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बा

[कटनी स्टेशन पर लोगों की भीड़ से अन्य स्टेशनों से कुछ दूसरा ही जयघोष सुनाई , ' माता कस्तूरबा की जय '।यह नया जयघोष सुनकर स्वाभाविक रूप से हम सब का ध्यान उस ओर गया ।देखा तो हरिलालकाका!शरीर जर्जर हो चुका था।सामने के दाँत गिर चुके थे।सिर के बाल सफ़ेद हो गये थे।]

    महापुरुषों के जीवन में उनकी अर्धांगिनियों का क्या स्थान होता है , यह इतिहास-संशोधन का एक विषय बन सकता है । एक तरफ सीता के कारण रामायण की रचना हुई , तो दूसरी तरफ तुलसीदासजी को पत्नी से वैराग्य की प्रेरणा मिली । पण्डित नेहरू का जीवन जो बना , उसमें कमला नेहरू का हिस्सा कम नहीं था । वैसे तो बापू के जीवन में बा का स्थान वही था , जो अन्य गृहस्थों के जीवन में उनकी पत्नियों का होता है । फिर भी वह असाधारण था। काठियावाड़ के एक राजा के दीवान के सुशिक्षित पुत्र की अशिक्षित पत्नी के रूप में कस्तूरबा के वैवाहिक जीवन का और एक तरह से उनके पूरे जीवन का प्रारम्भ हुआ । आगा खाँ महल में बापू के सान्निध्य में जब उनकी मृत्यु हुई ,तब बापू ने बा के सम्बन्ध में कहा था : ‘ वह तो जगदम्बा थी । ‘ एक सामान्य भारतीय नारी ने अपने जीवन-काल में ही इतनी बड़ी मंजिल कैसे तय कर ली ? यह सही है कि महात्मा गांधी जैसे कि पत्नी बनने का सौभाग्य हर सामान्य भारतीय नारी को नहीं मिलता । कस्तूरबा के विकास का सबसे महत्त्व का कारण यही था कि वह नित्य विकासशील महात्मा की पत्नी थीं । लेकिन यही एकमात्र कारण नहीं था । वह सच्चे अर्थ में महात्मा की सहधर्मचारिणी थीं । महात्मा के साथ - साथ धर्म का आचरण करना कोई छोटी बात नहीं थी । काका के शब्दों में कहा जाय तो वह ज्वालामुखी पर्वत के मुँह पर बैठने जितना कठिन था ।

    भारतीय पुराणों और वांग्मय में पत्नी की जो श्रद्धामयी मूर्ति की कल्पना की गयी है , उस श्रद्धामयी निष्ठावंत सती का दर्शन इस युग में बा में होता था । ऐसी सोलह आने श्रद्धा के कारण ही वह बापू की सहधर्मचारिणी बन सकीं ।

    लेकिन ऐसी श्रद्धा होते हुए भी उन्होंने अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व खो नहीं दिया था । समय - समय बापू को सीधे रास्ते पर लाने का भी काम उन्होंने किया है । दक्षिण - अफ़्रीका में अपने एक हरिजन सहयोगी के मल - मूत्र का बर्तन साफ करने से बा ने इनकार किया था । तब बापू उनको घर से बाहर निकालने जा रहे थे । तब बा ने कहा , ‘ कुछ तो शरम रखो, इस दूर परदेश में आप मुझे घर से निकालने पर उतारू हो गये हैं । ‘ अपने सिद्धान्तों के आग्रह में अन्धे बने बापू को जागृत करने का यह प्रसंग बापू ने खुद ही अश्रुपूर्ण कलम से अपनी आत्मकथा में अंकित किया है । इसके बाद जिन्दगीभर बा ने अपनी स्वतंत्र अस्मिता कायम रखी थी । बापू के साथ वह काफी तपी-तपायी , बापू के साथ निरन्तर उनका जीवन-परिवर्तन भी हुआ। परन्तु यह सारा परिवर्तन उन्होंने स्वेच्छापूर्वक किया । बापू की सर्वधर्म-प्रार्थना में शामिल होती थीं , फिर भी तुलसी और पीपल के पेड़ की पूजा वह नियमित रूप से करती थीं । बापू के विशाल परिवार को बा एक मातृस्थान लगती थीं, फिर भी बा अपने रक्त-सम्बन्धी सगे लोगों के विषय में बापू के जितनी अलिप्त नहीं रहती थीं ।

    इस समबन्ध में सबसे कठिन परीक्षा हरिलालकाका ( बापू के ज्येष्ठ पुत्र ) ने करायी । बचपन से उनको शिकायत थी कि बापू ने उनकी शिक्षा का ठीक प्रबन्ध नहीं किया । तब से ही उनका स्वभाव बापू के खिलाफ़ बग़ावत करने का बन गया था । खास करके उनकी पत्नी गुलाबबहन ( नाम के जैसा ही उनका स्वभाव था ) की मृत्यु के बाद हरिलालकाका रस्ते से भटक गये । उनको ऐसी संगत मिली , जिससे वे कुमार्ग पर उतर गये । उनके इस व्यवहार का बा को बड़ा दुख था । काफी कोशिश की गयी , लेकिन आखिर तक वे वापस नहीं आये । कुछ दिन बाद खबर आयी कि उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया । उस समय कस्तूरबा ने हरिलाल के नाम पत्र लिखकर अपनी अंतर्वेदना प्रकट की । इस पत्र के विषय में हरिलालकाका ने इतना ही कहा , ‘ यह पत्र बा का नहीं है । उनके नाम से किसी और ने लिखाया है । ‘

    लेकिन हरिलालकाका के चित्त के किसी गहरे कोने में बा के विषय में कोमल भावना थी । ऐसा एक प्रसंग मैंने वनमालाबहन की ‘ अमारां बा ‘ पुस्तक के लिए लिख भेजा था । वही आज स्मरण के आधार पर लिख देता हूँ । हम लोग इलाहाबाद से वर्धा जा रहे थे । कटनी स्टेशन पर लोगों की भीड़ से अन्य स्टेशनों से कुछ दूसरा ही जयघोष सुनकर स्वाभाविक रूप से हम सबका ध्यान उसकी ओर गया । देखा तो हरिलालकाका ! शरीर जर्जर हो चुका था । सामने के दाँत गिर चुके थे । सिर के बाल सफेद हो गये थे । फटे कपड़ों की जेब में से एक मौसंबी निकालकर उन्होंने कहा , ‘ बा ,यह तुम्हारे लिए लाया हूँ । ‘

    बापू ने पूछा , ‘ मेरे लिए कुछ नहीं लाया ? ‘

    ‘ नहीं , आपके लिये कुछ नहीं लाया हूँ । आपसे मुझे इतना ही कहना है है कि बा के पुण्य के कारण ही आप इतने बड़े हुए हैं , इस बात को भूलियेगा नहीं । ‘

    ‘ यह तो ठीक है । लेकिन क्या तुझे अब हमारे साथ चलना है ? ‘

   ’ नहीं , मैं तो बा से मिलने आया हूँ ।लो बा , यह मोसंबी तुम्हारे लिए माँगकर लाया हूँ।’

    बा ने मोसंबी हाथ में ली । लेकिन इतने से ही हरिलालकाका को सन्तोष नहीं हुआ । पूछा , ‘ क्यों बा , यह मोसंबी तुम ही खाओगी न ? न खानेनाली हो तो मुझे वापस कर दो ।

    बा ने मोसंबी खाने का वचन दिया । फिर उन्होंने भी हरिलालकाका से आग्रह किया कि वे बापू के साथ चलें ।

