Archive for the 'Uncategorized' Category

” मगर, आपका असली नाम क्या है ?”

    डॉ. अजित वडनेरकर ने कई किश्तों में मेरा आत्मकथ्य छापा । आम तौर पर जितने लोग मुझे पढ़ते हैं उससे कहीं ज्यादा लोगों ने टीपा भी ।  ” मगर , आपका नाम क्या है ?” कई लोगों ने यही पूछा तो कुछ समय के लिए लगा कि मैं शोले की बसन्ती हो गया ? वही कहावत हुई कि सारी रामायण बीत गयी ,पूछ रहे है सीता……….

    चिट्ठालोक से अलग भी यह सवाल मुझसे पूछा जाता रहा है लेकिन चिट्ठालोक में अनामदासों की भरमार के कारण मेरे जैसे अललटप्पू नाम की बाबत यह सवाल पूछा जाना लाजमी है। ‘शब्दों का सफ़र’ पर लगातार कुछ दिन छपने के संक्रमण के प्रभाव में सर्वप्रथम यह बता दूँ कि प्लेटो ,प्लातो, अप्लातो ,अफ़लातू इस क्रम में यूनानी से फारसीकरण हुआ है । ऐसे ही इसी परम्परा के दार्शनिक सॉक्रेटीस और ऍरिस्टॉटल भारत में सुकरात और अरस्तू पुकारे जाते हैं । मेरे दो भतीजे सुकरात और अरस्तू भी हैं । 

  मेरे पिता उपनिषद के नचिकेता और अशोक की पुत्री संघमित्रा के नाम मेरे बड़े भाई बहन के रख चुके थे तब तीसरे नम्बर पर यूनानी सभ्यता से यह नाम लिया गया । वैसे गुजराती में अफ़लातून के माएने हँसमुख भी है ।

डेढ़ रुपए के अनूठे सिक्के का राज

    इस सिक्के ने लाजमीतौर पर पाठकों का ध्यान खींचा । हमारे देश में साक्षरता की कमी और अल्प-साक्षरता के कारण जिनके हाथ यह सिक्का लगा उनमें से कइयों ने इसे डेढ़ रुपए का सिक्का माना ।

    लावण्या जी, यह सिक्का नकली नहीं है और न ही तृटिपूर्ण है , फिर भी अनूठा तो है ही ।तृटिपूर्ण होने पर इसका संग्रह-मूल्य अत्यधिक हो जाता। चिट्ठे पढ़ने वाले किसी अन्य पाठक ने ऐसा सिक्का पा कर इस पर ध्यान नहीं दिया । दो टिप्पणीकर्ता बन्धु जो सिक्कों के बारे में विशेष रुचि रखते हैं - रंजन और संजय बेंगाणी ने विशिष्ट ज्ञान प्रकट किया।दोनों ने काफ़ी सही कहा। बन्धु रंजन ,पहली भारतीय रेल मुम्बई से ठाणे चली थी और इसके डेढ़ सौ साल पूरे होने में अभी देर है । कितनी देर है ? 

    भारतीय डाक के 150 वर्ष सन 2004 में पूरे हुए , जिस उपलक्ष्य में यह सिक्का जारी हुआ था। सिक्के का दूसरा पहलू नीचे दे रहा हूँ ।

‘डेढ़ रुपए’ के सिक्के की असलियत

डेढ़ रुपए का सिक्का

डेढ़ रुपए का सिक्का

आपने यह सिक्का देखा है ? इसके पृष्ट भाग पर 150 अंकित है और यह 2004 में टकसाल से निकला है । मेरे घर के कपड़े लोहा करने वाले मित्र मनोज को कल जब इस सिक्के को दिखाया तब उसने कहा,’डेढ रुपए के सिक्के के बारे में सुना जरूर था,पहली बार देख रहा हूँ।’

मैंने कल ही इसे प्राप्त किया है ‘केशव पान भण्डार’ में कार्यरत राजू यादव से । राजू ने इसे करीब दो वर्षों से सहेज कर रक्खा था।

क्या आप लोगों ने डेढ़ रुपए का सिक्का देखा है?जानकारी का स्वागत है। पाठकों में जानकारी का अभाव रहा तो ‘आलोकपात’ किया जाएगा।

करीब २७-२८ वर्ष पहले पचास की नोट पर बने संसद-भवन के चित्र पर तिरंगा नदारद था।मित्र सुशील त्रिपाठी ने उसका चित्र ‘दिनमान’ या ‘रविवार’ में छपवाया।संसद-भवन शोक से बाहर आ गया था और झण्डा फहराने लगा।

बचपन की कुछ यादें

Technorati tags: ,

    अभय तिवारी ने हाल ही में ‘ बीटल्स ‘ और उनके एक गीत का सुन्दर परिचय दिया है । शैशव की कुछ यादें ताज़ा हो गयीं ।

    एक सब्जी बेचने वाली मुझे ‘ पेट - पोछनू ‘ कहती थी । वह बाजार में पटरी पर सब्जी बेचने के अलावा घर - घर घूम कर भी बेचती थी इसलिए इस हक़ीकत से वाकिफ़ थी कि मैं पेट - पोछनू हूँ । पेट - पोछनू यानी माँ का पेट पोछ कर दुनिया में आने वाला । अन्तिम सन्तान ।

    बड़ी बहन संघमित्रा और बड़े भाई नचिकेता के साथ सिर्फ़ एक साल मैं स्कूल गया हूँ - १९६४ - ‘६५ में । बहन दसवीं पास कर अनुगुल ( ओड़ीसा ) पढ़ने चली गयी । एक साल वहाँ पढ़कर वह कोलकाता में डॉक्टरी की पढ़ाई करने लगी ।

