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कविता : ब्लैक बोर्ड : ज्ञानेन्द्रपति

 

औचक पहुँचे , उस दिन हमने

साँझ को शुरु होते देखा

चनमा सट्टी चौराहे पर की

उस चाय - दुकान में

ढलती साँझ हमारे पहुँचने तक

जो गहगह होती थी

अब जानता हूँ

उस चाय - दुकान की साँझ

बहुत पहले शुरु हो जाती है

दोपहर ढलते ही

तिपहरी के साथ

उस चाय - दुकान के भोजनावकाश को

समाप्त घोषित करता हुआ

उसका उधड़नीलरंग शटर उठ जाता है , नन्हें हाथों

पूरा नहीं , थोड़ा - सा

बमुश्किल हमारे घुटनों तक

लेकिन काफी उन तीन बच्चों के लिए

जो संझा के अग्रदूत हैं

( और सुबह के भी )

तनिक सिर झुकाकर अबाध उनकी आवाजाही

दुकनिया के भीतर - बाहर

कर्म - कुशल वे तीन नन्हें बच्चे

एक बच्चा - तनिक गुलथुल-सा

और दो बच्चियाँ भूरे केशोंवाली

एक मँझोली हथौड़ी से

बच्चा फोड़ता है कोयले

ऊँकड़ूँ बैठ

बच्चियों में जो बड़ी है , निहुर

एक टुटही झाड़ू से बुहारती है फर्श

साफ , बहुत साफ - झकाझक

दूसरी बच्ची इस बीच

सामान उठाती है धरती है

परात , पतीला , केतली , बोयाम

फिर धुँआ उठता है

देर तक

तब अँगीठी दहकती है

शाम जब बस जाती है

यादवजी की चाय - दुकान चुस्कियों और मुस्कियों से

भरी होती है

वे बच्चे तब नहीं दिखते हैं

वे बच्चे तब हमारे नेत्र-तल के नीचे होते हैं

वे पाँव हैं जिनके बल पर

अचल खड़ी भी वह दुकान चलती है

यादवजी की चाय - दुकान

बड़ी भोर से देर रात तक थिर न रहनेवाले

वे पाँव - जिनसे गुम गया है उनका गन्तव्य

अनथक कदमताल करते हुए जो मार्च कर रहे हैं

नन्हें सिपाहियों के पाँव

जो आगे बढ़कर जीत लेंगे

अपने पिता का निबुध स्वार्थ - समर

और आह ! हार जायेंगे

आखिरकार

वे हाथ-पाँव-भर नहीं, मस्तिष्क-धर भी हैं

शुक्ल-पक्ष के चाँद की तरह बढ़ती हुई

यादवजी की वे सन्तानें

किताबों के चन्द्रोदय से वंचित शाश्वत कृष्ण-पक्ष का अन्हार

फैला होगा जिनके मस्तिष्क में -

बलैक्बोर्ड से अपरिचित बलैकबोर्ड !

- ज्ञानेन्द्रपति .

 

कविता : खून का रिश्ता : ज्ञानेन्द्रपति

वे बच्चे

मूँडी गोत कर

जिन्हें बारह घण्टे करना होता है काम

दरिद्रता के कोख-जाये बेटे

लक्ष्मी की अमरबेल

जिनकी खिच्ची उँगलियों से

लिपटती है

दो आँखों की चाबुक

उनकी झुकी पीठ पर

निगरानी रखती है

घुटनों पर ही नहीं , आत्मा पर घावों वाले

रिसते घावों वाले

वे बच्चे

रिश्तेदार बताये जाते हैं

नजदीकी रिश्तेदार

दूर गाँव के अपने-सगे

और देखते रह जाते हैं ठगे

प्रशासक और न्यायाधीश

नियम-अधिनियम के नट-बोल्टू

कसने का अभिनय करते

माथ झुकाये

और उस पल तुम सोचते हो

एक पल को सोचते हो

काश ! ये मानव बच्चे नहीं

टिड्डे होते

स्वच्छन्द नभछन्द

चाहे झींगुर ही होते मुक्तकण्ठ -

बँधुआ मजदूर बच्चों की जगह

अनन्त आकाश से घिरी धरती पर

इनके लिए जगह पद़्अती न कम

 

तुम कहना चाहते हो

हाँ , वे बच्चे और वे ‘बड़े’

रिश्तेदार तो हैं

पर वह रिश्ता कैसा है यह देखो

उन बच्चों की दुबली देह से

जो रक्तशोषी साइफन लगा है

वह उन बड़के गालों को लाल रखता है

रिश्ता खून का है , बेशक !