    बा को जवाब देते समय हरिलालकाका की आँखें भर आयीं । ‘ साथ चलने की बात अब छोड़ दो बा , अब मैं इसमें से नहीं निकल सकूँगा । ‘

    अधिक बातचीत करने के लिए समय भी नहीं था । सीटी हुई और गाड़ी चल दी । हरिलालकाका फिर से याद देते हुए कह रहे थे ‘ मेरी मोसंबी तुम ही खाना, बा । ‘

    गाड़ी कुछ आगे बढ़ी तब बा को लगा ‘ अरे , उस बेचारे से कुछ खाने - पीने का पूछा तक नहीं। अपने पास तो टोकरीभर फल पड़े थे । बेचारा भूखा मरता होगा । ‘ लेकिन गाड़ी प्लेट्फार्म छोड़ चुकी थी । लोगों के जयघोष के बीच में से अभी भी हमारे कानों में वह क्षीण आवाज घूम रही थी ‘ माता कस्तूरबा की जय । ‘

    मणिलालकाका दक्षिण -अफ़्रीका में रहकर ‘ इंडियन ओपीनियन ‘ अखबार चलाते थे । रामदासकाका रेशमी स्वभाव के व्यक्त । कहीं भी गांधी के पुत्र के नाते अपनी पहचान नहीं देते हैं । नागपुर में एक सामान्य नौकरी करके अपने कुटुंब का भरण-पोषण किया । देवदासकाका ‘ हिन्दुस्तान टाइम्स ‘ के मैनेजिंग डाइरेक्टर थे । इस तरह बा के सभी पुत्र बा से दूर-दूर थे। लेकिन पौत्र और पौत्रियाँ बा के पास ही रहती थीं । साबरमती - आश्रम में कांतिभाई , रसिकभाई और मनुबहन थे । इनके अलावा छगनलाल,मगनलाल,नारण्दास गांधी ( बापू के भतीजे ) के अनेक बालक आश्रम में थे । सेवाग्राम में रामदासकाका का कनु था । बाद में गांधी - परिवार के बालकों में जयसुखलाल गांधी ( बापू के पैतृक भतीजे ) की पुत्री मनु भी थी। इन बालकों के प्रति बा का वात्सल्यभाव विशेष था ।

    इसके अलावा बापू के सगे भी बा के सगे बनकर आते थे , वे अलग। एक बार मध्यप्रदेश के डॊ. खरे के मन्त्रिमण्डल में हरिजनों को नहीं लिया गया , इसको लेकर कुछ हरिजनों ने बापू के आश्रम में आकर ‘सत्याग्रह’ करने का निश्चय किया ।उनके सत्याग्रह का स्वरूप बापू के सत्याग्रह से कुछ अलग ही था । बापू सत्याग्रह करते थे तो अपने प्राणों की बाजी लगा देते थे। इनके सत्याग्रह में उपवास था , लेकिन मृत्यु का भय नहीं था । क्योंकि बारी-बारी से एक आदमी २४ घण्टों का उपवास करता था । इन लोगों ने सत्याग्रहियों के रहने के लिए आश्रम में जगह की माँग की ।बापू ने उनको ही जगह पसंद कर लेने को कहा । इन लोगों ने सब कुटियों को देखकर बा की कुटी ही पसन्द की । (जारी)

 

 

बापू की गोद में (१६) : परपीड़ा

    गरमी के दिनों में शिमला जाने का मौका मिले , तो किसे अच्छा नहीं लगेगा ? खुशनुमा हवा , पहाड़ों की चोटियाँ , एक के बाद एक नयी - नयी उपत्यकाओं की ओर ले जाने का निमंत्रण देती थीं । वहाँ के सफ़ेद बादलों और सफेद पंछियों की कतारों के साथ मन भी उड़ने लगता है ।

    गरमी के दिनों में  भारत की राजधानी दिल्ली से शिमला चली आती है । बारिश के और जाड़े के दिनों में सूना पड़ा हुआ यह शहर गरमी के दिनों में विविध प्रकार की विदेशी चमक - दमक से गूँजने लगता है । बड़े लाट की कोठी ( वाइस-रीगल लॊज ) के सामने वाइसराय के बॊडीगार्ड के सिपाही अपने बूटों को खटक से पटकते हुए रोज कवायद करना शुरु करते हैं। नीचे पोलोग्राउण्ड पर गोरे सवारों के साथ लाल घोड़े कूदने लगते हैं , सड़कों पर मेम साहिबाएँ अपने दर्जनों कुत्तों को साथ लेकर चक्कर लगाने लगाती हैं । उनके एक - एक कुत्ते पर भारत के सामान्य नागरिकों की आय से भी अधिक खर्च होता था । ऊपर ‘ जैको ‘ की चोटी पर उनकी सहेलियाँ चने फेंक - फेंककर बन्दरों को नचाती हैं । यहाँ का वातावरण देखकर किसी को स्वप्न में भी यह ख्याल नहीं आता होगा कि एक अत्यन्त दरिद्र देश की यह राजधानी है ।

    सन् १९३९ में गरमी के दिनों की इस राजधानी में दरिद्रनारायण के प्रतिनिधि बापू पहुँचे थे । वही छोटी-सी चादर , वही छोटा-सा कच्छा और वही सादा तेजस्वी मुख । बापू के जाने से शिमला की सूरत भी बदल गयी थी । उसका साहबी ठाठ न जाने कहाँ गायब हो गया । यहाँ भी वही दर्शनोत्सुक लोगों की भीड़ इकट्ठा होने लगी ।

    दूसरे महायुद्ध में हिटलर के विरुद्ध लड़ाई छिड़ गयी । उसमें वाइसराय ने यह बात जाहिर की कि भारत इंग्लैंड के पक्ष में है । इससे स्वाभाविक ही भारत के स्वाभीमान को ठेस पहुँची । इस निर्णय के विरोध में ‘ हरिजन ‘ में लेख लिखकर बापू ने भारत के दिल की बात प्रकट की ।उन दिनों प्रान्तों में लोकप्रिय मन्त्रिमण्डलों का शासन था । भारत किस पक्ष में है , इसकी घोषणा करने के पहले कम - से - कम इन मन्त्रिमण्डलों की तो सरकार सलाह लेती । लेकिन आज एकछ्त्र शासन चलानेवाली ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि को इसकी क्या जरूरत थी ? इधर कांग्रेस में भी विश्व - युद्ध के प्रश्न को लेकर अलग - अलग रायें प्रकट हो रही थीं , लेकिन सब इस बात पर सहमत थे कि ब्रिटिश सरकार के साथ बापू ही बातचीत करें । इसी सिलसिले में बापू शिमला पहुँचे थे ।

     बातचीत पाँच - सात दिन के लिए स्थगित की गयी थी । वायसराय तो अंग्रेज - सरकार के केवल प्रतिनिधिमात्र थे । वे हर प्रश्न पर अन्तिम निर्णय नहीं ले सकते थे । कई मह्त्व के प्रश्नों पर विलायत से आदेश प्राप्त करने तक उनको रुकना पड़ता था । इंग्लैंड से आदेश प्राप्त होने तक बातचीत स्थगित रखी जाती थी ।एक सप्ताह के बाद फिर से बातचीत शुरु होनेवाली थी ।

    इस सप्ताह का उपयोग शिमला के आसपास के पहाड़ों की सैर करने में किया जाय , ऐसे मनसूबे हम बाँधने लगे थे । इतने में बापू का आदेश हुआ ‘ अपना अपना बोरा - बिस्तर बाँधो । ‘

