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मन हमेशा ताजा , युवा , अबोध ,ओजस्विता और उमंग से सरोबार हों ।इसके लिए काफ़ी चेतना की जरूरत होगी । तुम्हारे मन में क्या हो रहा है ,यह चेतना । इसी स्थिति में हम कुछ सीखते हैं ।मन में चल रहे भावों को सही और गलत के खाँचों में बाँटने की जरूरत नहीं , क्योंकि ऐसा करने पर हम एक सेन्सर लगा रहे होते हैं । एक यात्रा , जिसमें धारणाओं , निष्कर्षों ,पूर्वाग्रहों के बोझ के बिना निकलना जरूरी है ।
अगर तुम्हें लगता है कि खुद के बारे में जानना जरूरी है क्योंकि मैं या और कोई ऐसा कह रहा है तब संवाद ख़त्म हो जाता है । यदि इस बात पर हम सहमत हो जाँए कि अन्तर्मन की यात्रा बहुत महत्वपूर्ण है ,तब हमारा एक अलग नाता होगा - साथ - साथ हम एक आनन्दमय , सतर्क और समझदार खोज में लगेंगे ।
मैं तुम्हारा विश्वास नहीं माँग रहा क्योंकि ऐसा करने पर मैं खुद को ऊँचे आसन पर बैठा लूँगा । अपना गुरु और शिष्य तुम्हें खुद होना होगा । मूल्यवान और जरूरी मान कर हम जिन बातों को स्वीकार करते हैं उन सब पर सवाल करने होंगे ।
किसी का अनुसरण न करने में अकेला-सा महसूस होगा । तब हो जाओ अकेले ।जैसे तुम हो उससे मुखातिब होने पर पता चलेगा कि तुम खाली , मलिन , बोका , कुरूप ,दोषी और व्याकुल हो - एक क्षुद्र , रद्दी ,सेकेण्ड हैन्ड हस्ती हो ।इस हकीकत से मुँह न मोड़ो। मुँह मोड़ते ही भय का आरम्भ होगा ।
खुद की पड़ताल में हम बाकी दुनिया से खुद को अलग-थलग नहीं कर रहे हैं । यह अस्वस्थ प्रक्रिया नहीं है । दुनिया भर में इन्सान रोजमर्रा की इन्हीं मुश्किलात को झेलता है , जिन्हें हम खुद झेल रहे हैं । इस पड़ताल में कत्तई विक्षिप्तता नहीं है चूँकि व्यक्ति और समूह में फर्क नहीं है । मैं जैसा हूँ , उस हिसाब से मैंने एक दुनिया बनाई है । हम हिस्से और समग्र की लड़ाई में न खो जाँए ।

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