कि जिस रिश्ते का खून कर देने को छटपटाता है तुम्हारा जी !

- ज्ञानेन्द्रपति

जुगनू : अल्लामा इक़बाल की बाल कविता

सुनाऊं तुम्हे बात एक रात की,

कि वो रात अन्धेरी थी बरसात की,

चमकने से जुगनु के था इक समा,

हवा में उडें जैसे चिनगारियां.

पडी  एक बच्चे की उस पर नज़र ,

पकड़ ही लिया एक को दौड़ कर.

चमकदार कीडा जो भाया उसे ,

तो टोपी में झटपट छुपाया उसे.

तो ग़मग़ीन कैदी ने की इल्तेज़ा ,

‘ओ नन्हे शिकारी ,मुझे कर रिहा.

ख़ुदा के लिए छोड़ दे ,छोड़ दे ,

मेरे कैद के जाल को तोड दे .

-”करूंगा न आज़ाद उस वक्त तक ,

कि देखूं न दिन में तेरी मैं चमक .”

-”चमक मेरी दिन में न पाओगे तुम ,

उजाले में वो तो हो जाएगी गुम.

न अल्हडपने से बनो पायमाल -

समझ कर चलो- आदमी की सी चाल”.

-अल्लामा इक़बाल.

आज मुझे थोड़ा उदास होने दीजिए , साथियों !- महेश्वर

आज मुझे थोड़ा उदास होने दीजिए , साथियों !

उदास होने दीजिए मुझे

बदलने के लिए दर्द का जायका

घुटन का अहसास

ताकि कहीं-न-कहीं तो टूट सके

एकरसता का लम्बा सिलसिला

मुझे उदास होने दीजिए

ताप को चुनौती देते

अमलतास और गुलमुहर के बाग़ी फूलों से

अँकवार भरकर भेंटने के वास्ते

हो सकता है जब तक मैं उन तक पहुँचूँ

बेगाने मुसाफ़िर-सा गुज़र जाये गुस्ताख़ मौसम

उदास होने दीजिए मुझे

उद्दाम आवेग से नाचती किसी पहाड़ी नदी की तरह

उन्मत्त जवानी के उन पुर-असरार नग़मों के लिए

जिन्हें गाते-गाते बीच ही में

बेदम हो गयी थी मेरी आवाज़

मुझे उदास होने दीजिए

सहयोद्धाओं के संग बनायी गयी

जंग की उन विराट योजनाओं के वास्ते

जिन्हें अमल में उतारने के लिए

एड़ लगाते ही टूट गयी मेरे घोड़े की बाग

उदास होने दीजिए मुझे

समन्दर के ज्वार

और बर्फ़ीली चोटियों की दुर्गम चढ़ाइयों

और घने जंगलों को मथते बवण्डर के वास्ते

जिनसे टक्कर लिये बिना ही

निष्पन्द हो गया मेरा शरीर

दरअसल

मुझे उदास होने दीजिए

आपकी सच्ची खुशी के लिए

ताकि मेरे लिए ग़मग़ीन

आपके चेहरे पर दमक उठे

आदमी की यातनाओं के इतिहास को मेटने के लिए

आदमी की निश्छल कोशिश -

ताकि मेरे लिए उदास आपके चेहरे से खिल उठे

मौत के ख़िलाफ़

जीवन की जद्दोजहद का मासूम संकल्प

इसी से तो धधकती है

अन्तत: बेरोक परिवर्तन की आग

जिसमें संचित है हम सबके लिए

अनन्त प्रेम और राहत की सुखद धूप

हाँ , इसी धूप के जश्न में आज

मुझे थोड़ा उदास होने दीजिए , साथियों !

- महेश्वर

१८-३-८६ : पटना अस्पताल.

तब कैसा मौसम ठंडा जी !

 

तब कैसा मौसम ठंडा जी

आया फिर जाड़े का मौसम

लगता सबको ठंडा जी

खुले बदन फिर भी बैठे हैं

नदी किनारे पण्डा जी

मास्टर जी के हाथ कोट में

कहां गए वो डंडा जी

कहता है हर साल यही

गणतंत्र दिवस का झण्डा जी

हो सबके पास गरम कपड़े

तब कैसा मौसम ठंडा जी !