    ‘ कहाँ जाना है ? ‘

    ‘ और कहाँ ? सेवाग्राम वापस । ‘

    ‘ लेकिन एक सप्ताह बाद फिर से बातचीत आगे चलनेवाली है ? ‘

    ‘ हाँ , हाँ , लेकिन सेवाग्राम में दो दिन मिलेंगे न ? ‘

    ‘ वहाँ कौन - सा इतना मह्त्व का काम है ? ‘

    ‘ परचुरे शास्त्री की सेवा का काम तो महत्त्व का है न ? ‘ बापू ने प्रतिप्रश्न किया । काका निरुत्तर हो गये ।

    इस दलील के महत्त्व को जानने के लिए हमें कुछ वर्ष पीछे जाना होगा । एक दिन शाम को बापू से किसीने आकर कहा कि ‘ गौशाला के पीछे एक फकीर जैसा आदमी छिपा खड़ा है। आपको पहचानता है , ऐसा लगता है। ‘

    बापू गौशाला पहुँचे । फकीर जैसे दीखनेवाले व्यक्ति ने बापू को साष्टांग प्रणिपात किया । उसके मुँह से संस्कृत श्लोकों की वन्दना प्रस्फुटित हो रही थी ।

    ‘ अरे , ये तो परचुरे शास्त्री ! कहो , कैसे अचानक आना हुआ ? ‘

    परचुरे शास्त्री संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे । कुछ दिन साबरमती आश्रम में रह चुके थे । फिर शायद लड़कों की गृहस्थी की व्यवस्था बैठाने चले गये थे। वहीं से खबर लगी कि उनको कुष्ठ रोग की छूत लग गयी है ।

    मानव - समाज ने अपने अज्ञान के कारण समाज के कई वर्गों पर हजारों साल से अन्याय किया है , उनमें कुष्ठरोगियों का वर्ग शामिल है । हजारों वर्षों से इस रोग का जिक्र होता आया है और दुनिया के हरएक देश में कुष्ठरोगियों को घृणा की नज़र से देखा गया है। अपने देश में भी कुष्ठरोगियों की हालत अन्य देशों की तुलना में अच्छी नहीं कही जाएगी । सुना है कि सौराष्ट्र के कुछ हिस्सों में कुष्टरोगियों को जिंदा समुद्र में फेंक दिया जाता है ।

    परचुरे शास्त्री ने कहा , ‘ रोग बढ़ गया है । समाज मुझे स्वीकार करने को तैयार नहीं है। मर जाने का निश्चय कर चुका हूँ ।आखिर के दिन आपके आश्रम में आपकी छत्रछाया में बिताकर शांति से मरना चाहता हूँ । मुझे दो रोटियों से अधिक की आवश्यकता नहीं है । यहाँ रहने की अनुमति प्रदान करके अनुग्रह कीजिएगा । ‘

    पर - पीड़ा देखकर वैष्णव - जन का हृदय द्रवित हुआ । बापू ने तुरंत कहा , ‘ मेरे आश्रम में रहने की तो आपको छूट है , लेकिन आपको मरने नहीं दिया जाएगा । ‘

    यह निर्णय करने से पहले बापू को भी थोड़ा सोचना पड़ा था । क्योंकि दूसरे कार्यकर्ताओं की भावना और संसर्ग की सम्भावना का खयाल भी उनको रखना था । देखते - देखते बापू की कुटी के पड़ोस में , लेकिन अन्य कुटियों से कु्छ हटकर , शास्त्रीजी के लिए एक कुटी तैयार हो गयी । एक चारपाई पर शास्त्रीजी का बिस्तर लगा दिया गया और उनके खाने - पीने की व्यवस्था वहीं झोंपड़ी में की गयी ।

    कुष्ठरोग के लिए समाज में जो तीव्र घृणा की भावना है , उसका मुख्य कारण यह है कि इस रोग को भयानक संसर्ग - जन्य रोग के रूप में माना गया है । लेकिन आधुनिक विज्ञान का निर्णय है कि कुष्ठरोग यक्ष्मा या माता के रोग के जितना भी संसर्गजन्य नहीं है । बापू की देखभाल में शास्त्रीजी की चिकित्सा का सारा इंतजाम ठीक हो गया ।

    शिमला से दो दिन के लिए बापू ने सेवाग्राम जाने का निर्णय लिया था । क्योंकि उनके मन में देश की आजादी के प्रश्न पर वाइसराय से बातचीत चलाने और एक कुष्ठरोगी की सेवा करने का महत्व समान था । बापू की जीवन - साधना में व्यक्तिगत चित्त-शुद्धि और सामाजिक क्रांति दोनों अविभाज्य और अभिन्न थे । इसीलिए वे एक रोगी की सेवा भी राष्ट्रसेवा जितनी भक्ति से करते थे । नतीजा यह होता था कि वे किसी व्यक्तिगत काम को उठाते थे तो उस काम को सामाजिक महत्त्व प्राप्त हो जाता था और यही उनके व्यक्तित्व के क्षितिजव्यापी होने का राज है ।

    उसमें फिर कुष्ठरोगियों की सेवा - यह  एक सांकेतिक काम भी था ; यानी समाज के एक अत्यन्त उपेक्षित वर्ग की सेवा का काम । सर्वोदय का प्रारम्भ अन्त्योदय से ही होता है ।

    भारत में अब तक जितना भी कुष्ठसेवा का काम हुआ है , वह करीब - करीब ईसाई मिशनरियों के जरिये हुआ है । ईसाई मिशनरियों ने उसे एक धर्मकृत्य माना है । इसीलिए कुछ ईसाई मिशनरियों ने कुष्ठरोगियों की सेवा करते हुए खुद कुष्ठरोग के शिकार होने का खतरा उठाकर प्राण भी गँवाये हैं । ईसाइयों को छोड़कर अन्य लोग कुष्ठसेवा के काम में नहीं पड़े थे । बापू ने अन्य कई विषयों की तरह इस  विषय में भी पहल की। उनकी और विनोबा की प्रेरणा से श्री मनोहर दिवाण ने कुष्ठरोगियों की सेवा में जीवन समर्पण करने का निश्चय किया । उनकी कुष्ठसेवा के परिणामस्वरूप वर्धा और पवनार के बीच दत्तपुर कुष्ठधाम की स्थापना हुई ।

    कुष्ठरोगी का स्पर्श भयंकर माना जाता है , लेकिन बापू ने परचुरे शास्त्री की सेवा का जो काम अपने जिम्मे लिया था , वह उनके शरीर में मालिश करने का था । परचुरे शास्त्री सेवाग्राम आश्रम आये,तभी उनका रोग असाध्य हो चुका था । फिर भी सेवाग्राम में उनकी जो सेवा और देखभाल की गयी , उससे कुछ समय के लिए उनका स्वास्थ्य कुछ सुधर गया था।उस समय वे हम लोगों को संस्कृत भी पढ़ाते थे । बापू सेवाग्राम से बाहर अधिक समय रहने लगे , तब शास्त्रीजी का स्वास्थ्य फिर से बिगड़ गया । इसलिए उनको दत्तपुर कुष्ठधाम में पहुँचा दिया गया । वहीं उनकी मृत्यु हुई ।

    इस प्रकार बापू के पास हमेशा कोई न कोई मरीज रहता ही था । बीच में तीन - चार महीने के लिए आचार्य नरेन्द्रदेव इलाज के लिए आये थे । विनोबाजी के भाई बालकोबा भी क्षय रोग से पीड़ित थे । लेकिन उससे वे मुक्त हुए और प्राकृतिक चिकित्सा के काम में उन्होंने अपना जीवन समर्पित किया । किशोरलालभाई तो कायम के बीमार थे । लेकिन इन सबकी सेवा से भी परचुरे शास्त्री की सेवा का पुण्य श्रेष्ठ था । उनकी बापू ने जो सेवा की , वह भगवान् ईसामसीह की योग्यता की कही जाएगी ।

अगला प्रसंग : बा

 

 

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बापू की गोद में (१५) : मेरे लिए एक स्वामी बस है !

