Archive for the 'nursery rhymes , kids' poetry' Category

जुगनू : अल्लामा इक़बाल की बाल कविता

सुनाऊं तुम्हे बात एक रात की,

कि वो रात अन्धेरी थी बरसात की,

चमकने से जुगनु के था इक समा,

हवा में उडें जैसे चिनगारियां.

पडी  एक बच्चे की उस पर नज़र ,

पकड़ ही लिया एक को दौड़ कर.

चमकदार कीडा जो भाया उसे ,

तो टोपी में झटपट छुपाया उसे.

तो ग़मग़ीन कैदी ने की इल्तेज़ा ,

‘ओ नन्हे शिकारी ,मुझे कर रिहा.

ख़ुदा के लिए छोड़ दे ,छोड़ दे ,

मेरे कैद के जाल को तोड दे .

-”करूंगा न आज़ाद उस वक्त तक ,

कि देखूं न दिन में तेरी मैं चमक .”

-”चमक मेरी दिन में न पाओगे तुम ,

उजाले में वो तो हो जाएगी गुम.

न अल्हडपने से बनो पायमाल -

समझ कर चलो- आदमी की सी चाल”.

-अल्लामा इक़बाल.

यह मुरझाया हुआ फूल है

यह मुरझाया हुआ फूल है,
इसका हृदय दुखाना मत ।
स्वयं बिखरने वाली इसकी,
पंखुड़ियाँ बिखराना मत ॥
गुजरो अगर पास से इसके,
इसे चोट पहुँचाना मत ।
जीवन की अन्तिम घड़ियों में,
देखो,इसे रुलाना मत ॥
अगर हो सके तो,
दो ठंडी बूँदें टपका देना,प्यारे ।
जल न जाए संतप्त हृदय,
शीतलता ला देना प्यारे ॥
- सुभद्रा कुमारी चौहान

तब कैसा मौसम ठंडा जी !

 

तब कैसा मौसम ठंडा जी

आया फिर जाड़े का मौसम

लगता सबको ठंडा जी

खुले बदन फिर भी बैठे हैं

नदी किनारे पण्डा जी

मास्टर जी के हाथ कोट में

कहां गए वो डंडा जी

कहता है हर साल यही

गणतंत्र दिवस का झण्डा जी

हो सबके पास गरम कपड़े

तब कैसा मौसम ठंडा जी !

राजेन्द्र राजन

मानव मानव एक समान

मानव मानव एक समान

निर्धन हों चाहे धनवान

मानव मानव एक समान

चाहे गोरे हों या काले

मानव मानव एक समान

बनाएंगे हम ऐसी दुनिया

ऐसा सुंदर एक समाज

जिसमें न हों ऊंच नीच के

भेदभाव के रस्म-रिवाज

हम चाहेंगे मानव के सब

गल जाएं झूठे अभियान

मानवता का अर्थ यही है

मानव मानव एक समान ।

राजेन्द्र राजन

[ रेखाचित्र कांजीलाल का बनाया है। सुधेन्दु पटेल द्वारा लिखी पुस्तक 'एक कलाकार की दृष्टि में काशी में' से लिया है। ]

जुगनू : अल्लामा इक़बाल की बाल कविता

सुनाऊं तुम्हे बात एक रात की,

कि वो रात अन्धेरी थी बरसात की,

चमकने से जुगनु के था इक समाँ ,

हवा में उड़ें जैसे चिनगारियां ।

पड़ी  एक बच्चे की उस पर नज़र ,

पकड़ ही लिया एक को दौड़ कर ।

चमकदार कीड़ा जो भाया उसे ,

तो टोपी में झटपट छुपाया उसे ।

तो ग़मग़ीन कैदी ने की इल्तज़ा ,

‘ओ छोटा शिकारी ,मुझे कर रिहा ।

ख़ुदा के लिए छोड़ दे ,छोड़ दे ,

मेरे कैद के जाल को तोड दे ।’

-”करूंगा न आज़ाद उस वक्त तक ,

कि देखूं न दिन में तेरी मैं चमक ।”

-”चमक मेरी दिन में न पाओगे तुम ,

उजाले में वो तो हो जाएगी गुम ।

न अल्हड़पने से बनो पायमाल -

समझ कर चलो- आदमी की सी चाल” ।

-अल्लामा इक़बाल ।

‘चार कौए उर्फ़ चार हौए’ : [ चिट्ठालोक के बहाने ]