राजेन्द्र राजन

मानव मानव एक समान

मानव मानव एक समान

निर्धन हों चाहे धनवान

मानव मानव एक समान

चाहे गोरे हों या काले

मानव मानव एक समान

बनाएंगे हम ऐसी दुनिया

ऐसा सुंदर एक समाज

जिसमें न हों ऊंच नीच के

भेदभाव के रस्म-रिवाज

हम चाहेंगे मानव के सब

गल जाएं झूठे अभियान

मानवता का अर्थ यही है

मानव मानव एक समान ।

राजेन्द्र राजन

[ रेखाचित्र कांजीलाल का बनाया है। सुधेन्दु पटेल द्वारा लिखी पुस्तक 'एक कलाकार की दृष्टि में काशी में' से लिया है। ]

टेडी बियर में बचे हुए भालू : ज्ञानेन्द्रपति

बच्चियाँ जब

अपने टेडी बियर को छाती से चिपकाये

दुलार रही होंगी

छीज रहे भारतीय जंगलों में

और खोजी दलों और अनुसन्धान-स्टेशनों के

        कचरालय बने जा रहे ध्रुवीय प्रदेशों में

बेमौत मारे जा रहे होंगे भालू

काले भालू और भूरे भालू

बग़ैर किसी रंग-भेद के

 

कौन मार रहा होगा उन्हें

अपने टेडी बियर को छाती से लगाये

सो जानेवाली बच्चियाँ

क्या कभी सपने में भी जान सकेंगी इसे

निहायत मुलायमियत से उनके आलिंगन से

छुल्लक भल्लूक को हटा उन्हें रज़ाई उढ़ानेवाले पापा

आज ही कहा था जिन्होंने-बेटे , पुराना पड़ गया है यह

कल ही बाज़ार से ला देंगे तुम्हारे लिए

एक नया टेडी बियर

प्यारा-सा टेडी बियर -

वही पापा

मदारियों से मुक्त करा

भालुओं को बरास्ते चिड़ियाख़ाना वापस जंगल

भिजानेवाले मोह से भरे उनके पापा

शामिल हैं

उनके और अपने भी अनजाने

भालुओं के हत्यारों में

और बेहतर कि इसे कभी न जानें जंगली मधुमक्खियाँ

कि शहदखोर शहदचोर भालुओं के लिए विलाप-नृत्य करती हुई

भँभोड़ डालें बस्तियों पर बस्तियाँ

आत्मघाती अभियानों में

 

नहीं , नहीं जान सकेंगी बच्चियाँ इसे

और न जान पायेंगे उनके प्यारे पापा

और पीढ़ी-दर-पीढ़ी

जंगली प्रदेशों से और बर्फ़ानी प्रदेशों से अन्तत: मिट गये भालू

टेडी बियर बनकर दुकानों के शो केसों में बैठे रहेंगे अतीतातीत

वत्सल पिताओं की प्रतीक्षा में

मोहित बच्चियों की ममतालु बाँहों के बीच होगी उनकी अन्तिम शरणस्थली

उनकी आत्मा को मिलेगा अभयारण्य

जहाँ माँ चिड़िया की तरह देह ही नहीं मन-प्राण की उष्मा से

सेयेंगे वे

वक्षांकुर

भविष्योन्मुख ।

- ज्ञानेन्द्रपति

कवि ने कहा , किताबघर प्रकाशन , ४८५५-५६/२४ अंसारी रोड ,दरियागंज , नयी दिल्ली से प्रकाशित एवं संशयात्मा में संकलित । कवि की अनुमति से प्रकाशित । चित्र :अफ़लातून]

आइए ‘आत्मदर्शी’ का खैरम - कदम करें

मेरे एक कथाकार मित्र ने ‘आत्मदर्शी’ नाम से चिट्ठा शुरु किया है।साहित्यिक जगत में वे एक अन्य नाम से कहानी-कविता लिखते रहे हैं ।ओड़ीसा के ढेंकानाल में शिक्षक हैं । आप सभी साथियों से निवेदन है कि उनके चिट्ठे को देखें,पढ़ें और स्वागत करें।

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महारानी अंग्रेजी , दासी हिन्दी : ले. सुनील

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[लेख का प्रथमार्ध यहाँ है । ]