   देश के सामने बापू ने एक भी राजनीतिक कार्यक्रम ऐसा नहीं रखा , जिसके साथ कोई - न - कोई रचनात्मक कार्यक्रम भी न जुड़ा हो ।देश में स्वदेशी का आन्दोलन शुरु हुआ तो उसके साथ विदेशी कपड़ों की होली जलाने तक का कार्यक्रम चलाया गया । लेकिन इसीके साथ बापू ने खादी - ग्रामोद्योग का ऐसा एक रचनात्मक कार्यक्रम शुरु किया , जिसका महत्व आज पचास साल के बाद भी इस देश की गरीब जनता के लिए उतना ही बना हुआ है। अस्पृश्यता-निवारण के साथ उन्होंने ग्राम-सफाई का कार्यक्रम दिया ।इतिहास में शायद ही ऐसे किसी राष्ट्र-नेता का निर्माण हुआ होगा , जिसकी प्रतिभा ने इतनी कुशलता से जीर्ण-शीर्ण पुरानी मान्यताओं को नष्ट करके उसकी जगह नवीन मान्यताओं को पेश करने की द्विविध प्रक्रिया चलायी हो ।

    इसी प्रकार भाषावार प्रांतरचना के राजनीतिक कार्यक्रम के साथ - साथ बापू नी मातृभाषा के प्रेम का और राष्ट्रभाषा को शिक्षा में स्थान देने का कार्यक्रम देश के सामने रखा । लेकिन इस देश का दुर्दैव है कि बापू के राजनीतिक कार्यक्रमों को जितने उत्साह से अपनाया गया , उतना उत्साह उनके रचनात्मक कार्यों के प्रति नहीं दिखाया गया । वह दिखाया गया होता तो भाषा के प्रश्न को लेकर जो दंगे - फसाद हुए , उनका कलंक भारत के ललाट पर शायद न लिखा जाता ।

    दक्षिण में हिन्दी के प्रचार का प्रारम्भ बापू ने कई वर्ष पहले ही कर दिया था ।सम्राट अशोक ने जिस तरह बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए संघमित्रा को भेजा था , वैसे हिन्दी - प्रचार के लिए बापू ने अपने कनिष्ठ पुत्र देवदासभाई को दक्षिण में भेजा था । उन्होंने हिन्दी - प्रचार का जो बीज दक्षिण में बोया था , उसका वृक्ष आज फला फूला है ।दक्षिण भारत हिन्दी-प्रचार-सभा की बैठक में बापू को अध्यक्ष के तौर पर जाना था। मद्रास में दक्षिण भारत हिन्दी-प्रचार-सभा का वातावरण जिन्होंने देखा होगा , उन्होंने यह महसूस ही नहीं किया होगा कि वे किसी अहिन्दी प्रान्त में आये हैं ।छोटे बच्चे भी वहाँ शुद्ध हिन्दी में बात करते थे । वैसे तमिल लोग भाषा सीखने में बड़े तेज होते हैं ।फिर हिन्दी के लिए तो बापू की प्रेरणा थी।बापू के हाथों हिन्दी भाषा के प्रमाणपत्र वितरित हुए । एक छोटी बालिका ने बापू के गले में माला डाली। बापू ने वही माला हँसते-हँसते वापस उस बालिका को पहना दी। बापू के हिन्दी भाषण से उस बालिका की हिन्दी की किसी प्रकार कम दर्जे की नहीं थी । दक्षिण के लोगों को हिन्दी और उत्तर भारत के लोगों को दक्षिण की कोई एक भाषा सीखनी चाहिए,ऐसी सिफारिश बापू ने की । बापू दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मजदूरों के बीच काम करते थे ,तभी उन्होंने तमिल कुछ - कुछ सीख ली थी । बापू के भाषण से प्रेरणा पाकर काका ने भी तमिल सीखना शुरु किया । उस समय के उनके तमिल शिक्षक श्री अरुणाचलमजी ने उस प्रसंग को याद करते हुए मुझसे कहा : ‘ वैसे महादेवभाई मुझसे तमिल भाषा सीखते थे । लेकिन तमिल भाषा की कई खूबियाँ तो मैं उनसे ही सीखा । भाषा किस प्रकार सिखायी जाए , यह भी उन्होंने ही मुझे सिखाया, ऐसा कहना चाहिए । ‘

    बापू का सुझाया हुआ शायद ही ऐसा कोई रचनात्मक कार्यक्रम होगा , जिसे काका ने हाथों हाथ न लिया हो । सूत कताई सम्बन्धी काका निष्ठा नि:सीम थी । चाहे जितना काम हो , काते बगैर एक दिन भी नहीं सोते थे । आखिर के दिनों में हर रोज ५०० गज सूत कातने का उन्होंने नियम बना लिया था । ( मुझे पढ़ाने के लिए काका को कताई का समय ही उपलब्ध था ।) १५ अगस्त १९४२ के दिन काका आगा खाँ महल में दिवंगत हुए ।१४ अगस्त तक ५०० गज सूत कातने का अपना नियम उन्होंने निभाया था ।

    हृदय को जोड़ने की शक्ति भाषा में और रचनात्मक कार्य में है ,इस बात पर बापू की कितनी श्रद्धा थी उसका एक उदाहरण यहाँ देना चाहूँगा ।बापू अपनी अन्तिम जेलयात्रा से बाहर आने पर बीमारी के कारण पंचगनी गये थे । उस समय मैं बापू को उनकी सूत-कताई के समय एक घण्टा अखबार पढ़कर सुनाता था । एक दिन श्री सर्वपल्ली राधाकृष्णन बापू से मिलने आये । मुझे देखकर वे बापू से कहने लगे , ‘ इसे मेरे पास बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी में पढ़ने के लिए भेज दीजिए ।’ स्वराज्य मिलने तक किसी स्कूल-कॊलेज में न पढ़ने का अपना निश्चय मैंने उनको सुनाया। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने बापू से इस सम्बन्ध में अलग से बात की होगी । दूसरे दिन मैं जब अखबार पढ़ने बैठा तो बापू ने कहा : ‘ आज अखबार नहीं पढ़ेंगे। आज तेरे भविष्य के सम्बन्ध में बात करनी है। तूने राधाकृष्णन के पास जाने इन्कार किया , यह तो उचित ही किया। लेकिन भविष्य में क्या करना है , इसका निर्णय तुझे कर लेना चाहिए ।’ मैंने बापू से कहा : ‘ तो उसके लिए तो पूरा एक घण्टा देने की जरूरत नहीं है। पाँच मिनट काफी हैं।’ ५५ मिनट तक अखबार पढ़ने के बाद मैंने बापू से कहा : ‘ भविष्य में क्या करना है , इसका निर्णय मैंने कर लिया है ।आज आपके साथियों में से कुछ राजनीति में पड़े हैं और कुछ रचनात्मक कामों में पड़े हैं। मुझे वे दोनों एकांगी लगते हैं । मुझे इन दोनों के बीच का पुल बनना है। ‘ इतना कहकर मैं चुप हो गया।बापू ने तीन मिनट तक मेरा मार्गदर्शन किया । उसमें एक मिनट तो मेरी खबर लेने में बिताया । उन्होंने कहा : ‘तूने एक घण्टे के बदले पाँच मिनट इस चर्चा में देना चाहा , यह मुझे अच्छा लगा।तूने जो निश्चय किया है , वह भी अच्छा है। लेकिन उसके लिए तुझे दो काम करने चाहिए। एक यह कि तू खादी-विद्या में प्रवीण बन जा । दूसरा यह कि भारत की सब भाषाएँ सीख ले । भारत को समझने के लिए यह जरूरी है ।’

