोपी ]

 

टेडी बियर में बचे हुए भालू : ज्ञानेन्द्रपति

बच्चियाँ जब

अपने टेडी बियर को छाती से चिपकाये

दुलार रही होंगी

छीज रहे भारतीय जंगलों में

और खोजी दलों और अनुसन्धान-स्टेशनों के

        कचरालय बने जा रहे ध्रुवीय प्रदेशों में

बेमौत मारे जा रहे होंगे भालू

काले भालू और भूरे भालू

बग़ैर किसी रंग-भेद के

 

कौन मार रहा होगा उन्हें

अपने टेडी बियर को छाती से लगाये

सो जानेवाली बच्चियाँ

क्या कभी सपने में भी जान सकेंगी इसे

निहायत मुलायमियत से उनके आलिंगन से

छुल्लक भल्लूक को हटा उन्हें रज़ाई उढ़ानेवाले पापा

आज ही कहा था जिन्होंने-बेटे , पुराना पड़ गया है यह

कल ही बाज़ार से ला देंगे तुम्हारे लिए

एक नया टेडी बियर

प्यारा-सा टेडी बियर -

वही पापा

मदारियों से मुक्त करा

भालुओं को बरास्ते चिड़ियाख़ाना वापस जंगल

भिजानेवाले मोह से भरे उनके पापा

शामिल हैं

उनके और अपने भी अनजाने

भालुओं के हत्यारों में

और बेहतर कि इसे कभी न जानें जंगली मधुमक्खियाँ

कि शहदखोर शहदचोर भालुओं के लिए विलाप-नृत्य करती हुई

भँभोड़ डालें बस्तियों पर बस्तियाँ

आत्मघाती अभियानों में

 

नहीं , नहीं जान सकेंगी बच्चियाँ इसे

और न जान पायेंगे उनके प्यारे पापा

और पीढ़ी-दर-पीढ़ी

जंगली प्रदेशों से और बर्फ़ानी प्रदेशों से अन्तत: मिट गये भालू

टेडी बियर बनकर दुकानों के शो केसों में बैठे रहेंगे अतीतातीत

वत्सल पिताओं की प्रतीक्षा में

मोहित बच्चियों की ममतालु बाँहों के बीच होगी उनकी अन्तिम शरणस्थली

उनकी आत्मा को मिलेगा अभयारण्य

जहाँ माँ चिड़िया की तरह देह ही नहीं मन-प्राण की उष्मा से

सेयेंगे वे

वक्षांकुर

भविष्योन्मुख ।

- ज्ञानेन्द्रपति

कवि ने कहा , किताबघर प्रकाशन , ४८५५-५६/२४ अंसारी रोड ,दरियागंज , नयी दिल्ली से प्रकाशित एवं संशयात्मा में संकलित । कवि की अनुमति से प्रकाशित । चित्र :अफ़लातून]

आमीन , गुलाब पर ऐसा वक्त कभी न आये : भवानी प्रसाद मिश्र

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गुलाब का फूल है

हमारा पढ़ा - लिखा

मैंने उसे काफी

उलट-पुलट कर देखा है

मुझे तो वह ऐसा ही दिखा

 

सबसे बड़ा सबूत

उसके गुलाब होने का यह है

कि वह गाँव में जाकर

बसने के लिए

तैयार नहीं है

 

गाँव में उसकी

प्रदर्शनी कौन कराएगा

वहाँ वह अपनी शोभा की

प्रशंसा किससे कराएगा

 

वह फूलने के बाद

किसी फसल में थोड़े ही

बदल जाता है

मूरख किसान को फूलने के बाद

फसल देने वाला ही तो भाता है

 

गाँव में इसलिए ठीक है

अलसी और सरसों और

तिली के फूल

जा नहीं सकते वहाँ कदापि

गुलाब और लिली के फूल

 

बुरा नहीं मानना चाहिए

इस गुलाब - वृत्ति का

गाँव वालों को

क्योंकि वहाँ रहना चाहिए सिर्फ ऐसे हाथ - पाँव वालों को

 

