Archive for the 'poem' Category

कविता : ब्लैक बोर्ड : ज्ञानेन्द्रपति

 

औचक पहुँचे , उस दिन हमने

साँझ को शुरु होते देखा

चनमा सट्टी चौराहे पर की

उस चाय - दुकान में

ढलती साँझ हमारे पहुँचने तक

जो गहगह होती थी

अब जानता हूँ

उस चाय - दुकान की साँझ

बहुत पहले शुरु हो जाती है

दोपहर ढलते ही

तिपहरी के साथ

उस चाय - दुकान के भोजनावकाश को

समाप्त घोषित करता हुआ

उसका उधड़नीलरंग शटर उठ जाता है , नन्हें हाथों

पूरा नहीं , थोड़ा - सा

बमुश्किल हमारे घुटनों तक

लेकिन काफी उन तीन बच्चों के लिए

जो संझा के अग्रदूत हैं

( और सुबह के भी )

तनिक सिर झुकाकर अबाध उनकी आवाजाही

दुकनिया के भीतर - बाहर

कर्म - कुशल वे तीन नन्हें बच्चे

एक बच्चा - तनिक गुलथुल-सा

और दो बच्चियाँ भूरे केशोंवाली

एक मँझोली हथौड़ी से

बच्चा फोड़ता है कोयले

ऊँकड़ूँ बैठ

बच्चियों में जो बड़ी है , निहुर

एक टुटही झाड़ू से बुहारती है फर्श

साफ , बहुत साफ - झकाझक

दूसरी बच्ची इस बीच

सामान उठाती है धरती है

परात , पतीला , केतली , बोयाम

फिर धुँआ उठता है

देर तक

तब अँगीठी दहकती है

शाम जब बस जाती है

यादवजी की चाय - दुकान चुस्कियों और मुस्कियों से

भरी होती है

वे बच्चे तब नहीं दिखते हैं

वे बच्चे तब हमारे नेत्र-तल के नीचे होते हैं

वे पाँव हैं जिनके बल पर

अचल खड़ी भी वह दुकान चलती है

यादवजी की चाय - दुकान

बड़ी भोर से देर रात तक थिर न रहनेवाले

वे पाँव - जिनसे गुम गया है उनका गन्तव्य

अनथक कदमताल करते हुए जो मार्च कर रहे हैं

नन्हें सिपाहियों के पाँव

जो आगे बढ़कर जीत लेंगे

अपने पिता का निबुध स्वार्थ - समर

और आह ! हार जायेंगे

आखिरकार

वे हाथ-पाँव-भर नहीं, मस्तिष्क-धर भी हैं

शुक्ल-पक्ष के चाँद की तरह बढ़ती हुई

यादवजी की वे सन्तानें

किताबों के चन्द्रोदय से वंचित शाश्वत कृष्ण-पक्ष का अन्हार

फैला होगा जिनके मस्तिष्क में -

बलैक्बोर्ड से अपरिचित बलैकबोर्ड !

- ज्ञानेन्द्रपति .

 

कविता : खून का रिश्ता : ज्ञानेन्द्रपति

वे बच्चे

मूँडी गोत कर

जिन्हें बारह घण्टे करना होता है काम

दरिद्रता के कोख-जाये बेटे

लक्ष्मी की अमरबेल

जिनकी खिच्ची उँगलियों से

लिपटती है

दो आँखों की चाबुक

उनकी झुकी पीठ पर

निगरानी रखती है

घुटनों पर ही नहीं , आत्मा पर घावों वाले

रिसते घावों वाले

वे बच्चे

रिश्तेदार बताये जाते हैं

नजदीकी रिश्तेदार

दूर गाँव के अपने-सगे

और देखते रह जाते हैं ठगे

प्रशासक और न्यायाधीश

नियम-अधिनियम के नट-बोल्टू

कसने का अभिनय करते

माथ झुकाये

और उस पल तुम सोचते हो

एक पल को सोचते हो

काश ! ये मानव बच्चे नहीं

टिड्डे होते

स्वच्छन्द नभछन्द

चाहे झींगुर ही होते मुक्तकण्ठ -

बँधुआ मजदूर बच्चों की जगह

अनन्त आकाश से घिरी धरती पर

इनके लिए जगह पद़्अती न कम

 