    दक्षिण भारत हिन्दी-प्रचार-सभा से वापसे आते समय एक घटना घटी,उसका भी यहाँ जि्क्र कर दूँ । मद्रास से वर्धा आते समय रास्ते में बेझवाड़ा (विजयवाड़ा) स्टेशन पड़ता है। दो बड़े पहाड़ों में से बहती आयी कृष्णा नदी यहाँ विशाल रूप धारण करती है। आज इस नदी पर बने बाँध के कारण वहाँ बिजली की बत्तियों की जगमगाहट है ।लेकिन उन दिनों वहाँ प्रकृति का अकृतिम सौन्दर्य शोभायमान था । विजयवाड़ा स्टेशन आने से पहले बात शुरु हुई। जमनालालजी रमण महर्षि के आश्रम होकर आये थे ।उन्होंने उस आश्रम की पवित्रता और शांति की भूरि-भूरि प्रशंसा बापू से की। किसी साधु पुरुष की चर्चा चलते ही काका का हृदय गदगद हो जाया करता था । वे बड़े भक्तिभाव से और उत्साह से रमण महर्षि के सम्बन्ध में पूछने लगे । बापू,काका और जमनालालजी तीनों को समान दिलचस्पी का विषय चर्चा के लिए मिल गया । बातें चल रही थीं , इतने में बापू ने सुझाया , ‘ महादेव , तुम एक बार उस आश्रम में क्यों नहीं हो आते ?’ काका का हृदय आनन्दविभोर हो उठा । जमनालालजी ने प्रोत्साहन दिया ,’ हाँ-हाँ , एक बार अवश्य जाना चाहिए । तिरुवण्णामलय जाने के लिए बेझवाड़ा में गाड़ी बदलना अधिक अनुकूल है। यहाँ तक आये ही हो तो अभी ही हो आओ । फिर कब तुमको फुरसत मिलेगी ? ‘

    काका ने मुझे बिस्तरा तैयार करने को कहा । गाड़ी कृष्णा नदी के पुल पर आ पहुँची थी। जमनालालजी बापू से कह रहे थे , ‘ वहाँ के जितनी शान्ति तो मुझे आपके आश्रम में भी नहीं दिखाई दी । ‘

    कुछ देर के बाद बापू ने काका से कहा : ‘ वहाँ से वापस आने की जल्दी मत करना । तुम्हें भी जमनालालजी की तरह वहाँ शान्ति का अनुभव हुआ तो वहाँ अधिक दिन तक खुशी से रहो। काम की चिन्ता मत करो । ‘

    बापू ने तो सहज भाव से यह कह दिया , लेकिन बापू को अधिक समय तक छोड़कर रहने का विचार ही काका के लिए असह्य था ।उन्होंने मेरी तरफ देखकर कहा : ‘ बाबला , बिस्तर खोल दे । मैं सुनकर हैरान रह गया। बापू भी आश्चर्य से काका की तरफ देखने लगे । उन्होंने पूछा,’क्यों महादेव, बिस्तर खोलने को क्यों कहते हो ? ‘

    ‘मैंने जाने का विचार छोड़ दिया है । ‘

    ‘ क्यों ? ‘

    ‘ मेरे लिए एक स्वामी बस है ! ‘

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अगला संस्मरण : परपीड़ा

मैसूर और राजकोट (२)

गत प्रविष्टी से आगे :  काका ने पूछा , ‘यानी कैसे ?’

मैंने कहा , ‘ वुड्रो विल्सन प्रथम महायुद्ध के बाद जब इंग्लैंड गये , तब उनका वहाँ अभूतपूर्व स्वागत हुआ और जगह-जगह सम्मान किया गया । इस स्वागत के बहाव में अपने चौदह मुद्दे विल्सन भूल गये , यह आपने ही मुझे बताया था न ? वैसे यहाँ आपका भव्य स्वागत हो रहा है । लेकिन यहाँ आप जाँच करने आये हैं , यह मत भूलिएगा। ‘

    काका ने कहा ,’ वा रे वाह , तू तो अब मेरा सलाहकार बन गया । ‘

    लेकिन सचमुच काका ने मेरी सलाह मानी। उसके बाद उन्होंने मैसूर राज्य के गुण-दोषों का वर्णन मुझसे नहीं किया । चुपचाप सब देखते गये । पूरे राज्य में घूमने का उनका कार्यक्रम बनाया गया। आम सभाओं में , जेलों में , व्यक्तिगत तथा जाहिर मुलाकातों में , सरकारी अफसरों की उपस्थिति में और उनके प्रतिप्रश्नों के जवाब में अत्याचारों की जो कहानियाँ सुनाई गयीं ,वे शरीर कँपा देने वाली थीं । मुझे तो तभी मलूम हुआ कि भारत के स्वराज्य-आन्दोलन की तुलना में रियासतों के जिम्मेवार शासन-तंत्र के लिए चलाये गये ये आन्दोलन कितने अधिक कष्टप्रद और कठिन थे । स्वराज्य के आन्दोलन में एक आधुनिक सरकार से लड़ाई थी । उसको कानून और न्याय का कम-सेकम दिखावा तो करना ही पड़ता था। लेकिन रियासतों में तो राज्य चाहे जितना सुधरा हुआ हो , फिर भी वहाँ की राज्यसंस्था तो मध्ययुगीन ही थी । मैसूर जैसे प्रगतिशील राज्य में भी पुलिस अत्याचारों के वीभत्स प्रकार लोगों ने हमारे सामने बयान किये। कैदियों के मुँह मे जबरदस्ती पेशाब डालने की शिकायत तो सुनी हुई अन्य शिकायतों की तुलना में बहुत मामूली कही जाएगी । यह सब बातें सुनकर काका का पुण्यप्रकोप उग्र होता गया । गेरसप्पा का प्रपात देखने के लिए मेरे अकेले जाने की व्यवस्था की गयी थी ।लेकिन स्थानीय कार्यकर्ताओं ने आग्रह करके काका को भी साथ ले लिया । वहाँ हमने प्रकृति के इस अद्वितीय सौन्दर्य के साथ वहाँ की जनता की कमाल की दरिद्रता भी देखी । सब जगह घूमकर वापस आने पर मिर्जा साहब से काका की फिर लम्बी बातचीत हुई । इस समय मिर्जा साहब के घर भोजन का निमंत्रण भी हमें मिला। लेकिन इतने दिनों में राज्य में जो देखा और सुना , वह काका की आँखों से ओझल नहीं होता था । आखिर के दिन बँगलोर में जाहिर सभा हुई । अपनी जाँच के सम्बन्ध में काका कुछ कहनेवाले नहीं थे , क्योंकि उन्हें तो अपनी रिपोर्ट बापू के पास देनी थी । फिर भी काका ने उस सभा में इतना जिक्र तो किया ही , ‘ मैंने आपका यह सुन्दर राज्य देखा है और इस राज्य में हुए भयंकर अत्याचारों की कहानियाँ भी सुनी हैं। जिसे दुनिया का आश्चर्य कहा जाएगा , ऐसा यहाँ का का गेरसप्पा का प्रपात भी देखा । साथ - साथ यह भी देखा कि वहाँ के गरीब लोग अपनी कमर में रस्सी बाँधकर उस प्रपात के पीछे कबूतरों द्वारा जमा करके रखे हुए अनाज में से कुछ दाने प्राप्त करके पेट की आग बुझाने की कोशिश में जान जोखिम में डालकर नीचे उतरते हैं । जिस राज्य में इतनी गरीबी है, उसको कैसे प्रगतिशील कहा जाय, समझ में नहीं आता । ‘