    वैश्वीकरण के इस दौर में अंग्रेजी और हिन्दी का संकरन करके ‘हिन्दलिश’ या हिन्गलिश को प्रचलित करने की कोशिश की जा रही है । हमारे हिन्दी चैनलों , पत्रिकाओं और अखबारों में इसकी झांकी देखी जा सकती है । विज्ञापनों में खास तौर पर यह देखने को मिल रही है। हिन्दी में अचानक अंग्रेजी शब्दों की भरमार हो गयी है । इसे व्यावहारिकता , लोकप्रियता और आधुनिकता के नाम पर चलाया जा रहा है ।लेकिन इससे भाषा ज्यादा बोझिल , बनावटी और अजनबी हो रही है ।सवाल भाषा की शुद्धता का नहीं है । किसी भी जीवन्त भाषा में नए शब्द आते रहते हैं और आदान-प्रदान होता रहता है ।हिन्दी में भी कई अंग्रेजी शब्द प्रचलित हो गए हैं और भाषा का हिस्सा बन चुके हैं जैसे स्कूल , कॉलेज , मास्टर , नम्बर , टाइम ,फिल्म ,टीवी , फोन , मोटर , बस , कार, इंजन , डॉक्टर ,कलेक्टर आदि । यह प्रक्रिया पिछले दो सौ साल से चली है और ऐसे अनेक शब्द तो देहाती बोलियों का भी हिस्सा बन चुके हैं । लेकिन इधर कुछ सालों में अचानक जिस तेजी से अंग्रेजी शब्दों को हिन्दी भाषा में डाला जा रहा है , उससे हिन्दी दुरूह और बोझिल हो रही है और हिन्दी की अपनी पहचान खतम होने का खतरा पैदा होता जा रहा है । इसमें सवाल भौगोलिक स्थिति का भी है ।महानगरों में अंग्रेजी के जो शब्द स्वाभाविक एवं प्रचलित होते हैं ,उन्हें समझने में छोटे नगरों , कस्बों और देहातों के अंग्रेजी न जानने वाले पाठकों को रुकावट एवं दिक्कत आती है ।जिन चीजों के लिए हिन्दी में अच्छे , सरल व सुगम शब्द हैं , वहाँ अंग्रेजी शब्दों को बीच में घुसाने की आखिर क्या मजबूरी है ? कुछ उदाहरण हैं : -

    हिन्दी                                                              अंग्रेजी

छात्र , विद्यार्थी                                                         स्टुडेन्ट

 पाठ्यपुस्तक                                                         टेक्स्टबुक

 खेलकूद                                                               गेम्स , स्पोर्ट्स

 खिलाड़ी                                                               प्लेयर ,स्पोर्ट्समेन

 कचहरी ,अदालत                                                     कोर्ट

 प्रशासन                                                                एडमिनिस्ट्रेशन

  सरकार                                                               गवर्नमेन्ट

 संगीत                                                                  म्युज़िक

 गीत                                                                    सॉंग

 संस्कृति                                                               कल्चर

 लड़के                                                                  बॉय्ज़

लड़कियाँ                                                               गर्ल्स

शहर , नगर                                                           सिटी

कस्बा                                                                   टाउन

अखबार                                                                न्यूज़ पेपर

    हिन्दी और अंग्रेजी का यह आदान-प्रदान दोतरफ़ा , बराबरी का और स्वस्थ नहीं है । कई बार इसमें हिन्दी वालों की हीनभावना दिखायी देती है । जैसे अपनी माँ , बहन , पत्नी या अपने पिता के बारे में बताते हुए प्राय: हिन्दीभाषी उन्हें माँ , बहन ,पत्नी या पिता कहने में शर्म आती और तब वह उनका परिचय मदर , सिस्टर , वाइफ़ ,या फ़ादर के रूप में देता है । उसे संडास ,पखाना या टट्टीघर कहने में झिझक होती है ,’लैट्रिन’  या ‘टॉयलेट’ के रूप में वही चीज सभ्य बन जाती है । मौत के लिये हिन्दी में दर्जनों शब्द सम्मानजनक शब्द हैं जैसे निधन , देहान्त , स्वर्गवास , परलोकवासी होना, शांत होना , गुजर जाना आदि । लेकिन शिक्षित हिन्दीभाषी बताएगा कि ‘डेथ’ हो गयी है । हिन्दीभाषियों की इस हीनभावना के कारण वे अपने घनिष्ट और नजदीकी संबोधन में भी अंग्रेजी की नकल करते जा रहे हैं ।माँ अब ‘मम्मी’ हो गयी है पिता ‘पापा’ या ‘डैड’ हो गये हैं, ताऊ , काका , चाचा , मामा , फूफा , मौसा सब ‘अंकल’ बन रहे हैं और बूआ, चाची , मौसी , मामी , मौसी आदि ‘आंटी’ बनती जा रही हैं । ये प्रवृत्तियाँ मामूली नहीं हैं ।वे हमारी पहचान को खोने ,स्वाभिमान खतम होने और हीनभावना की चरम स्थिति का द्योतक हैं ।