    कोलकाता से जब छुट्टियों में बनारस आती तब हॉस्टल के खर्च से कर -कसर द्वारा बचाए पैसों से छोटी - मोटी चीजें लाती । कभी बा के लिए कोलकाता के ‘ न्यू मार्केट ‘ में बिकने वाला लाल - पन्नी में लिपटा देशी चीज़ , मेरे लिए किताबें अथवा सब के लिए छोटे वाले (ई.पी.) ग्रामोफोन - रेकॉर्ड । बनारस में इन रेकॉर्डों को तवा कहा जाता था , यह अनुवाद मुझे अत्यन्त सटीक लगता था । इसके पहले अख़बार और आकाशवाणी पर खेलों के रेकॉर्ड से ही मेरा तार्रुफ़ था , जिन्हें खिलाड़ी या टीमें तोड़ती थीं । संगीत के रेकॉर्ड जमीन पर पटकने पर टुकड़े - टुकड़े हो जाएँगे , इसका अन्दाज ठीक - ठीक था ।

    मेरे बचपन में बाईस्कोप वाले हाथ से चाभी देने वाले ग्रामोफोन पर ७८ आर.पी.एम. वाले बहुत तेज घूमने वाले रेकॉर्ड बजाते थे । आर.पी.एम यानी प्रति मिनट चक्कर ।७८ आर.पी.एम वाले तवे मझोले आकार के और कुछ मोटे होते थे लेकिन तेजी से चलने के कारण बहुत जल्द पूरे होते । बहन कोलकाता से छोटे वाले तवे लाती - ४५ आर.पी.एम या ई.पी. ( Extended play ) |

    कोलकाता से आने वाले छोटे तवों में बा और बाबूभाई ( पिता ) का पसन्दीदा रवीन्द्र -संगीत और नचिकेता के लिए पश्चिमी संगीत ।‘ वेन्चर्स ‘‘ का तेज वाद्य - संगीत और बीटल्स का ‘ लॉंग टॉल सैली ‘ मुझे याद हैं । नचिकेता इतना ज्यादा उन्हें सुनता कि एक बार बा ने उसे (उस तवे को ) पटक  कर तोड़ने की धमकी भी दी थी । १९७७ में जब मैं भारतीय सांख्यिकी संस्थान में पढ़ने गया तब हॉस्टल के सामूहिक रेकॉर्ड-प्लेयर पर सुनने के लिए इन तवों को ले गया था ।

    तीनों भाई - बहनों में संगीत का ज्ञान और हुनर सर्वाधिक नचिकेता में ही है । वह काफ़ी अच्छा माउथ - ऑर्गन बजा लेता है ।

 

फिर ममेरे बड़े भाई कबीर बनारस इन्जीनियरिंग पढ़ने आये । उन्होंने पहले गिटार फिर सरोद बजाना सीखा । नचिकेता के मित्र सुधीर चक्रवर्ती का ताल -ज्ञान अधिक था । वे दो प्लास्टिक की बाल्टियाँ उलट कर बोंगों बजाते थे । नचिकेता के माउथ ऑर्गन के साथ उनके ‘बोंगो’ का अभ्यास बाथरूम में हुआ करता था ताकि गूँज का आनन्द मिले । विविध - भारती, ऑल इण्डिया रेडियो का उर्दू प्रोग्राम या रेडियो सिलोन पर बजने वाले फिल्मी गीतों के ताल और विभिन्न वाद्यों के आधार पर संगीतकार को पहचानने का खेल नचिकेता मुझसे खेलता । ‘घोड़ा-गाड़ी’ की ताल वाले ओ.पी नैय्यर अथवा ‘बक-अप तिवारीजी ताल’(यह धा गि ना ति ना क धि न पर सटीक बैठता है) वाले कल्याणजी-आनन्दजी का संगीत मैं पहचान लेता था ।

    पिताजी को साबरमती आश्रम में पण्डित खरे के सान्निध्य में संगीत-संस्कार मिला था। नानी विश्व-भारती के पहले बैच की छात्रा थीं और वीणा बजातीं थीं । पन्नालाल घोष की बाँसुरी , बिस्मिलाह ख़ान की शहनाई ,पलुस्कर और सुब्बलक्ष्मी के भजन और निखिल बनर्जी के सितार के रेकॉर्ड भी हम सुनते ।

 

    स्कूल में पहले गिरिजा देवी की योज्ञ शिष्या . डॉ. मन्जू सुन्दरम और बाद में पण्डित छन्नूलाल मिश्र मेरे कण्ठ-संगीत के शिक्षक थे । स्कूल से निकलने के तीस साल बाद सहपाठी महेश से जब हाल ही में फोन पर बात हुई तब उसने स्कूल की ‘गीतमालिका’ जुटाने की गुजारिश की । मन्जू गुरुजी उन गीतों का सीडी बनाती हैं तब संजाल पर प्रस्तुत कर सकूँगा। स्कूल में उनसे सीखा एक गीत स्मृति से दे रहा हूँ ।इसे बेटी प्योली को लोरी के रूप में सुनाता था।

   अतहि सुन्दर पालना गढ़ि लाओ रे बढ़इया, गढ़ि लाओ रे बढ़इया

    शीत चन्दन कटाऊँ धरी,खलादि रंग लगाऊँ विविध ,

चौकी बनाओ रंग रेशम ,लगाओ हीरा, मोती ,लाल बढ़इया ।

    आनी धर्यो नन्दलाल सुन्दर,व्रज-वधु देखे बार-बार

    शोभा नहि गाए जाए ,धनी ,धनी ,धन्य है बढ़इया ।।

    अमेरिका के अश्वेत ‘नागरिक अधिकार आन्दोलन’ का सांस्कृतिक पक्ष अत्यन्त प्रभावशाली रहा है । जॉन बेज़ और पीट सीगर गीत अत्यन्त प्रभावशाली थे । इस दौर के काफ़ी पहले पॉल रॉबसन की रोबीली धीर गंभीर आवाज में नीग्रों प्रार्थना और गीत आए थे । इन तीनों हस्तियों के बारे में फिर कभी ।

मेहनतकशों का अपूर्ण ककहरा : रामकुमार कृषक

Technorati tags: ,

[ '८० के दशक की शुरुआत में यह गीत जो 'वंचितों के शिक्षा-शास्त्र' के पॉलो फ़्रेरे के दर्शन से मेल खाता है , लमही गाँव में राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चे के सम्मेलन में कृषक जी से तरन्नुम में सुना था । पूरा याद  नहीं है। भरोसा है,कोई जनवादी इसे पूरा कर देगा,यहीं । चिट्ठेकार अविनाश की पसन्द पर यहाँ दे रहा हूँ । ]

‘ क ‘ से काम कर ,

‘ ख ‘ से खा मत ,

‘ ग ‘ से गीत सुना ,

‘ घ ‘ से घर की बात न करना ,  खाली ।

सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली !

