वे बच्चे
मूँडी गोत कर
जिन्हें बारह घण्टे करना होता है काम
दरिद्रता के कोख-जाये बेटे
लक्ष्मी की अमरबेल
जिनकी खिच्ची उँगलियों से
लिपटती है
दो आँखों की चाबुक
उनकी झुकी पीठ पर
निगरानी रखती है
घुटनों पर ही नहीं , आत्मा पर घावों वाले
रिसते घावों वाले
वे बच्चे
रिश्तेदार बताये जाते हैं
नजदीकी रिश्तेदार
दूर गाँव के अपने-सगे
और देखते रह जाते हैं ठगे
प्रशासक और न्यायाधीश
नियम-अधिनियम के नट-बोल्टू
कसने का अभिनय करते
माथ झुकाये
और उस पल तुम सोचते हो
एक पल को सोचते हो
काश ! ये मानव बच्चे नहीं
टिड्डे होते
स्वच्छन्द नभछन्द
चाहे झींगुर ही होते मुक्तकण्ठ -
बँधुआ मजदूर बच्चों की जगह
अनन्त आकाश से घिरी धरती पर
इनके लिए जगह पद़्अती न कम
तुम कहना चाहते हो
हाँ , वे बच्चे और वे ‘बड़े’
रिश्तेदार तो हैं
पर वह रिश्ता कैसा है यह देखो
उन बच्चों की दुबली देह से
जो रक्तशोषी साइफन लगा है
वह उन बड़के गालों को लाल रखता है
रिश्ता खून का है , बेशक !
कि जिस रिश्ते का खून कर देने को छटपटाता है तुम्हारा जी !
- ज्ञानेन्द्रपति

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