    वर्धा पहुँचने के बाद पता चला कि इस जाहिर सभा का काका का भाषण दीवान साहब को जरा भी अच्छा नहीं लगा था । बापू के साथ के अपने पत्र-व्यवहार में उन्होंने कहा कि महादेवभाई की यात्रा एकतरफा हुई । लेकिन बापू ने काका की रिपोर्ट को ही ठीक माना । बाद में यह भी सुना कि मैसूर राज्य के अत्याचारों में जो अधिकारी कुप्रसिद्ध हुए थे , उनको दीवान साहब ने नौकरी से हटाया था ।

    रियासतों के संग्राम में बापू का सीधा सम्बन्ध आया राजकोट में । इस संग्राम में कस्तूरबा ने पहले प्रवेश किया। उन्होंने वृद्धावस्था में और कमजोरी की हालत में राजकोट राज्य की जेलयात्रा भी की । बापू नी राजकोट में दो बार अनशन किया ।सरदार तो पूरे आन्दोलन को मार्गदर्शन दे ही रहे थे । उस समय अस्वस्थ होने के कारण काका दिल्ली में थे । वहाँ रहते हुए भी राजकोट के आन्दोलन का कुछ काम उनके जिम्मे आ ही जाता था।बीच में राजकोट का मामला उस समय के भारत के मुख्य न्यायाधीश स मॊरिस ग्वायर को सुपुर्द किया गया था । उनसे मिलने और मामले की सारी बातें समझाने काका गये थे । ग्वायर का फैसला सम्पूर्ण रूप से प्रजा की तरफ़ का हुआ । स्वाभाविक ही सारी प्रजा में आनन्द की लहर दौड़ गयी । लेकिन उस समय के दीवान श्रीवीरावाला टस से मस न हुए । बापू से उन्होंने पूछा, ‘ आपको मेरे साथ बातचीत करनी है या ग्वायर के फैसले की धौंस बतानी है ? ‘ बापू की सूक्ष्म अहिंसा ने प्रतिपक्षी की यह दलील तुरंत मान ली । उन्होंने जाहिर किया कि ग्वायर के फैसले के आधार पर मैं किसी का हृदय-परिवर्तन नहीं कर सकता। मुझे तो ऐसे किसी फैसले का आधार लिए बिना ही दीवान साहब या ठाकुर साहब के साथ बातचीत करनी चाहिए । उन्होंने ग्वायर के फैसले का आधार छोड़ दिया । राज्य की प्रजा को और भारत की जनता को बापू की यह बात समझने में थोड़ी देर लगी । उनको लगा कि हाथ में आई बाजी बापू मुफ्त में खो रहे हैं । लेकिन बापू के मन में राजकोट के मामले का तुरंत निपटारा करने की अपेक्षा अपने अहिंसा के प्रयोग को विशुद्ध रखने का मह्त्व अधिक था । इसीलिए वे ग्वायर-फैसले के बाहरी दबाव को सत्याग्रह के बीच में लाना पसन्द नहीं करते थे । बापू के लिए वह साधन-शुद्धि का प्रश्न था । सिद्धि साधक के हाथ की चीज नहीं होती,वह परमेश्वर के हाथ में होती है , लेकिन साधन तो साधक के हाथ की चीज है । इसलिए साधक को उसीका आग्रह रखना चाहिए । साधन के आग्रह के खातिर हाथ में आये हुए साध्य को छोड़ देने का यह एक अनोखा उदाहरण था । देश के कई राजनीतिज्ञों को बापू के इस कदम में राजनीतिक बुद्धिमत्ता की कमी दिखाई दी । बापू के इस कदम के कारण राजकोट के आन्दोलन को तुरंत सफलता प्राप्त नहीं हो सकी, यह कबूल करना होगा । लेकिन बापू के इस निर्णय के कारण रियासतों के आन्दोलनों में एक नया आयाम दाखिल हुआ ।देश के कोने-कोने में पहिले देशी राज्यों की जागृत हो रही प्रजा के नताओं के ध्यान में एक बात आ गयी कि उन्हें यदि बापू के नेतृत्व को स्वीकारना हो तो अपने आन्दोलनों को सुवर्ण के समान शुद्ध ही रखना पड़ेगा ।राजकोट की लड़ाइ तो आखिर सफल ही होने वाली थी । इतिहास के जिस जोरदार प्रवाह में ब्रिटिश सल्तनत टिक नहीं सकी , वहाँ बेचारे वीरावाला का साहस ही क्या था ? लेकिन बापू के इस कदम के कारण देश के समूचे आन्दोलन को सात्विकता का स्पर्श हुआ । राष्ट्र के चरित्र-निर्माण में बापू की यह अनोखी देन थी ।

[ अगला प्रसंग : मेरे लिए एक स्वामी बस है ! ]

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बापू की गोद में (१४) : मैसूर और राजकोट

    रियासतों में जिम्मेवार शासनतंत्र के लिए जो संग्राम चल रहे थे, वे भारत के स्वराज्य - आन्दोलन के ही अंग थे । लेकिन बापू ने खुद उस आन्दोलन में शरीक न होने और राष्ट्रीय महासभा को भी उससे अलग रखने की नीति दीर्घकाल तक अपनायी थी । इसी नीति में से दो अच्छे परिणाम निकले। एक यह कि कांग्रेस को एकाग्रता से ब्रिटिश-सरकार के साथ लड़ने में अपनी सारी शक्ति लगाने का मौका मिला और दूसरा यह कि अनेक रियासतों में लोगों ने अपनी-अपनी परिस्थिति के अनुसार अलग - अलग प्रकार के आन्दोलन चलाये और स्थानीय नेतृत्व का विकास हुआ । स्वराज्य के बाद सरदार की जादू की छड़ी से सैंकड़ों रियासतें भारत के साथ आसानी से विलीन हो गयीं । इस घटना के अनेक कारणों में से एक कारण यह भी था कि करीब सभी प्रमुख रियासतों में जन-आन्दोलन हो चुके थे और वहाँ के नेताओं के साथ सरदार का प्रत्यक्ष या परोक्ष सम्बन्ध रहा था ।

    रियासतों के इन आन्दोलनों से बिलकुल अलिप्त रहना बापू के लिए संभव नहीं था। वैसे अलिप्त रहने की उन्होंने प्रतिज्ञा भी नहीं ली थी । कई र्यासतों के नेता सलाह और नैतिक मार्गदर्शन के लिए बापू के पास आते थे। संकट के समय उनका सहारा भी तो बापू ही थे ।