‘ च ‘ को सौंप चटाई ,

‘ छ ‘ ने छल छाया ,

‘ ज ‘ जंगल ने , ‘ झ ‘ का झण्डा फहराया ,

झगड़े ने बीचोबीच दबा डाली ,

सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली !

‘ ट ‘ टूटे , ‘ ठ ‘ ठिटके ,

यूँ ‘ ड ‘ डरा गया ,

‘ ढ ‘ की ढपली हम ,

जो आया , बजा गया ।

आगे कभी न आई ‘ ण ‘ पीछे वाली,

सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली !

- रामकुमार कृषक

मेरी बगिया ( २ )

Technorati tags: , , ,

    अनामदासजी , भाग्यवान जरूर हूँ कि महमना मालवीय द्वारा स्थापित इस परिसर में रहता हूँ। जिन चित्रों को यहाँ पेश कर रहा हूँ वे हमारे आवास की बगिया के हैं । मेरी पत्नी डॉ. स्वाति काशी विश्वविद्यालय में भौतिकी की व्याख्याता हैं।अधिकांश फलदार वृक्ष - लंगडा , अमरूद , चार तरह के नीबू , कटहल ,  ताड़ प्रोफ़ेसर कैलाशचन्द्र बसुचौधरीजी के लगाये हुए हैं। वे इसी आवास में कई वर्ष रहे और अवकाश-प्राप्ति के बाद आगरा में हैं ।प्रो. बसुचौधरी मेरे साढू भी हैं। इस आवास को हम पसन्द करते थे और पत्नी को वरिष्टता के आधार पर , कुछ साल पहले यह आवण्टित भी हो गया । अब अवकाशप्राप्ति तक यह आवास नहीं छोड़ना है ।

    बचपन में भाई - बहन (बड़े) का एक बॉक्स कैमेरा था - कोडाक ब्राउनी , दरजा आठ में पहुँचे तब हमारे हाथ आया । स्कूल में फिल्म की धुलाई पर भी हाथ आजमाने का अवसर मिला । बहरहाल वह बक्से वाला कैमेरा शायद किसी भतीजे को दे दिया गया था । साल - डेढ़ साल पहले एक छोटी बहन और एक भाभी ने यह कैमेरा भेंट दिया जिससे से फिर तसवीरें खींच रहा हूँ । मेरे साथी चंचल मुखर्जी का कहना था कि कैमेरा एक काम का औजार है, पुलिस दमन आदि की फोटू बतौर प्रमाण खींच कर रखी जा सकती है ।

    प्रत्यक्षा , पक्षियों के चित्र खींचना सरल नहीं है । काफ़ी धीरज चाहिए। उनमें कुछ ज्यादा शर्मीले पक्षियों की तसवीर खींचने में धीरज ,फुरसत , तकनीक और तालीम की जरूरत शायद और अधिक हो ? इस कठफोडवे को देख पा रही हैं ?

अपनी लाल कलगी के कारण शायद ध्यान खीच ले । मैंने पाया है कि अक्सर लोग हुदहुद को कठफोड़वा समझ बैठते हैं । बड़ी तसवीर को छाँट कर दिखा पा रहा हूँ। कुछ दिन पहले कुछ चिट्ठाकार कौए न दिखने से परेशान थे । मुझे बचपन में देखे हुए कौओं के सम्मेलनों की स्पष्ट याद है,लेकिन फिलहाल इन महाशय को खींचने के लिए मुझे एक बड़े सेमर के पेड़ सहित खींचना पड़ा - 

    आज कल एक लाल चक्षु कोयल(सभी कोयलों की आँखें लाल ही होती होंगी) कटहल और चम्पा पर आती है । कोयल की तसवीर लेना एक चुनौती है। लेकिन इनको मैं सफेद पेट वाली रॉबिन जानता हूँ -

और इस सुन्दर फूल का नाम कोई बताए,मैं नहीं जानता -

  यह गन्धराज नामक नीबू है । कुछ लम्बोतरे,मोटी खाल और विशिष्ट सुगन्ध वाले।

  इस नीबू की खाल पतली है और फल के कुल वजन में रस का अनुपात ज्यादा ।

    आप सब इस छोटी से बगिया को देखने आ सकते हैं- खैरम कदम । लिली के बल्ब ,कटहल,आम,नीबू - रहा तो मिल भी सकता है ।

खेल - खेल में थोड़ी सी राम-कहानी

    [मैथिलीजी के सवाल और डॉ. सुनील दीपक द्वारा बढ़ाए गए सवालों के जवाब मुझे देने हैं।]

    बचपन की यादें बहुत खुशनुमा हैं । मैथिली जी के प्रश्न के बाद कई घटनाएं याद आईं । ‘शैशव’ नाम का यह चिट्ठा बच्चों के लिए है । बचपन में सीखी कुछ कविताओं को यहाँ रखा है ।बच्चों के लायक संस्मरण भी यहाँ हैं।इसीलिए मैथिलीजी के एक प्रश्न के उत्तर के लिए इस ‘उत्तर-पुस्तिका’ का चयन किया है।

    ‘छोटे बचपन’ से शुरु करता हूँ । ‘छोटा बचपन’ , ‘बड़ा बचपन’ मेरी बेटी के दिए हुए काल-विभाजन के नाम हैं । छोटे बचपन की कई बातें बड़ों से सुनी हुई भी होती हैं और उन्हे भी भी ‘मुझे याद है’ कह कर चला दिया जाता है । मेरे बचपन का मित्र सितान्शु जब अपने बड़े बचपन में छोटे बचपन की बातें बताता था तब उसका भाई सुधान्शु हमेशा यह कहने से नहीं चूकता था,’सित्तू को अपने जनम के पहले की बातें भी याद हैं ।’ मैं यहाँ जिन घटनाओं का हवाला दूँगा उन्हें मैंने बडों से नहीं सुना ।

