आज मुझे थोड़ा उदास होने दीजिए , साथियों !
उदास होने दीजिए मुझे
बदलने के लिए दर्द का जायका
घुटन का अहसास
ताकि कहीं-न-कहीं तो टूट सके
एकरसता का लम्बा सिलसिला
मुझे उदास होने दीजिए
ताप को चुनौती देते
अमलतास और गुलमुहर के बाग़ी फूलों से
अँकवार भरकर भेंटने के वास्ते
हो सकता है जब तक मैं उन तक पहुँचूँ
बेगाने मुसाफ़िर-सा गुज़र जाये गुस्ताख़ मौसम
उदास होने दीजिए मुझे
उद्दाम आवेग से नाचती किसी पहाड़ी नदी की तरह
उन्मत्त जवानी के उन पुर-असरार नग़मों के लिए
जिन्हें गाते-गाते बीच ही में
बेदम हो गयी थी मेरी आवाज़
मुझे उदास होने दीजिए
सहयोद्धाओं के संग बनायी गयी
जंग की उन विराट योजनाओं के वास्ते
जिन्हें अमल में उतारने के लिए
एड़ लगाते ही टूट गयी मेरे घोड़े की बाग
उदास होने दीजिए मुझे
समन्दर के ज्वार
और बर्फ़ीली चोटियों की दुर्गम चढ़ाइयों
और घने जंगलों को मथते बवण्डर के वास्ते
जिनसे टक्कर लिये बिना ही
निष्पन्द हो गया मेरा शरीर
दरअसल
मुझे उदास होने दीजिए
आपकी सच्ची खुशी के लिए
ताकि मेरे लिए ग़मग़ीन
आपके चेहरे पर दमक उठे
आदमी की यातनाओं के इतिहास को मेटने के लिए
आदमी की निश्छल कोशिश -
ताकि मेरे लिए उदास आपके चेहरे से खिल उठे
मौत के ख़िलाफ़
जीवन की जद्दोजहद का मासूम संकल्प
इसी से तो धधकती है
अन्तत: बेरोक परिवर्तन की आग
जिसमें संचित है हम सबके लिए
अनन्त प्रेम और राहत की सुखद धूप
हाँ , इसी धूप के जश्न में आज
मुझे थोड़ा उदास होने दीजिए , साथियों !
- महेश्वर
१८-३-८६ : पटना अस्पताल.

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