    मैसूर राज्य में जिम्मेवार शासन-तंत्र के आन्दोलन के समय जब प्रजा पर सरकार की ओर से अत्याचार किये गये, तब वहाँ के नेता बापू के पास दौड़कर आय्र । मैसूर रियासत भारत की सब रियासतों में आगे थी। वहाँ मिर्जा इस्माइल जैसे कुशल दीवान थे । वे इन अत्याचार की कहानियों को क्यों कबूल करते ? उन्होंने बापू से कहा कि ‘ आप खुद ही आकर परिस्थिति की जाँच कीजिए।’ बापू ने जाँच के लिए काका को भेजा।उनके टाइपिस्ट के तौर पर मैं उनके साथ गया ।

    बँगलोर स्टेशन पर दो-तीन मोटर गाड़ियाँ हमें लेने के लिए आयी थीं। एक गाड़ी में के.सी. रेड्डी , एच.सी. दासप्पा,भाष्यम,ऐय्यंगार आदि वहाँ के नेता थे। दूसरी गाड़ी सरकार की ओर से आयी थी। दीवान के प्रतिनिधि ने कहा कि ‘ आप लोग राज्य के अतिथि हैं,इसलिए आपके ठहरने की व्यवस्था राज्य के अतिथिगृह में की गयी है।’

    भारत के सबसे प्रथम श्रेणी के इस राज्य के अतिथिगृह मे सुख-सुविधाओं की क्या कमी! फिर बँगलोर एक अत्यन्त रमणीय नगरी थी। हमारे कमरे फूलदानियों से सुशोभित किये हुए थे। खाने-पीने में भी कोई कसर नहीं थी।यह सब देखकर सौन्दर्योपासक काका बड़े खुश हो रहे थे।पहले दिन ही दीवन के साथ लम्बी बातचीत हुई।मिर्जा साहब की बातों का काका के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा,ऐसा मुझे लगा।दो[पहर की कॊफ़ी पीते-पीते काका मैसूर राज्य की प्रगति का गुणगान मेरे पास करने लगे। सब सुन लेने के बाद मैंने गम्भीर मुखाकृति से कहा,’काका आपकी हालत भी वुड्रो विल्सन जैसी होगी,ऐसा लग रहा है।’ (जारी)

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भणसाळीकाका (२)

   तीसरा दृश्य मगनवाड़ी का । बारह वर्षों का मौन चल रहा था । लेकिन बापू ने बहस करके भगवान का नामोच्चारण करने की छूट उनसे मंजूर करायी । उनकी दोनों बगलों में काख - बिलाई के फोड़े एक के बाद एक हो रहे थे । देखनेवाला सहम जाता था । लेकिन भणसाळीकाका का चरखा चालू ही रहता था । तार खींचते समय काख से खून या पीप की पिचकारी छूटती थी । पिचकारी देखकर वे खिलखिलाकर हँसने लगते । हँसने से दुबारा खून की पिचकारी छूटती । एक बार इलाज के लिए बापू ने उनको सरकारी अस्पताल में भेजा । काख में से पीप निकालने के लिए सिविल सर्जन ने एक सलाइ खोंस दी । भणसाळीकाका ने उस समय भी जोर का ठहाका लगाया । सिविलसर्जन काका से कहने लगे , ‘ ऐसा मरीज जिन्दगी में मैंने नहीं देखा , और किसीने देखा हो तो मैं नहीं जानता ।’

    बापू और भणसाळीकाका के बीच चर्चा चलती । बापू बोलते जाते थे और भणसाळीकाका लिखते जाते थे । कुछ दिन बाद चर्चा के समय मौन छोड़ने का कबूल करवाया । कुछ दिनों के बाद हम लोगों के पढ़ानेभर के लिए मौन छोड़ने की बात भी कबूल करवायी ।

    मगनवाड़ी में कभी-कभी आधी रात में या भरी दोपहरी में भणसाळीकाका जोर से चिल्लाते , ‘ प्रभु,प्रभु,प्रभु,नारायण,नारायण । ‘ बादलों की गड़गड़ाहट के समान उनकी ध्वनि गम्भीर लगती थी । इन शब्दों के उच्चारण के समय उनको रोमांचित तथा गदगद होते हुए हमने देखा है ।मेरे काका मानते थे कि भणसाळीकाका को भगवत्दर्शन हुए हैं । भणसाळीकाका ने इससे इनकार नहीं किया था ।

    चौथा दृश्य सेवाग्राम । भणसाळीकाका मुझे पढ़ाने बैठे हैं । चरखा चल रहा है । बगल में गाजर से भरी टोकरी रखी है । दिनभर में गाजर से भरी पूरी टोकरी खा जाते हैं । कभी-कभी शिष्य को भी गुरु का प्रसाद मिल जाता है । गाजर के बदले कभी अमरूद होते हैं या दोनों न हों तो सेपरेट किये हुए दूध की एक बाल्टी भरी रहती है ।खाने की चीज कुछ भी हो भणसाळीकाका के भोजन की मात्रा में इससे कोई खास फरक नहीं पड़ता था । बीच में कुछ दिन खजूर चला । लेकिन खजूर खाने से भूत दिखाइ देते हैं , ऐसी उनकी शिकायत थी। इसलिए खजूर बन्द कर दिया ।फिर लहसुन शुरु हुआ । लहसुन की एक-दो कलियाँ नहीं,बल्कि अच्छी-खासी दो-तीन सौ कलियाँ रखी रहती थीं और मुट्ठीभर एक साथ मुँह में डालकर खाते । इस प्रयोग से ऐसे बीमार पड़े कि मरते-मरते बचे । उन दिनों सरदार सेवाग्राम आये हुए थे । पूछा,’क्यों भणसाळी,क्या जाने की तैयारी कर रहे थे ?’ जवाब मिला, ‘उसकी कला अकल है ।’ सरदार ने हँसकर कहा ,’कभी उसके (भगवान के) साथ बातचीत करने का मौका आ जाय , तो हमारा राम-राम पहुँचा देना । ‘

    इस दृश्य की अब दूसरी बाजू । एक टाँके में छाती तक के पानी में भणसाळीकाका बैठे हैं। सिर पर तीस सेर वजन का पत्थर रखा हुआ है ।

    ‘ यह कौन-सा प्रयोग है ?’

    ‘कुछ नहीं। ध्यान की दृष्टि से ठंडक की आवश्यकता महसूस हुई।सोचा था कि पाँव में रस्सी बाँधकर कुएँ में उलटे सिर लटका जाय । चिमनलालजी ( आश्रम-व्यवस्थापक ) ने कहा कि बापू की इजाजत लो । बापू को चिट्ठी लिखी।उन्होंने इजाजत नहीं दी।मैंने फिर से लिखा कि कम-से-कम टाँके में बैठने की तो छूट दे दो।वह उन्होंने दी ।’

    ‘ लेकिन यह सिर पर पत्थर किसलिए ?’