    ‘बालवाड़ी’ में छोटे-छोटे खेती-बाड़ी के साधन थे - छोटी खुरपी , छोटा फावड़ा ,छोटा बेलचा ,पौधों को सींचने के लिए छोटा झारा ,छोटी टोकरी और छोटी बाल्टी । इनकी मदद से क्यारियों में कुछ लगाया जाता था । एक बार मेरी माँ ने एक तैयार क्यारी में उंगली से मेरा नाम लिख दिया।लिखे हुए पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर मेथी के बीज उंगली से किए छेदों में डालकर उसे समतल कर,सींचा गया । मेथी के नन्हे पत्ते मेरी नाम की आकृति में निकले तब बड़ी खुशी हुई ।

    बालवाड़ी के बाद स्कूल जाना शुरु किया । मैं बँयहत्था हूँ और कोई शिक्षिका बार-बार दाहिने हाथ में पेन्सिल या खड़िया बाँए से छीन कर पकड़ा देतीं। मैं शायद लिखने से चिढ़ने लगा और कहता था कि टाइप करूँगा,लिखूँगा नहीं ।’ आँखें मूँद कर टाइपिंग’ अब तक नहीं सीखी। पिताजी और बड़े भाई जानते हैं ।

    हर घण्टी की शुरुआत में एकाध मिनट शान्ति से बैठना होता था ।इस अवधि में आँखें मुँदी हों,यह भी  अपेक्षित था।एक बार ‘शान्ति’ के बाद हमारी आशा गुरुजी ने तीन-चार बच्चों का नाम लेकर टोका कि इन लोगों ने आँखें बन्द नहीं की थी। मुझे याद है  कि मैंने तुरन्त कहा,’कि यह आपको कैसे मालूम हुआ?आपने भी आँख खोल कर ही हमे देखा था ।’

    अब बड़े बचपन की कुछ बातें । मैं जिस परिसर में रहता था उसके एक तरफ वरुणा , दूसरी तरफ गंगा और तीसरी तरफ काशी रेलवे स्टेशन है ।गंगाजी  बड़ों के बिना नहीं जाते थे। गंगाजी में पिताजी तैरते तो उनकी चड्डी का नाड़ा पकड़ कर पैर हिलाते थे ।वरुणा साल के बड़े हिस्से में क्षीणकाय रहती थीं खेलने,बेर खाने जाते थे ।स्टेशन पर टहलने भी अक्सर जाते थे । स्टेशन के माल-गोदाम तक डिब्बों को लाने के लिए पटरियाँ थी । कोयले के इंजन द्वारा उनकी शन्टिंग की जाती थी । कभी-कभी ड्राइवर को ताकते रहने पर वे ऊपर खींच कर इंजन-दर्शन करा देते थे ।काफी दिनों बाद एक बार विलायत से आए दो परिचितों को बनारस दिखाने ले गया था(बाहर से आए मेहमानों से माँ कहती यह अच्छी पण्डागिरी कर लेता है)। उन विलायती मित्रों में से एक ने बिल्ली-मुख कोयला इंजन की ढेर सारी फोटू खींचीं तब कुछ महत्व समझ में आया । डीजल इंजन वाली मालगाड़ियों से कोयला ढ़ोना तब भी होता था। डीजल विदेशी मुद्रा खर्च करके भी मंगवाया जाता है और कोयला - भण्डार उसके बाद खत्म होगा,तब भी ऐसा क्यों किया जा रहा है?इस सवाल पर काफ़ी बाद में विचार हुआ ।

    ऐसे ही एक बार जब मित्र-मण्डली स्टेशन पहुँची तब पता चला कि स्टेशन पर पाकिस्तानी युद्ध बन्दियों की ट्रेन खड़ी है । उत्सुकता के साथ हम सब उस प्लैट्फॉर्म पर पहुँचे । प्रथम श्रेणी के जिन डिब्बों में पाक सैन्य अफसर थे उनके बाहर भारतीय सैनिकों को सलाम बजा,आदेश लेते देखा।युद्ध बन्दियों को मिलने वाले ओहदानुकूल सम्मान का अन्दाज समझ में आया । तब भारतीय रेल में तीसरा दर्जा भी था और तीसरे दर्जे के डिब्बों में खिड़कियाँ बिना छड़ों की होती थीं(जनाना डिब्बे की खिड़्कियों में छड़ें होती थीं,माँ के साथ उस में भी यात्रा की है,आधी टिकट के जमाने में।)। हमने गाड़ी की परिक्रमा की और छोटे बचपन में इंजन ड्राइवरों को जैसे ताकते थे शायद वैसे ही ताक रहे होंगे क्योंकि एक डिब्बे की खुली खिड़की से हमे खींच लिया गया ।कुछ देर सैनिकों की चुहलबाजी चली,हम बच्चों से सब बहुत खुश थे।डिब्बे में युद्धबन्दी ज्यादा थे, भारतीय सैनिक कम थे। फर्क सिर्फ़ वर्दी में था।