तुम कहना चाहते हो

हाँ , वे बच्चे और वे ‘बड़े’

रिश्तेदार तो हैं

पर वह रिश्ता कैसा है यह देखो

उन बच्चों की दुबली देह से

जो रक्तशोषी साइफन लगा है

वह उन बड़के गालों को लाल रखता है

रिश्ता खून का है , बेशक !

कि जिस रिश्ते का खून कर देने को छटपटाता है तुम्हारा जी !

- ज्ञानेन्द्रपति

जुगनू : अल्लामा इक़बाल की बाल कविता

सुनाऊं तुम्हे बात एक रात की,

कि वो रात अन्धेरी थी बरसात की,

चमकने से जुगनु के था इक समा,

हवा में उडें जैसे चिनगारियां.

पडी  एक बच्चे की उस पर नज़र ,

पकड़ ही लिया एक को दौड़ कर.

चमकदार कीडा जो भाया उसे ,

तो टोपी में झटपट छुपाया उसे.

तो ग़मग़ीन कैदी ने की इल्तेज़ा ,

‘ओ नन्हे शिकारी ,मुझे कर रिहा.

ख़ुदा के लिए छोड़ दे ,छोड़ दे ,

मेरे कैद के जाल को तोड दे .

-”करूंगा न आज़ाद उस वक्त तक ,

कि देखूं न दिन में तेरी मैं चमक .”

-”चमक मेरी दिन में न पाओगे तुम ,

उजाले में वो तो हो जाएगी गुम.

न अल्हडपने से बनो पायमाल -

समझ कर चलो- आदमी की सी चाल”.

-अल्लामा इक़बाल.

यह मुरझाया हुआ फूल है

यह मुरझाया हुआ फूल है,
इसका हृदय दुखाना मत ।
स्वयं बिखरने वाली इसकी,
पंखुड़ियाँ बिखराना मत ॥
गुजरो अगर पास से इसके,
इसे चोट पहुँचाना मत ।
जीवन की अन्तिम घड़ियों में,
देखो,इसे रुलाना मत ॥
अगर हो सके तो,
दो ठंडी बूँदें टपका देना,प्यारे ।
जल न जाए संतप्त हृदय,
शीतलता ला देना प्यारे ॥
- सुभद्रा कुमारी चौहान

आज मुझे थोड़ा उदास होने दीजिए , साथियों !- महेश्वर

आज मुझे थोड़ा उदास होने दीजिए , साथियों !