    हिन्दी का परिवार काफ़ी बड़ा है । देश के दस प्रान्तों की मुख्यभाषा हिन्दी है । हिन्दी और इससे जुड़ी बोलियों को बोलने वालों की संख्या ३० करोड़ से कम नहीं होगी । हिन्दी के समाचार पत्रों की प्रसार संख्या भी करोड़ों में पहुँच गयी है और उन्होंने अब संख्या में अंग्रेजी अखबारों को पीछे छोड़ दिया है । पिछले काफी समय से विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित किए जा रहे है । लेकिन हिन्दी की हालत अच्छी नहीं है और इसका दर्जा दोयम होता जा रहा है । महारानी के पद पर अभी भी अंग्रेजी आसीन है , हिन्दी उसकी दासी है । महारानी का दबदबा बढ़ता जा रहा है । ऐसी हालत में हिन्दी का भविष्य अच्छा नहीं है । हिन्दी का भला चाहने वालों को पहले अंग्रेजी को उसके सिंहासन से हटाना पड़ेगा । रानी व दासी वाला रिश्ता ही खतम करना पड़ेगा । इस संघर्ष में भारत की अन्य भाषाओं के लोगों से सहयोग लेना पड़ेगा तथा उनसे बहनापा बढ़ाना पड़ेगा । क्षेत्रीय बोलियों और आदिवासी भाषाओं को भी मान्यता व इज्जत देना होगा ।यह संघर्ष गुलामी की विरासत और वैश्वीकरण के बहुआयामी हमले के खिलाफ़ बड़े संघर्ष का हिस्सा होगा । यह संघर्ष आसान नहीं होगा , क्योंकि अंग्रेजी के वर्चस्व में इस देश के सत्ताधारी वर्ग का निहित स्वार्थ है । उनके विशेषाधिकारों को सुरक्षित रखने और आम जनता की राह में दीवार खड़ी करने का काम अंग्रेजी करती है । इसलिए इस संघर्ष को एक सशक्त जन आंदोलन का रूप देना होगा। इस संघर्ष में कई लोगों को अपना जीवन लगा देना , खपा देना होगा । यह एक और आजादी की लड़ाई होगी । स्वराज का संघर्ष होगा। यह आज की बड़ी चुनौती है ।

                            -x-

[ लेखक , आदिवासी अंचलमें काम करने वाला एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता तथा समाजवादी जनपरिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है । ] पता : सुनील ,ग्राम/पोस्ट - केसला , जिला-होशंगाबाद,(म.प्र.) ४६११११     फोन - ०९४२५०४०४५२

गाय नहीं , ‘काऊ’ : ले . सुनील

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हिन्दी भाषियों पर अंग्रेजी की सवारी

    यह वाकया इन्दौर का है , जहाँ मेरे चाचा रहते हैं । मेरा चचेरा भाई अपनी कार से मुझे बस स्टैण्ड तक छोड़ने आया । घर से निकलते वक्त उसकी दो साल की बिटिया भी साथ चलने को मचल गई । उसे भी साथ लेना पड़ा ।

वह गाड़ी चलाने में दिक्कत कर रही थी , सो मैंने उसे बहलाने के लिए खिड़की के बाहर गाय दिखाई । बात बनी नहीं । तब मेरे भाई ने मुझे सुधारते हुए उसे दिखाया , ‘देखो काऊ’।वह तुरंत बाहर ‘काऊ’ देखने लगी । समस्या हल हो गयी । लेकिन मेरे दिमाग में एक गम्भीर सवाल छोड़ गई । क्या आने वाले समय में भारत की नयी पीढ़ी का दुनिया से परिचय एक विदेशी भाषा में ही होगा ? हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं का कोई भविष्य है या नहीं ?