    पूर्वी कमान के मुख्य अधिकारी जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा देश के हीरो थे। उनके सहपाठी रहे पाकिस्तानी अफ़सर नियाज़ी के आत्मसमर्पण का आकाशवाणी पर देवकीनन्दन पान्डेय ने आँखों देखा हाल सुनाया था। उसके पहले पूर्वी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के लिए बने शिविरों में भी जाने का मौका मिला था।’ओपार थेके आशचे कारा,आमादेरी भाई-बोनेरा’( उस पार से आ रहे हैं कौन? हमारे ही भाई-बहन) कह कर २४ परगना के बोनगाँ की गलियों में अन्न-वस्त्र जुटाने के लिए निकले जुलूस में शामिल था।देश बना नहीं था लेकिन उसका राष्ट्र-गान, ‘आमार सोनार बाँग्ला,आमि तोमाय भालो बाशी’ तय हो चुका था और शिबिर में सिखाया जाता था,हमने भी सीखा।यह गीत भी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ का लिखा है- जैसे ‘सारे जहाँ से अच्छा , हिन्दोस्ताँ हमारा’ और पाकिस्तान का राष्ट्रीय-गान ‘ए पाक सर-जमीं’ दोनों अल्लामा इक़बाल के लिखे गीत हैं।इन सुन्दर संयोगों की जानकारी भी उसी शिबिर में हुई थी । बांग्लादेश के साथियों के साथ बांग्ला के महान कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम के दर्शन करने का भी मौका मिला था।धर्म के आधार पर हुआ बँटवारा टिकाऊ नहीं होता।लोकमत की उपेक्षा के विरुद्ध संघर्ष ने एक नए राष्ट्र को जन्म दिया।बांग्ला भाषा की उपेक्षा के विरुद्ध छठे दशक में हुए छात्र -आन्दोलन से ही शायद जमीन बनने लगी थी। शेख मुजीब की ‘सिंहध्वनि’ ‘रेडियो बाँग्लादेश’ से रह रह कर सुनाई जाती थी -  ’ए बारेर एई संग्राम- स्वाधीनतार संग्राम,ए बारेर एई संग्राम मुक्तिर संग्राम’।

    एक और घटना का उल्लेख करने का मोह है । जिद्दू कृष्णमूर्ति से जुड़े स्कूल में मैं पढ़ा।आम तौर पर साल में एक बार वे भारत आते तब स्कूल के विद्यार्थियों और जनता के बीच उनके अलग-अलग भाषण होते थे । स्कूल की मामूली समस्याओं को लेकर ‘बड़े बच्चों’ (कक्षा ९,१०,११ के छात्र) ने उनका भाषण शुरु होने के पहले हॉल से बहिर्गमन कर दिया ।कृष्णमूर्ति फाउन्डेशन के कर्ता-धर्ताओं को लगा मानो किसी विधर्मी ने मूर्ति को छू दिया हो । ‘गुरुडम’ के आलोचक कृष्णजी ने शिद्दत से जानना चाहा कि बहिष्कार क्यों हुआ?उनकी सभा में ऐसा कभी नहीं हुआ था ।हम लोगों की कृष्णजी के साथ अलग से चर्चा आयोजित की गई ।शुरु में ही हमने कह दिया कि हम हिन्दी में बोलेंगे।उन्होंने पूछा कि अनुवादक किसे रखना चाहते हो ? मैंने अच्युत पटवर्धनजी का नाम दिया। बीच-बीच में कृष्णजी की बातों से अनुवाद लम्बा हो जा रहा था तब उन्होंने पूछा कि वे उतना ही अनुवाद कर रहे हैं या नहीं? अच्युतजी ने कहा कि वे थोड़ा समझा भी दे रहे हैं। कृष्णजी ने कहा कि वे उतना ही अनुवाद करें जितना बोला जा रहा है । कृष्णमूर्ति ने हम लोगों से जो कहा वह महत्वपूर्ण है । उन्होंने कहा कि दो तरह के नियम हो सकते हैं।ऐसे नियम जिन से दूसरों की सुविधा जुड़ी हो-जैसे भोजन के के लिए निर्धारित समय पर न पहुँचन पर रसोइए के भोजन में भी देर हो जाएगी । ऐसे नियमों को मानना चाहिए । बाल छोटे रखें या बड़े ? कपड़े कैसे हों? ऐसे प्रश्नों पर विद्यार्थियों को छूट होनी चाहिए।

    विश्विद्यालय के छात्रावास के कमरे में मैंने कृष्णमूर्ति का उद्धरण लगा रखा था ,’ It is the intelligence that brings order,not discipline.’ ( अच्छा सा अनुवाद अनूप शुक्ला कर सकते हैं) ।

   अब उत्तर पुस्तिका बदली जा रही है। अन्य सवाल यहाँ के लायक नहीं हैं : चिट्ठेकारी का भविष्य,चिट्ठेकारी से मुझ में आए परिवर्तन आदि,आदि।

Technorati tags: ,

पू. साने गुरुजी का समग्र साहित्य हिन्दी में

श्री पांडुरंग सदाशिव साने उर्फ़ साने गुरुजी महाराष्ट्र के स्वनामधन्य लेखक और श्रेष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता थे । उनके विचारों की दायपर महाराष्ट्र की तीन पीढियाँ पलीं । राष्ट्रसेवा, समाजसेवा और मानव सेवा में इन पीढियोंने अपनी पूरी जिन्दगी लगा दी ।

    आज भी पू. साने गुरुजी का साहित्य युवक-युवतियों, बालकों तथा वृद्धों का विचार-विश्व समृद्ध करता रहता है। पू. साने गुरुजी कथामाला ने यह तय किया है कि उनका समग्र साहित्य हिन्दी में प्रकाशित किया जाय। जिसमें लगभग १२० किताबें हैं ।पहली कड़ी में चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं ।

भारतीय नारी - साने गुरुजी

अनुवाद - डॉ. पीतांबर सरोदे

साने गुरुजी की अखंड ज्ञानसाधना का परिचय देनेवाली यह पुस्तक भारतीय नारी की वेदकाल से लेकर इक्कीसवीं सदी तक की यात्रा का सम्यक परिचय देती है।वह अपार त्याग की प्रतिमा है।वेदकाल में वह स्वाश्रयी, ज्ञानी तथा कष्ट करने वाली थी।वेदोत्तर काल में उसे गौणत्व आया।महात्मा फुले,गोपाल गणेश आगरकर के समय नारी जीवन कई बन्धनों से घिरा हुआ था ।पर स्वतंत्रता आंदोलन में गांधीजीने उसकी मुक्ति की राह खोल दी।विभिन्न क्षेत्रोंमें भारतीय नारीने अपना योगदान दिया। छोटी-सी यह पुस्तक ‘भारतीय नारी’ के विकास का सच्चा लेखा-जोखा है। कीमत - रु. ११/-