उदास होने दीजिए मुझे

बदलने के लिए दर्द का जायका

घुटन का अहसास

ताकि कहीं-न-कहीं तो टूट सके

एकरसता का लम्बा सिलसिला

मुझे उदास होने दीजिए

ताप को चुनौती देते

अमलतास और गुलमुहर के बाग़ी फूलों से

अँकवार भरकर भेंटने के वास्ते

हो सकता है जब तक मैं उन तक पहुँचूँ

बेगाने मुसाफ़िर-सा गुज़र जाये गुस्ताख़ मौसम

उदास होने दीजिए मुझे

उद्दाम आवेग से नाचती किसी पहाड़ी नदी की तरह

उन्मत्त जवानी के उन पुर-असरार नग़मों के लिए

जिन्हें गाते-गाते बीच ही में

बेदम हो गयी थी मेरी आवाज़

मुझे उदास होने दीजिए

सहयोद्धाओं के संग बनायी गयी

जंग की उन विराट योजनाओं के वास्ते

जिन्हें अमल में उतारने के लिए

एड़ लगाते ही टूट गयी मेरे घोड़े की बाग

उदास होने दीजिए मुझे

समन्दर के ज्वार

और बर्फ़ीली चोटियों की दुर्गम चढ़ाइयों

और घने जंगलों को मथते बवण्डर के वास्ते

जिनसे टक्कर लिये बिना ही

निष्पन्द हो गया मेरा शरीर

दरअसल

मुझे उदास होने दीजिए

आपकी सच्ची खुशी के लिए

ताकि मेरे लिए ग़मग़ीन

आपके चेहरे पर दमक उठे

आदमी की यातनाओं के इतिहास को मेटने के लिए

आदमी की निश्छल कोशिश -

ताकि मेरे लिए उदास आपके चेहरे से खिल उठे

मौत के ख़िलाफ़

जीवन की जद्दोजहद का मासूम संकल्प

इसी से तो धधकती है

अन्तत: बेरोक परिवर्तन की आग

जिसमें संचित है हम सबके लिए

अनन्त प्रेम और राहत की सुखद धूप

हाँ , इसी धूप के जश्न में आज

मुझे थोड़ा उदास होने दीजिए , साथियों !

- महेश्वर

१८-३-८६ : पटना अस्पताल.

तार के खंभे : भवानी प्रसाद मिश्र

[ 'भवानी प्रसाद मिश्र के आयाम' , संपादक लक्ष्मण केड़िया,विशेषांक 'समकालीन सृजन' , २० बलमुकुंद मक्कर रोड, कोलकाता - ७००००७ से साभार ]

तार के खंभे

एक सीध में दूर-दूर तक गड़े हुए ये खंभे

किसी झाड़ से थोड़े नीचे , किसी झाड़ से लम्बे ।

कल ऐसे चुपचाप खड़े थे जैसे बोल न जानें

किन्तु सबेरे आज बताया मुझको मेरी माँ ने -

इन्हें बोलने की तमीज है , सो भी इतना ज्यादा

नहीं मानती इनकी बोली पास-दूर की बाधा !

अभी शाम को इन्हीं तार के खंभों ने बतलाया

कल मामीजी की गोदी में नन्हा मुन्ना आया ।

और रात को उठा , हुआ तब मुझको बड़ा अचंभा -

सिर्फ बोलता नहीं , गीत भी गाता है यह खंभा !

- भवानी प्रसाद मिश्र

[ १९५९ ]

टेडी बियर में बचे हुए भालू : ज्ञानेन्द्रपति

बच्चियाँ जब

अपने टेडी बियर को छाती से चिपकाये

दुलार रही होंगी

छीज रहे भारतीय जंगलों में

और खोजी दलों और अनुसन्धान-स्टेशनों के

        कचरालय बने जा रहे ध्रुवीय प्रदेशों में

बेमौत मारे जा रहे होंगे भालू

काले भालू और भूरे भालू

बग़ैर किसी रंग-भेद के

 

कौन मार रहा होगा उन्हें

अपने टेडी बियर को छाती से लगाये

सो जानेवाली बच्चियाँ

क्या कभी सपने में भी जान सकेंगी इसे

निहायत मुलायमियत से उनके आलिंगन से

छुल्लक भल्लूक को हटा उन्हें रज़ाई उढ़ानेवाले पापा

आज ही कहा था जिन्होंने-बेटे , पुराना पड़ गया है यह

कल ही बाज़ार से ला देंगे तुम्हारे लिए

एक नया टेडी बियर

प्यारा-सा टेडी बियर -

वही पापा

मदारियों से मुक्त करा

भालुओं को बरास्ते चिड़ियाख़ाना वापस जंगल

भिजानेवाले मोह से भरे उनके पापा

शामिल हैं

उनके और अपने भी अनजाने

भालुओं के हत्यारों में

और बेहतर कि इसे कभी न जानें जंगली मधुमक्खियाँ

कि शहदखोर शहदचोर भालुओं के लिए विलाप-नृत्य करती हुई

भँभोड़ डालें बस्तियों पर बस्तियाँ

आत्मघाती अभियानों में

 