    वैश्वीकरण का जो हमला भारत के जनजीवन पर हो रहा है , उसके आर्थिक पहलुओं की तो काफी चर्चा होती रहती है । लेकिन इस हमले का एक महत्वपूर्ण आयाम सांस्कृतिक  है। एक जबरदस्त और बुनियादी हमला भाषा और शिक्षा के क्षेत्र में हो रहा है । पिछले दस-पन्द्रह सालों में अचानक देश में अंग्रेजी माध्यम के अधकचरे स्कूलों की बाढ़ आ गई है । एकदम गरीब तबके को छोड़कर ,जिसकी भी थोड़ी-बहुत हैसियत है , वह पेट काटकर भी अपने बच्चे को ‘इंग्लिश मीडियम’ में पढ़ाने की कोशिश कर रहा है । जो हिन्दी का गौरवगान करते हैं , हिन्दी की दुर्दशा पर आंसू बहाते हैं , जो हिन्दी के प्राध्यापक , लेखक या पत्रकार हैं यानी हिन्दी की ही रोटी खा रहे हैं , वे भी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा दिला रहे हैं । सबको डर है कि प्रतिस्पर्धा की दौड़ में उनकी संतानें पीछे न छूट जाँए। और उन्हें इस प्रतिस्पर्धा में एक ही प्रमुख कसौटी दिख रही है - अंग्रेजी का ज्ञान और उस पर अधिकार ,फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने की क्षमता । इस दौड़ में आगे निकलने के लिए बच्चों को शुरु से अपनी भाषा छोड़कर अंग्रेजी शब्द सिखाए जा रहे हैं , गिनती भी अंग्रेजी में सिखाई जाती है । कई बच्चे तो ऐसे हैं , जो अब हिन्दी (या अपनी मातृभाषा) में पढ़ना या गिनना नहीं जानते हैं , और अटक जाते हैं ।

    भारतीय जनजीवन और दिलोदिमाग पर अंग्रेजी का वर्चस्व कोई नया नहीं है । दो सौ साल की गुलामी ने भारतीय समाज और व्यवस्था पए अंग्रेजी साम्राज्य की इस भाषा की पकड़ और जकड़ बहुत मजबूत कर दी थी । आजादी के आन्दोलन , गांधीजी की राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ,और आजादी के बाद राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में अंग्रेजी हटाओ आंदोलन ने इस जकड़-पकड़ को कुछ ढ़ीला किया था , लेकिन अब वह दुगुनी मजबूती से कायम हो गई है । अब तो अंग्रेजी अखबार ही नहीं , उनकी नकल करने वाले हिन्दी अखबार भी बड़े गर्व से हमें सूचना दे रहे हैं कि चाहे चीन बाकी सब मामले में भारत से आगे हो , लेकिन अंग्रेजी जानने वालों की संख्या में भारत आगे है । अब चीन भी अपने लोगों को अंग्रेजी सिखाने पर जोर दे रहा है । गुलामी की एक खासियत यह होती है कि गुलाम अपनी गुलामी की स्थिति में ही खूबियाँ और उसका औचित्य ढूंढ़ने लगता है , उसका गुणगान करने लगता है । हम उसी अवस्था में पहुंचते जा रहे हैं ।

    पहले माध्यमिक शालाओं में पांचवी या छठी कक्षा से अंग्रेजी विषय की पढ़ाई शुरु होती थी । अब अमूमन सभी राज्य सरकारों ने अंग्रेजी की पढ़ाई पहली कक्षा से अनिवार्य कर दी है । हर बच्चे को पहली कक्षा से लेकर कॉलेज तक अनिवार्य रूप से अंग्रेजी पढ़ना ही है । ‘सर्व शिक्षा अभियान’ चलाने वाली सरकारें और बीच में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की चिन्ता में सेमिनार आयोजित करने वाले शासक भूल जाते हैं कि आज भी सबसे ज्यादा बच्चे अंग्रेजी और गणित में ही फेल होते हैं । बच्चों के लिए दोनों विषय इतने ज्यादा दुरूह हैं कि वे नकल करके भी इनमें पास नहीं हो पाते हैं । गणित का मामला कुछ अलग है , लेकिन अंग्रेजी के मामले में तो यह स्वाभाविक है । एक विदेशी भाषा को क्यों बच्चों पर थोपा जा रहा है ?