हिमालय के शिखर - साने गुरुजी

                                    अनुवाद - डॉ. विश्वास पाटील

राम का वर्णन करते हुए वाल्मीकिने कहा कि उनमें हिमालय की अडिगता और सागर की गंभीरता है। साने गुरुजीने भारतीय जीवन के कुछ ऐसे ही उत्तुंग चरित्रोंको चुना जिनमें स्त्री-पुरुष दोनों हैं - जो हमें प्रभावित करते हैं। युवा पीढी को हम इस ग्रंथ के माध्यम से उस भव्य भारत का परिचय करा देंगे जिसकी ईंट- ईंट इन सपूतोंने रची। भारत का भाल उज्वल करनेवाले ये पात्र सही मानेमें ‘हिमालय के शिखर’ हैं। कीमत - रु. २१/-

भगवान श्रीकृष्ण - साने गुरुजी

अनुवाद - डॉ. निशा ढवळे

भगवान श्रीकृष्ण का चरित्र मानवीय सद्गुणोंसे पूर्णत: संपन्न चरित्र है। साने गुरुजी ने इस चरित्र में श्रीकृष्ण के उन कार्योंका विशद विवरण किया जो चमत्कार नहीं,मानवों की विविधांगी रक्षा करनेवाले थे। कृष्ण एक जननायक थे।उनके इसी जननायकत्व की चर्चा साने गुरुजीने प्रस्तुत पुस्तक में की है। देवी-देवताओं के चरित्र चमत्कारों के लिए नहीं ,राष्ट्रनिर्माण के लिए और जीवन को मूल्य संपन्न बनाने के लिए हों,ऐसी प्रेरणा यह पुस्तक देती है। कीमत - रु. ११/-

मेरे देवता - साने गुरुजी

अनुवाद - डॉ. मु. ब. शाह

साने गुरुजी कहते हैं ‘मानवी देवताओंने ही नहीं,मनवेतर देवताओं ने तक मुझपर कृपा की बरसात की। इस सारी सजीव सृष्टि में मेरी परवरिश हुई है।’ जिन जिन का उनके जीवनपर मंगल प्रभाव पडा उन देवताओं की अनोखी कहानी ,अनोखा चिंतन इस पुस्तक में है। प्रभाव डालनेवाले ये देवता हैं - आकाश ,प्रकाश,पानी,प्राचीन ऋषिवर,ध्रुव और प्रह्लाद । कीमत - रु.१५/-

शीघ्र प्रकाशित होनेवाली पुस्तकें

गीता हृदय - साने गुरुजी

अनुवाद - डॉ. विश्वास पाटील

धूलिया के कारावासमें पू. विनोबाजी ने जो प्रवचन दिए वे ‘गीता प्रवचन’ के रूपमें भारत की भाषा भगिनियों के कंठहार बने। उसके पहले और बाद में भी साने गुरुजी के जीवन में गीता का स्थान वरेण्य रहा । गीता के १८ अध्यायों को गुरुजी ने अपनी प्राणवान शैली में न केवल दुहराया है अपितु उनकी नई और युगसंमत व्याख्या भी की है। गीतामें बुद्धि से प्रवेश तो किया जा सकता है पर हृदय के बिना बाहर निकला नहीं जा सकता। साने गुरुजी की यह पुस्तक गीता का बुद्धिसंपन्न आलेखन है ।

कौए - साने गुरुजी

अनुवाद - डॉ. पीतांबर सरोदे

कहने के लिए यह कौवों की कहानी है। पर उनके बहाने पू. साने गुरुजी ने मनुष्य जाति के सद्गुण और दुर्गुणोंकी बड़ी सटीक व्याख्या की है।मनुष्य जगत से पक्षी और पशु जगतका न्याय अधिक तर्कसंगत कैसे है यह बताते हुए उन्होंने मनुष्य जाति के पशु-पक्षी जगत के साथ होनेवाले दुर्व्यवहारोंकी मार्मिक व्याख्या की है।पुस्तक एकार्थ में पूरे मानव जाति के व्यवहार की मर्मकथा है।

मोरी गाय - साने गुरुजी

अनुवाद - डॉ. विश्वास पाटील

साने गुरुजी के जीवनमें अद्वैत का जो विचार रम गया था उसके परिणाम स्वरूप चराचर सृष्टिमें उन्हें चैतन्य के दर्शन हुए।पशु-पक्षी हमारे न केवल संगी-साथी हैं,अपितु हमारे जीवन के पक्षधर भी हैं। गाय को गाँधीजी ‘करुणा की कविता’ कहते थे। गाय,गंगा,गीता,गाँव और गाँधी भारत के पंचप्राण हैं। गाय का मनुष्य जीवनमें जो स्थान है वह प्रकृति और पर्यावरणमें संतुलन का है। साने गुरुजी ने इस माध्यम से गाय की महिमा का वर्णन किया है। न केवल बच्चों के लिए वरन तमाम विचारशील लोगों के लिए अत्यावश्यक है यह पुस्तक।

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

इन पुस्तकों को निम्न पते से मँगवाया जा सकता है :

प्राचार्य अनिल लोहार

सीताराम बाहेती कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स,

पोस्ट/जिला जळगाँव (महाराष्ट्र)

इन पुस्तकों के प्रकाशक -

Technorati tags: ,

श्री पन्नालाल सुराणा,

अध्यक्ष, अ.भा. साने गुरुजी कथामाला,

साने गुरुजी हाई स्कूल,

भिकोबा पाठारे मार्ग,

दादर(पूर्व), मुंबई.