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[ कवि भवानीप्रसाद मिश्र ने आपात काल के खिलाफ़ कविताओं की त्रिकाल सन्ध्या का संकल्प लिया था । प्रति दिन तीन कविताओं द्वारा तानाशाही का विरोध प्रकट करते थे । फिर यह पुस्तक के रूप में 'त्रिकाल सन्ध्या' नाम से छपी । आपात काल के दौरान सेन्सरशिप की अवहेलना करने वाली पत्रिका बुनियादी यकीन तथा भूमिपुत्र (गुजराती ) में यह कविताएँ छपा करती थीं, रणभेरी जैसी साइक्लोस्टाइल्ड भूमिगत बुलेटिनों के अलावा । पत्रिकाओं को  छापने वाले प्रेस को तालाबन्दी जैसी कार्रवाई झेलनी पड़ती थी । दोनों पत्रिकाएँ तब गुजरात से छपती थीं जहाँ स्व. बाबूभाई पटेल की गैर काँग्रेसी सरकार आपात काल के शुरुआती दिनों में रही ।

चिट्ठालोक के मौजूदा माहौल को देखते हुए मुझे त्रिकाल सन्ध्या से यह बाल-कविता देना उचित लगा । ]

चार कौए उर्फ चार हौए

बहुत नहीं सिर्फ चार कौए थे काले ,

उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले ,

उनके ढंग से उड़ें , रुकें , खायें और गायें,

वे जिसको त्योहार कहें सब उसे मनायें

 

कभी - कभी जादू हो जाता है दुनिया में

दुनिया - भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में

ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गए

इनके नौकर चील , गरुड़ और बाज हो गए

 

हंस , मोर , चातक , गौरैयें किस गिनती में

हाथ बाँधकर खड़े हो गए सब विनती में

हुक्म हुआ , चातक पंछी रट नहीं लगाए

पिऊ - पिऊ को छोड़ें कौए - कौए गायें

 

बीस तरह की काम दे दिए गौरैयों को

खान - पीना मौज उड़ाना छुट भैयों को

कौओं की ऐसी बन आई पाँचों घी में

बड़े बड़े मनसूबे आए उनके जी में

उड़ने तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले

उड़ने वाले सिर्फ रह गए बैठे ठाले

 

आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है

यह दिन कवि का नहीं चार कौवों का दिन है

उत्सुकता जग जाए तो मेरे घर आ जाना

लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना

- भवानीप्रसाद मिश्र .

[ विद्याचरण शुक्ल , बन्सीलाल , सन्जय गाँधी तथा एक अन्य काँग्रेसी(कौन?कोई बताए) -'चार कौए' तथा 'बीस तरह के काम' से मतलब इन्दिरा गाँधी का बीस सूत्री कार्यक्रम । इसी बीस सूत्री कार्यक्रम का संघ के सरसंघचालक द्वारा समर्थन करने के बाद के बाद संघ के कार्यकर्ता छूटने लगे थे ।]

जुगनू : अल्लामा इक़बाल की बाल कविता

सुनाऊं तुम्हे बात एक रात की,

कि वो रात अन्धेरी थी बरसात की,

चमकने से जुगनु के था इक समा,

हवा में उडें जैसे चिनगारियां.

पडी  एक बच्चे की उस पर नज़र ,

पकड़ ही लिया एक को दौड़ कर.

चमकदार कीडा जो भाया उसे ,

तो टोपी में झटपट छुपाया उसे.

तो ग़मग़ीन कैदी ने की इल्तेज़ा ,

‘ओ नन्हे शिकारी ,मुझे कर रिहा.

ख़ुदा के लिए छोड़ दे ,छोड़ दे ,

मेरे कैद के जाल को तोड दे .

-”करूंगा न आज़ाद उस वक्त तक ,

कि देखूं न दिन में तेरी मैं चमक .”

-”चमक मेरी दिन में न पाओगे तुम ,

उजाले में वो तो हो जाएगी गुम.

न अल्हडपने से बनो पायमाल -

समझ कर चलो- आदमी की सी चाल”.

-अल्लामा इक़बाल.

नल की हडताल

आज सुबह से नल था मौन्,
पता नहीं कारण था कौन ?
मैंने पूछा तनिक पास से ,
भैय्या दिखते क्यों उदास से ?
बोला , ‘क्या बतलाऊं यार ,
रोज सहन सहन करता हूं मार .
कान ऐंठता जो भी आता ,
टांग बाल्टी मुझे सताता .
लडते मेरे पास खडे हो ,
बच्चे हों या मर्द बडे हों .
नहीं किसी को दूंगा पानी !
इसीलिए हडताल मनानी !

पास रखी तब बोली गागर ,
‘ हम हैं रीते,तुम हो सागर ,
जल्दी प्यास बुझाओ मेरी ,
सोच रहे क्या ? कैसी देरी ?

नल को दया घडे पर आई,
पानी की झट धार बहाई ..
(कवि- अज्ञात,किसी को पता हो तो जरूर बताए.)