    बच्चों पर सबसे बड़ा अत्याचार तब हो जाता है , जब उन्हें अंग्रेजी सिर्फ एक विषय के रूप में नहीं , सारे विषय ही अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने पड़ते हैं । दिन-रात घर में अंग्रेजी बोलने वाले परिवारों की बात छोड़ दें , उनकी संख्या भारत में ०.०१ प्रतिशत से भी कम होगी। शेष सारे बच्चों के लिए अंग्रेजी माध्यम से पढ़ना दोहरा बोझ हो जाता है । दुनिया से उनका परिचय तो अपनी मातृभाषा में ही होता है । ऐसी हालत में ,अंग्रेजी में जो पाठ पढ़ाया जाता है , उसे समझने के लिए बच्चे को पहले उसे अपने दिमाग में अपनी भाषा में अनुवाद करना पड़ता है । अनुवाद के बाद विषय वस्तु को समझने की बारी आती है । अक्सर बच्चे भाषा में ही उलझ जाते हैं , विषय को समझने की बारी आती ही नहीं है । तब भी परीक्षा पास होने का दबाव बच्चों पर रहता है ।ऐसी हालत में वे रटने लगते हैं । लेकिन रटने की एक सीमा है ।असाधारण मेहनत की क्षमता वाले बच्चे तो रटकर अच्छे अंक ले आते हैं , बाकी बच्चों की क्षमता जवाब देने लगती है । शिक्षा उनके लिए बोझ और यातना बन जाती है । हमारी शिक्षा व्यवस्था का बोझिलपन और तोतारटन्त चरित्र सिर्फ अंग्रेजी के कारण नहीं है , लेकिन अंग्रेजी का उसमें एक प्रमुख योगदान है ।

    इंग्लिश मीडियम के इस जुनून में कैसी शिक्षा भारत के नौनिहालों को परोसी जा रही है , इसका भी एक दिलचस्प वाकया है । मैं एक गाँव में रहता हूँ ।वहाँ भी कुछ साल पहले एक निजी इंग्लिश मीडियम स्कूल खुल गया । अंग्रेजी में उसके साईनबोर्ड में हिज्जे की दो अशुद्धियाँ थीं । मैं व मेरी पत्नी इस पर चर्चा करते हुए स्कूल के सामने से गुजर रहे थे।शायद स्कूल वालों ने सुन लिया ।उन्होंने एक गलती तो सुधारी , लेकिन दूसरी अशुद्धि कई साल बाद आज भी मौजूद है । उन्हें वह समझ में नहीं आई । स्पष्ट है कि ऐसे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे कहीं के नहीं रहेंगे - न घर के , न घाट के ।

    सारे शिक्षाशास्त्री इस बात पर एकमत हैं कि शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही होनी चाहिए। लेकिन इसके ठीक विपरीत ,अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा का बोलबाला बढ़ता ही जा रहा है । यदि ऐसा ही चलता रहा , तो एक पूरी पीढ़ी तैयार हो जाएगी , जो न तो अपनी भाषा जानेगी , न विषयों का ठीक ज्ञान व समझ उसे हो पाएगी । अंग्रेजी के इस बढ़ते साम्राज्य का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि किसी प्रकार के मौलिक चिन्तन , अध्ययन या विमर्श की संभावनाएं बहुत कम रह जाती हैं । हम हर विषय में सिर्फ नकल और अनुकरण करते रहते हैं ।आज हर विषय में बुनियादी शास्त्र , ग्रन्थ और सिद्धान्त अंग्रेजी से ही आते हैं । भारतीय परिवेश और परिस्थिति के मुताबिक मौलिक ढंग से शास्त्रों को गढ़ने , ज्ञान को परिमार्जित करने और उसके व्यावहारिक प्रयोग(जैसे तकनालॉजी) को विकसित करने का काम उपेक्षित रह जाता है ।हम अपनी परम्परा , विरासत,संस्कृति और अपने इतिहास से भी कटते जाते हैं । आधुनिक होना जरूरी है,लेकिन सिर्फ नकल और गुलामी को आधुनिकता नहीं कहा जा सकता । आधुनिकता की जड़ें हमारी परम्परा और अतीत में होनी चाहिए। इन्हीं जड़ों को काटने का काम अंग्रेजी के माध्यम से हो रहा है । दुनिया का कोई भी देश एक विदेशी भाषा के माध्यम से प्रगति नहीं कर सका है ।