जो बो सकते हैं

और काट सकते हैं

कुएँ खोद सकते हैं

खाई पाट सकते हैं

और फिर भी चुपचाप

समाजवाद पर भाषण सुनकर

वोट दे सकते हैं

गुलाब के फूल को

और फिर अपना सकते हैं

पूरे जोश के साथ अपनी उसी भूल को

 

याने जुट जा सकते हैं जो

उगाने में अलसी और

सरसों  और तिली के फूल

गुलाब और लिली के फूल

तो भाई यहीं शांतिवन में रहेंगे

 

बुरा मानने की इसमें

कोई बात नहीं है

बीच - बीच में यह प्रस्ताव कि गुलाब वहाँ जा कर

चिकित्सा करे या पढ़ाये

पेश करते रहने में हर्ज नहीं है

मगर साफ समझ लेना चाहिए

गुलाब का यह फर्ज नहीं है

कि गाँवों में जाकर खिले

अलसी और सरसों वगैरा से हिले-मिले

और खोये अपना आपा

ढँक जाये वहाँ की धूल से

सरापा

 

और वक्तन बवक्तन

अपनी प्रदर्शनी न कराये

आमीन , गुलाब पर ऐसा वक्त कभी न आये

 

- भवानी प्रसाद मिश्र

( तरुणमन , वर्ष ३ , अंक ९ , १९७३ )

रजी चन्द्रशेखर के मलयाली / हिन्दी चिट्ठे का स्वागत करें

रजी चन्द्रशेखर ने  मेरे चिट्ठे पर टिप्पणी दे कर सूचित किया कि उन्होंने वर्डप्रेस पर एक हिन्दी-कम-मलयालम ज्यादा चिट्ठा शुरु किया है । रवि रतलामीजी ने उन्हें हिन्दी चिट्ठे को अलग रखने की सलाह दी है । रजी चन्द्रशेखर सलाह मानें या न माने हिन्दी चिट्ठा-पाठक उनका स्वागत करें । रजी भाई आप से पहले दो मलयाली भाषी लोगों के हिन्दी चिट्ठे रहे हैं ( डॉ. बेजी जेसन तथा खेती किसानी पर लिखने वाले पूर्व सैनिक चन्द्रशेखरन नायर  के )। इन चिट्ठों के द्वारा हिन्दी और मलयालम के पाठकों को लाभ हो , यह कामना है । चिट्ठा - चर्चा में मलयालम चिट्ठों पर एक आलेख मैंने लिखा था ।

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आइए ‘आत्मदर्शी’ का खैरम - कदम करें

मेरे एक कथाकार मित्र ने ‘आत्मदर्शी’ नाम से चिट्ठा शुरु किया है।साहित्यिक जगत में वे एक अन्य नाम से कहानी-कविता लिखते रहे हैं ।ओड़ीसा के ढेंकानाल में शिक्षक हैं । आप सभी साथियों से निवेदन है कि उनके चिट्ठे को देखें,पढ़ें और स्वागत करें।

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चिट्ठाजगत अपनाने के लिए(न देखें)


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

जुगनू : अल्लामा इक़बाल की बाल कविता

सुनाऊं तुम्हे बात एक रात की,

कि वो रात अन्धेरी थी बरसात की,

चमकने से जुगनु के था इक समाँ ,

हवा में उड़ें जैसे चिनगारियां ।

पड़ी  एक बच्चे की उस पर नज़र ,

पकड़ ही लिया एक को दौड़ कर ।

चमकदार कीड़ा जो भाया उसे ,

तो टोपी में झटपट छुपाया उसे ।

तो ग़मग़ीन कैदी ने की इल्तज़ा ,

‘ओ छोटा शिकारी ,मुझे कर रिहा ।

ख़ुदा के लिए छोड़ दे ,छोड़ दे ,

मेरे कैद के जाल को तोड दे ।’

-”करूंगा न आज़ाद उस वक्त तक ,

कि देखूं न दिन में तेरी मैं चमक ।”

-”चमक मेरी दिन में न पाओगे तुम ,

उजाले में वो तो हो जाएगी गुम ।

न अल्हड़पने से बनो पायमाल -

समझ कर चलो- आदमी की सी चाल” ।

-अल्लामा इक़बाल ।

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