जाड़े की धूप

जाड़े की धूप

बापू की गोद में (२०) : जमनालालजी

     सन १९४२ - ४३ का वर्ष भारत के इतिहास में बड़ि धूमधाम का था । देश में पिछले पचास वर्षों में जो परिवर्तन नहीं हो सके थे , वे इस एक ही वर्ष में हो गये । बापू के आश्रम की दृष्टि से देखा जाय तो १९४२ की फरवरी से ले कर १९४४ की फरवरी तक बापू ने पहले जमनालालजी , फिर महादेवभाई और कस्तूरबा को खो दिया था । एक से एक बढ़कर निजी सम्बन्ध के ये व्यक्ति ! हरएक से गहरा आत्मीय सम्बन्ध । बापू के जीवन में इन दो वर्षों के जैसा शायद ही काल होगा , जिसमें उनको इतने व्यक्तिगत आघात सहन करने पड़े होंगे । स्वातंत्र्य-संग्राम के यज्ञ में अंतिम आहुति का यह काल था । उसमें इन तीनों का बलिदान एक पवित्रतम बलिदान माना जाएगा ।

    जमनालालजी को बापू के दरबार के नवरत्नों में से एक कहा जायगा । उनके सम्बन्ध में बापू ने एक बार लिखा था : ‘ बाईस साल पहले की बात है , तीस साल का एक नवयुवक मेरे पास आकर कहने लगा , ‘ आपके पास मेरी एक माँग है । ‘ मैंने चकित होकर कहा , ‘माँगो - माँगो , मुझसे वह माँग पूरी हो सकती है तो जरूर पूरी करूँगा । ‘ नवयुवक ने कहा , ‘ आप मुझे अपने देवदास की जगह पर समझें । ‘ मैंने कहा अच्छा मान लिया। लेकिन इसमें आपने क्या माँगा ? वास्तव में इसमें आपने दिया और मैंने प्राप्त किया , ऐसा हुआ है।’

    ‘ यह नवयुवक जमनालाल थे । वे मेरे पुत्र बनकर कैसे रहे , यह तो भारतवासियों ने अपनी नजर से देखा ही है। लेकिन मैं तो यही कहूँगा कि मेरी जानकारी में ऐसा पुत्र आज तक किसीको नहीं मिला होगा । ‘

    मृत्यु के कुछ दिन पहले जमनाललजी ने बापू के सामने राजनीति से मुक्त होकर रचनात्मक काम में लग जाने की अपनी इच्छा व्यक्त की थी । वे कांग्रेस की कार्यकारिणी के सदस्य थे और अखिल भारत कांग्रेस कमेटी के खजांची थे । इस समय बापू ने उनके लिए गोसेवा का काम चुना , जो जमनालाजी को हृदय से प्रिय था ।

    बाहर से देखा जाय तो जमनालालजी बापू से मिलने आनेवाले छोटे-बड़े अतिथियों को प्रेमपूर्वक सत्कार करनेवाले यजमान , उनके सम्पर्क में आनेवाले विशाल कार्यकर्ताओं की जमात के जवान लड़के-लड़कियों की शादियाँ तय करा देनेवाले बापू के शब्दों में ‘शादीलाल’ तथा वर्धा और आसपास की दर्जनों संस्थाओं के संस्थापक , पोषक तथा एक दूरदर्शी कुशल व्यापारी थे । लेकिन अन्दर से वे सत्संग के पिपासु , विरक्त और मुमुक्षु थे । आदमी की सही परीक्षा करने में वे किसी पारखी जौहरी को भी शरमा देनेवाले थे ।  साबरमती- आश्रम मे बापू से वर्धा के लिए उन्होंने माँग की तो वह विनोबा जैसे व्यक्ति की , अपने राजनीतिक मामलों में सलाहकार और निजी मंत्री के तौर पर उन्होंने दादा धर्माधिकारी का चुनाव किया , रचनात्मक कार्यों में सत्यनिष्ठ तथा व्यावहारिक सलाह देने के लिए उन्होंने श्रीकृष्णदासजी जाजू को चुना , बजाजवाड़ी में अपने निवास के बगल में उन्होंने किशोरलाल मशरूवाला को बसाया , इसके अलावा कितने ही अप्रसिद्ध , लेकिन चुनिन्दा कार्यकर्ताओं को वे वर्धा खींच लाये थे , उनके सामने उन्होंने अपनी भूमिका नम्र भक्त , जिज्ञासु और जीवनसाधक की ही मानी थी । बापू के काम में आये , तब उन्होंने अपने पास की सारी अर्जित संपत्ति राष्ट्र के चरणों में अर्पित कर दी । लेकिन इस दान के कारण लेशमात्र अहंकार का स्पर्श उनको नहीं हुआ था । संपत्ति के सम्बन्ध में उनकी वृत्ति जनक के जैसी अनासक्त थी ।

    जमनालालजी की बीमारी की खबर सुनते ही बापू सेवाग्राम से वर्धा आने के लिए निकल पड़े । रक्तचाप की अपनी सर्पगंधा नामक दवा साथ लाये थे। लेकिन बापू के पहुँचने से पहले ही बापू के प्राण-पखेरू दुर्भाग्य से उड़ चुके थे । उनका सिर अपनी गोदी में लेकर बापू कहने लगे , ‘ भाई , तू मेरा पाँचवाँ पुत्र बना था , तो मुझसे पहले जाना तो तेरा धर्म नहीं था । ‘

    मृत्यु के बाद उनके मुख पर जो शांति और कांति दिखाई दे रही थी , वैसी क्वचित ही देखने को मिलती है । सारा वर्धा शहर और आसपास के देहातों से बहुत सारे लोग उनकी श्मशान-यात्रा में इकट्ठा हो गये थे । उनका दाह-संस्कार वर्धा से दो मील की दूरी पर गोपुरी में ‘शांति-कुटीर’ नाम के उनके तत्कालीन निवासस्थान के सामने के मैदान में किया गया था। आखिर के दिनों में बजाजवाड़ी का अपना बँगला छोड़कर वे शांति -कुटीर में रहने लगे थे ।