नहीं , नहीं जान सकेंगी बच्चियाँ इसे

और न जान पायेंगे उनके प्यारे पापा

और पीढ़ी-दर-पीढ़ी

जंगली प्रदेशों से और बर्फ़ानी प्रदेशों से अन्तत: मिट गये भालू

टेडी बियर बनकर दुकानों के शो केसों में बैठे रहेंगे अतीतातीत

वत्सल पिताओं की प्रतीक्षा में

मोहित बच्चियों की ममतालु बाँहों के बीच होगी उनकी अन्तिम शरणस्थली

उनकी आत्मा को मिलेगा अभयारण्य

जहाँ माँ चिड़िया की तरह देह ही नहीं मन-प्राण की उष्मा से

सेयेंगे वे

वक्षांकुर

भविष्योन्मुख ।

- ज्ञानेन्द्रपति

कवि ने कहा , किताबघर प्रकाशन , ४८५५-५६/२४ अंसारी रोड ,दरियागंज , नयी दिल्ली से प्रकाशित एवं संशयात्मा में संकलित । कवि की अनुमति से प्रकाशित । चित्र :अफ़लातून]

जुगनू : अल्लामा इक़बाल की बाल कविता

सुनाऊं तुम्हे बात एक रात की,

कि वो रात अन्धेरी थी बरसात की,

चमकने से जुगनु के था इक समाँ ,

हवा में उड़ें जैसे चिनगारियां ।

पड़ी  एक बच्चे की उस पर नज़र ,

पकड़ ही लिया एक को दौड़ कर ।

चमकदार कीड़ा जो भाया उसे ,

तो टोपी में झटपट छुपाया उसे ।

तो ग़मग़ीन कैदी ने की इल्तज़ा ,

‘ओ छोटा शिकारी ,मुझे कर रिहा ।

ख़ुदा के लिए छोड़ दे ,छोड़ दे ,

मेरे कैद के जाल को तोड दे ।’

-”करूंगा न आज़ाद उस वक्त तक ,

कि देखूं न दिन में तेरी मैं चमक ।”

-”चमक मेरी दिन में न पाओगे तुम ,

उजाले में वो तो हो जाएगी गुम ।

न अल्हड़पने से बनो पायमाल -

समझ कर चलो- आदमी की सी चाल” ।

-अल्लामा इक़बाल ।

विफलता : शोध की मंजिलें : जयप्रकाश नारायण

जीवन विफलताओं से भरा है ,

सफलताएँ जब कभी आईं निकट ,

दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से ।

 

तो क्या वह मूर्खता थी ?

नहीं ।

 

सफलता और विफलता की

परिभाषाएँ भिन्न हैं मेरी !

 

इतिहास से पूछो कि वर्षों पूर्व

बन नहीं सकता प्रधानमन्त्री क्या ?

किन्तु मुझ क्रान्ति-शोधक के लिए

कुछ अन्य ही पथ मान्य थे , उद्दिष्ट थे,

पथ त्याग के , सेवा के , निर्माण के,

पथ संघर्ष के , सम्पूर्ण क्रान्ति के ।

जग जिन्हें कहता विफलता

थीं शोध की वे मंजिलें ।

 

मंजिलें वे अनगिनत हैं ,

गन्तव्य भी अति दूर है ,

रुकना नहीं मुझको कहीं

अवरुद्ध जितना मार्ग हो ।

निज कामना कुछ है नहीं

सब है समर्पित ईश को ।

 

तो , विफलताओं पर तुष्ट हूँ अपनी ,

और यह विफल जीवन

शत - शत धन्य होगा ,

यदि समानधर्मा प्रिय तरुणों का

कण्टकाकीर्ण मार्ग

यह कुछ सुगम बन जावे !

- जयप्रकाश नारायण

( चण्डीगढ़ के कारावास के दिनों में ९ अगस्त , १९७५ को लिखी गयी)


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