    कई भोले भारतवासी सोचते हैं कि अंग्रेजी पूरी दुनिया की भाषा है । वे सोचते हैं कि अंग्रेजी हमारे लिये पूरी दुनिया और सारे ज्ञान-विज्ञान के दरवाजे खोलती है । दुनिया में हम कहीं भी जाएँगे,तो अंग्रेजी से हमारा काम चल जाएगा ।लेकिन दुनिया का बहुत बड़ा हिस्सा है,जो अंग्रेजों का गुलाम नहीं रहा । वहाँ स्पैनिश,फ्रेंच,जर्मन,रूसी,अरबी,फारसी,चीनी,जापानी और पता नहीं कितनी भाषाएं चलती हैं।वहाँ अंग्रेजी वही सीखता है,जिसे किसी खास अध्ययन ,शोध या व्यापार के सिलसिले में उसकी जरूरत है या फिर जिसे भाषाएं सीखने का शौक है ।भारत की तरह पूरी आबादी पर अंग्रेजी नहीं थोपी जाती ।अंग्रेजी को एक भाषा या एक विषय के रूप में सीखना-सिखाना एक चीज है,और उसे शिक्षा,प्रशासन ,व्यापार और विचार-विमर्श के माध्यम के रूप में १०० करोड़ लोगों पर थोपना दूसरी चीज है ।

    अंग्रेजी के वर्चस्व के पक्ष में एक तर्क यह दिया जाता है कि इसने देश को जोड़कर रखा है । इसे हटा दिया ,तो राष्ट्रीय कामकाज और व्यवहार की भाषा क्या होगी ? हिन्दी व अन्य भाषाओं में टकराव बढ़ेगा, देश टूट जाएगा । यह एक और भ्रम है । पहली बात तो यह है कि देश में आखिर अंग्रेजी जानने-बोलने वाले लोग कितने हैं। मुश्किल से पाँच फीसदी। तो अंग्रेजी से जो एकता बनती है,वह ऊपर के पाँच फीसदी संभ्रान्त वर्ग की एकता होती है,देश की ९५ फीसदी जनता इस ‘एकता’ के बाहर रहती है ।बल्कि अंग्रेजी के कारण एक बड़ा नुकसान हो रहा है । भारत के शिक्षित बौद्धिक वर्ग का काम अंग्रेजी से चल जाता है,इसलिए एक-दूसरे की भारतीय भाषाएं सीखने और एक एक -दूसरे के साहित्य व परम्पराओं को समझने की जरूरत ही नहीं महसूस होती है ।आज यदि किसी भारतीय को द्रविड़ आंदोलन एवं पेरियार के बारे में जानना है या महाराष्ट्र के संत तुकाराम के बारे में जानकारी हासिल करनी है या कश्मीर की सूफी परम्परा का अध्ययन करना है या कर्नाटक के किसान आंदोलन को समझना है , तो वह अंग्रेजी में उपलब्ध सामग्री को खंगालता है और इन भाषाओं को सीखे-समझे बगैर , मूल सामग्रियों को पढ़े बगैर , उसका अध्ययन पूरा हो जाता है । यदि अंग्रेजी रूपी बिचौलिया न होता , तो भारतीय भाषाओं को सीधे आपस में सीखने-समझने और एक-दूसरे में सीधे अनुवाद का दौर चलता ।हम एक-दूसरे के ज्यादा नजदीक आते। राष्ट्रभाषा का सवाल भी तब हल हो जाता । इस दृष्टि से अंग्रेजी ने हमारी राष्ट्रीय एकता का बहुत निकसान किया है ।

    भारत के बच्चों पर अमानवीय अत्याचार करने , करोड़ों भारतवासियों को कुंठित करने , देश की प्रगति रोकने और देश का स्वाभिमान खतम करने वाली अंग्रेजी का कब्जा आज भी कायम है , तो इसके दो प्रमुख कारण हैं । एक तो भारतवासियों की गुलाम मानसिकता और दूसरा शासक वर्ग का निहित स्वार्थ ।अंग्रेजी का वर्चस्व बना रहने में मुट्ठी भर अंग्रेजीदां संभ्रान्त वर्ग का फायदा है । उनके और देश के बाकी जनसाधारण के बीच दीवार बनी रहती है,आम लोगों के आगे बढ़ने में अंग्रेजी का अवरोधक खड़ा रहता है और उनके विशेषाधिकार सुरक्षित रहते हैं । उनकी विशिष्ट स्थिति को चुनौती नहीं मिल पाती है । कुछ लोग ऊपर आते हैं, तो वे भी इस श्रेष्ठिवर्ग का हिस्सा बन जाते हैं ।

( जारी )

देखें : भाषा पर गाँधी

 

   


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