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विफलता : शोध की मंजिलें : जयप्रकाश नारायण

जीवन विफलताओं से भरा है ,

सफलताएँ जब कभी आईं निकट ,

दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से ।

 

तो क्या वह मूर्खता थी ?

नहीं ।

 

सफलता और विफलता की

परिभाषाएँ भिन्न हैं मेरी !

 

इतिहास से पूछो कि वर्षों पूर्व

बन नहीं सकता प्रधानमन्त्री क्या ?

किन्तु मुझ क्रान्ति-शोधक के लिए

कुछ अन्य ही पथ मान्य थे , उद्दिष्ट थे,

पथ त्याग के , सेवा के , निर्माण के,

पथ संघर्ष के , सम्पूर्ण क्रान्ति के ।

जग जिन्हें कहता विफलता

थीं शोध की वे मंजिलें ।

 

मंजिलें वे अनगिनत हैं ,

गन्तव्य भी अति दूर है ,

रुकना नहीं मुझको कहीं

अवरुद्ध जितना मार्ग हो ।

निज कामना कुछ है नहीं

सब है समर्पित ईश को ।

 

तो , विफलताओं पर तुष्ट हूँ अपनी ,

और यह विफल जीवन

शत - शत धन्य होगा ,

यदि समानधर्मा प्रिय तरुणों का

कण्टकाकीर्ण मार्ग

यह कुछ सुगम बन जावे !

- जयप्रकाश नारायण

( चण्डीगढ़ के कारावास के दिनों में ९ अगस्त , १९७५ को लिखी गयी)


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