सूरज का गोला ; भवानी प्रसाद मिश्र

सूरज का गोला,

इसके पहले ही कि निकलता,

चुपके से बोला,हमसे - तुमसे इससे - उससे

कितनी चीजों से,

चिडियों से पत्तों से ,

फूलो - फल से, बीजों से-

” मेरे साथ - साथ सब निकलो

घने अंधेरे से

कब जागोगे,अगर न जागे , मेरे टेरे से ?”

आगे बढकर आसमान ने

अपना पट खोला ,

इसके पहले ही कि निकलता

सूरज का गोला .

फिर तो जाने कितनी बातें हुईं,

कौन गिन सके इतनी बातें हुईं ,

पंछी चहके कलियां चटकीं ,

डाल - डाल चमगादड लटकीं

गांव - गली में शोर मच गया ,

जंगल - जंगल मोर नच गया .

जितनी फैली खुशियां ,

उससे किरनें ज्यादा फैलीं,

ज्यादा रंग घोला .

और उभर कर ऊपर आया

सूरज का गोला ,

सबने उसकी आगवानी में

अपना पर खोला .

               - भवानी प्रसाद मिश्र .

चार कौए उर्फ़ चार हौए ,भवानी प्रसाद मिश्र

[आपात्काल के दौरान लिखी भवानी बाबू के कविताएं 'त्रिकाल सन्ध्या' में हैं.यहां बाल-कविता के रूप में लिखी एक कविता पेश है .आपात्काल में सक्रिय और बदनाम चार महानुभावों का सन्दर्भ स्पष्ट है.]

बहुत नहीं सिर्फ़ चार कौए थे काले ,
उन्होंने यह तय किया कि सारे उडने वाले
उनके ढंग से उडे,रुकें , खायें और गायें
वे जिसको त्यौहार कहें सब उसे मनाएं

कभी कभी जादू हो जाता दुनिया में
दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिए चार बडे सरताज हो गये
इनके नौकर चील, गरुड और बाज हो गये.

हंस मोर चातक गौरैये किस गिनती में
हाथ बांध कर खडे हो गये सब विनती में
हुक्म हुआ , चातक पंछी रट नहीं लगायें
पिऊ - पिऊ को छोडें कौए - कौए गायें

बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को
खाना - पीना मौज उडाना छुट्भैयों को
कौओं की ऐसी बन आयी पांचों घी में
बडे - बडे मनसूबे आए उनके जी में

उडने तक तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले
उडने वाले सिर्फ़ रह गए बैठे ठाले
आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है
यह दिन कवि का नहीं , चार कौओं का दिन है

उत्सुकता जग जाए तो मेरे घर आ जाना
लंबा किस्सा थोडे में किस तरह सुनाना ?
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अक्कड मक्कड ,
धूल में धक्कड,
दोनों मूरख,
दोनों अक्खड,
हाट से लौटे,
ठाट से लौटे,
एक साथ एक बाट से लौटे .

बात बात में बात ठन गयी,
बांह उठीं और मूछें तन गयीं.
इसने उसकी गर्दन भींची,
उसने इसकी दाढी खींची.
अब वह जीता,अब यह जीता;
दोनों का बढ चला फ़जीता;
लोग तमाशाई जो ठहरे -
सबके खिले हुए थे चेहरे !

मगर एक कोई था फक्कड,
मन का राजा कर्रा - कक्कड;
बढा भीड को चीर-चार कर
बोला ‘ठहरो’ गला फाड कर.

अक्कड मक्कड ,
धूल में धक्कड,
दोनों मूरख,
दोनों अक्खड,
गर्जन गूंजी,रुकना पडा,
सही बात पर झुकना पडा !

उसने कहा सधी वाणी में,
डूबो चुल्लू भर पानी में;
ताकत लडने में मत खोऒ
चलो भाई चारे को बोऒ!

खाली सब मैदान पडा है,
आफ़त का शैतान खडा है,
ताकत ऐसे ही मत खोऒ,
चलो भाई चारे को बोऒ.
                    -भवानी प्रसाद मिश्र


कठपुतली
गुस्से से उबली
बोली - ये धागे
क्यों हैं मेरे पीछे आगे ?

तब तक दूसरी कठपुतलियां
बोलीं कि हां हां हां
क्यों हैं ये धागे
हमारे पीछे - आगे ?
हमें अपने पांवों पर छोड दो ,
इन सारे धागों को तोड दो !

बेचारा बाज़ीगर
हक्का - बक्का रह गया सुन कर
फिर सोचा अगर डर गया
तो ये भी मर गयीं मैं भी मर गया
और उसने बिना कुछ परवाह किए
जोर जोर धागे खींचे
उन्हें नचाया !

कठपुतलियों की भी समझ में आया
कि हम तो कोरे काठ की हैं
जब तक धागे हैं,बाजीगर है
तब तक ठाट की हैं
और हमें ठाट में रहना है
याने कोरे काठ की रहना है .
                                     –भवानी प्रसाद मिश्र


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