    उनकी पत्नी जानकीदेवी बजाज ने उस समय जमनालालजी की चिता पर ही अपनी देह का विसर्जन करने की इच्छा व्यक्त की थी। उनको बापू ने सलाह दी कि जमनालालजी का गोसेवा का अधूरा काम पूरा करने के लिए उनको जीवित रहना चाहिए। वैसा संकल्प बापू ने उनसे करवाया। जानकीदेवी ने भी अपने हिस्से की सारी संपत्ति गोसेवा-संघ को अर्पण कर दी ।

    जमनालालजी के निमित्त होनेवाली शोक-सभा में विनोबा ने कहा था , ‘जमनालालजी के साथ मेरा बीस साल का परिचय था ; लेकिन उनके मन की जो उन्नत अवस्था पिछले डेढ़-दो महीनों में मैंने देखी , वैसी पहले कभी नहीं देखी थी । मन की ऐसी दुर्लभ अवस्था में मृत्यु हो जाना दुर्लभ बात है । जमनालालजी को वह भाग्य प्राप्त हुआ है ; इसलिए उनकी मृत्यु से मुझको दु:ख नहीं बल्कि आनन्द ही हुआ । इस तरह की पवित्र मृत्यु का लाभ हो , ऐसी हम सब कोशिश करें । आत्मा जब अपनी संकल्प-पूर्ति का दर्शन शरीर में करना सम्भव नहीं मानती है , तब वह शरीर का त्यागकर सबमें प्रवेश करके अपना काम पूरा करती है ।’

    जमनालालजी द्वारा साधु-पुरुषों की जो खोज चलती थी , वह केवल सर्वोदय के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं थी । रमण महर्षि के आश्रम में उनको शान्ति मिलती थी ।माता आनन्दमयी के साथ उनका हार्दिक सम्बन्ध था ।माँ आनन्दमयी जमनालालजी के स्वर्गवास के बाद वर्धा आयीं थीं ।बापू से मिलने वह सेवाग्राम गयी थीं ।अपनी बातचीत में उन्होंने सहज रूप से कहा कि ‘ छह माह के अन्दर-अन्दर और एक महापुरुष का निर्वाण होनेवाला है ।’ यह सुनकर काका को लगा कि यह वचन बापू को लक्ष्य करके कहा गया होगा ।इसलिए वे बहुत उद्विग्न हो उठे थे । काका ने अपनी चिन्ता हमारे सामने भी व्यक्त की थी । लेकिन उन्हें या हमें क्या कल्पना थी कि वह वचन उन्हीं पर लागू होनेवाला था ।

    बापू ने ‘भारत-छोड़ो’ आन्दोलन शुरु किया , तब से काका का काम बहुत बढ़ गया था । मुलाकातों का ताँता लग जाता था । पत्र-व्यवहार का ढेर भी बढ़ गया था । लेख अधिक लिखने पड़ते थे । कुछ कसर रह गयी होगी तो बापू ने पूरी की। उन्होंने कहा,’इस समय की जेल-यात्रा अब तक की यात्राओं से अलग प्रकार की होगी। जेल में पहुँचते ही मैं अन्न-जल का त्याग करने का सोच रहा हूँ।’ इससे काका की चिन्ता और बढ़ गयी।जेल जाते ही अनशन शुरु करने का बापू का विचार काका को जरा भी पसन्द नहीं था । उन्होंने सेवाग्राम में रहते ही बापू के साथ इस सम्बन्ध में पत्रों की झड़ी लगा दी।

    काका का स्वास्थ्य उन दिनों ठीक नहीं रहता था ।आन्दोलन के नगाड़े बजने शुरु हो गये थे । काका को कुछ दिन आराम लेकर अपना स्वास्थ्य ठीक कर लेना चाहिए , इस बात के लिए बापू ने उनको मना किया था ।श्री घनश्यामदास बिड़ला काका को अपने साथ नासिक ले जाने को तैयार हुए । एक सप्ताह आराम लेने का कार्यक्रम बना था । उनके साथ हम में कोई नहीं जाने वाला था।

    वर्धासे फिर फोन आया कि महादेवभाई को स्टेशन पर चक्कर आ गया , इसलिए वे रुक गये हैं। बापू ने संदेशा भिजवाया कि उनको तुरंत सेवाग्राम वापस लाओ। रास्ते में काका को सिविल सर्जन को दिखा दिया गया ।उस दिन बापू की जो व्याकुलता मैंने देखी , वैसी कभी नहीं देखी थी । रविवार का दिन था । हर रविवार की शाम को बापू मौन शुरु करते थे और सोमवार की शाम तक वह जारी रहता था। मौन के दरमियान बापू अपने कमरे से बाहर आकर पास के छोटे कमरे में चले जाते थे , जहाँ टेलीफोन रखा हुआ था। थोड़ी-थोड़ी देर में वे काका के समाचार पूछने की सूचना देते थे ।आखिर काका को लेकर मोटर आ गयी। उनको सीधे हमारे मकान पर लिवा गये। बापू दौड़कर वहाँ पहुँच गये। माँ ने उनके लिए जो बिस्तर तैयार करके रखा था,उसपर उनको सुलाया गया ।बापू ने उनका सिर अपनी गोद में लेकर कहा , ‘क्यों महादेव,अब कैसे हो?’ मगनलालकाका की मृत्यु के के बाद बापू द्वारा अपना मौन-भंग करने का यह पहला प्रसंग था ।

    ‘ बस, मेरी इच्छा पूर्ण हो गयी। स्टेशन पर लगता था कि अब चला। इसीलिए मैंने आग्रहपूर्वक कहा कि मुझे नासिक नहीं जाना है और अस्पताल में भी नहीं जाना है। मरना ही होगा तो बापू की गोद में मस्तक रखकर मरूँगा । फिर भी ये लोग मुझे डॊक्टर के पास ले ही गये । ‘

    बापू अपनी गोद में काका का सिर सहलाते रहे। थोड़े दिनों के बाद यानी १५ अगस्त की सुबह आगा खाँ महल में काका की मृत्यु हुई , तब उनका मस्तक बापू की गो में ही था ।

[ अगला प्रसंग : ९ अगस्त , १९४२ ]

   

     

Technorati tags: ,

Next Page »


www.blogvani.com