    ‘पहले दिन टाँके में बैठा था तो जानवर पानी पीने आये।उनकी सींग शरीर में लगने के भय से कहीं गलती से शरीर उछल न जाय , इसलिए सिर पर वजन रखा है।’

    एबटाबाद से आने पर बापू ने उनका यह प्रयोग तुरंत बन्द करवा दिया । मन में चाहे जितनी जिद हो,फिर भी बापू ने मना कर दिया तो भणसाळीकाका उनके साथ बहस नहीं करते थे ।

    एक बार आश्रम में हममें से कइयों को पागल लोमड़ी ने काट लिया । भणसाळीकाका को उसने तीन बार काटा । लेकिन उन्होंने किसीसे से जिक्र नहीं किया। वह तो तब पता चला, जब उनके हाथों पर घाव दिखाई दिये ।सूई लगाने से इनकार करते थे । लेकिन बापू की आज्ञा हुई तो मान गये।फिर वर्धा तक मोटर में जाने से इनकार करने लगे।फिर से बापू की आज्ञा हुई तो चुपचाप चले गये।

    लेकिन बापू के साथ भी एक बार उनका मतभेद होने की घटना मैंने देखी है । आश्रम की किसी बहन की एक छोटी-सी भूल के कारण बापू ने उसे आश्रम छोड़कर जाने को कहा था । वह बहन विधवा थी। उसने भणसाळीकाका को बताया । भणसाळीकाका को लगा कि इसमें बापू के हाथ से अन्याय हो रहा है ।उन्होंने बापू से कहा , ‘तो मैं भी आश्रम छोड़कर चला।’ अन्त में बापू मान गये ।

    समाज के दुर्बल और पीड़ित वर्ग के प्रति भणसाळीकाका का हृदय बहुत संवेदनशील था । गरीबों के साथ अन्याय होता देखकर कई बार वे क्षुब्ध हो जाते थे । स्वराज्य के बाद तेलंगाना में कम्युनिस्ट लोगों ने आतंक फैलाया था। उसके कारण सरकार ने बड़े पैमाने पर कम्युनिस्टों की धरपकड़ की थी । उस समय भणसाळीकाका ने सरकार को पत्र लिखा कि ‘मुझे भी पकड़ लो। मैं अहिंसा में विश्वास रखनेवाला एक साम्यवादी हूँ ।

    आष्टी-चिमूर में स्त्रियों पर पुलिस ने अत्याचार किया था। उसकी करुण कहानी सुनकर भणसाळीकाका का पुण्यप्रकोप हुआ और उसके विरोध में उन्होंने अनशन किया ।भारत के इतिहास में इस अनशन की एक अमर कहानी बन गई है । इस अनशन के दरमियान भणसाळीकाका ने शुरु के पन्द्रह दिन पदयात्रा की थी और पानी पीना भी छोड़ दिया था।आखिर के ४८ दिन वे बिस्तर पे थे । अनशन का एक-एक दिन बढ़ रहा था ।सन १९४२ के ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन में सरकार ने जनता को बेरहमी से कुचलकर मूर्छित-सा कर दिया था,लेकिन इस अनशन ने उस जनता में एक चेतना पैदा की ।रेल की पटरी उखाड़ने,तार काटने,डाक के डिब्बे जलाने के कार्यक्रमों का जवाब सरकार के पास था। लेकिन एक विशुद्ध नैतिक प्रश्न को लेकर एक सन्त ने अनशन का जो अमोघ अस्त्र उठाया था,उसका जवाब निष्ठुर सरकार के पास कुछ भी नहीं था । अन्त में सरकार ने इस अत्याचार की जाँच करना स्वीकार किया । इस तरह भारत के नारीत्व की मर्यादा का रक्षण हुआ ।

    आज भणसाळीकाका का शरीर गलितगात्र हो गया है । लेकिन वे नागपुर के नजदीक टाकली गाँव में रहकर ग्रामसेवा का अखण्ड व्रत का पालन कर रहे हैं। सेवाग्राम - आश्रम को यदि प्राणि-संग्रह कहा जाय तो भणसाळीकाका उसमें अनिर्बन्ध संचार करनेवाले सिंह-जैसे थे।.

बापू की गोद में (१३) : भणसाळीकाका

  एक बार काका ने सेवाग्राम - आश्रम का वर्णन ‘ गांधीजी का प्राणि - संग्रहालय’ ( गांधीजीज मिनाझरी)   इस शब्दों में किया था। बापू के आसपास हमेशा अजीब तरह के लोग जमा हो जाते थे । कभी - कभी सरदार कुछ पर चिढ़ भी जाते थे । काका हँसकर कहते थे , ‘ बापू तो डॊक्टर हैं,डॊक्टर के आसपास मरीज तो रहेंगे ही न ? ‘

    सारे आश्रमवासियों की सभी विचित्रताओं का वर्णन करने का मेरा इरादा नहीं है , और उतना सामर्थ्य भी नही है । साबरमती-आश्रम में एक सज्जन तो ऐसे थे कि गिनकर ५५ रोटियाँ खा जाते । भूल से ५४ रखी गयी हों तो जोर से चिल्लाकर कहते , ‘ तुम कैसे कंजूस हो ! हमें भूखा मारना है ?’ और गलती से ५६ रोटियाँ परोसी जाँय तो तपाक से कहते , ‘ वाह तुमने क्या हमको राक्षस समझ रखा है ?’ इस तरह इनकी हालत भूखे मरनेवाले आदमी और राक्षस के बीच की पतली दीवार जैसी थी ।

    दूसरे एक सज्जन सेवाग्राम-आश्रम में ऐसे थे , जिनके साथ मेरा निम्न संवाद हुआ -

    ‘ क्योंजी , आजकल क्या प्रयोग चल रहा है ? ‘

    ‘ प्रयोग तो हमारा कुछ-न-कुछ चलता ही रहता है । आजकल पानी का प्रयोग चल रहा है ।’

    ‘ क्या पानी उबालकर पीते हैं ‘ या जल-चिकित्सा चल रही है ? ‘

    ‘ नहीं भैया , खाने-पीने के प्रयोग के सम्बन्ध में चर्चा नहीं कर रहा । इस बार तो शौच के पानी का प्रयोग है । ‘

    ‘ यानी ? ‘

    ‘ यानी शौच के लिए जो पानी व्यवहार करते हैं , वह कैसे कम हो इसका प्रयोग कर रहा हूँ । ‘

    ‘ अच्छा ! ‘

    ‘ हाँ , घटाते - घटाते पाँच तोले तक पहुँचा हूँ । अपने देश के अनेक भागों में पानी की बड़ी कमी रहती है । इसमें अगर हम पानी बचा सकें तो …’

    मैंने अपनी बालसुलभ उद्दंडता का लाभ लेकर उस भाई की बात बीच में ही काटकर कहा , ‘ हाँ , बैलों को तो पानी की जरूरत ही नहीं पड़ती । ‘

    सेवाग्राम के आश्रमवासियों की ऐसी सारी विचित्रताओं के बावजूद एक बात उन सबमें समान थी, बापू के प्रति भक्ति । इसी एक तत्त्व के कारण वे आश्रम में टिक सके । इसी तत्त्व के परिणामस्वरूप सब आश्रमवासियों में एक परिवार-भावना का उदय हुआ और वह भावना वृद्धिंगत होती गयी । आज भी एक-दूसरे से बहुत दूर गए हुए दो आश्रमवासी दीर्घ अवधि के बाद जब भी मिलते हैं , तब अलग पड़े हुए स्वजन बहुत दिनों के बाद मिलने पर जिस आत्मीयता का और प्रेम का अनुभव करते हैं , वैसा ही अनुभव ये आश्रमवासी करते हैं ।

    विचित्रताओं के साथ - साथ हरएक आश्रमवासी की विशेषता भी कम नहीं थीं । इनमें से कुछ लोगों के साथ रहने का मौका मिलना एक अपूर्व सौभाग्य ही था । ये आश्रमवासी स्वतन्त्रता की लड़ाई में बापू की वानर-सेना के सिपाही थे और शिवजी की बारात जैसे थे ।

    यहाँ एक ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध में लिखूँगा , जो विचित्रता के साथ - साथ विशेषताओं से भी परिपूर्ण थे । वैसे वे खुद छिपकर रहनेवालों में से थे लेकिन इतिहास में कम-से-कम एक बार तो उन्होंने ब्रिटिश सरकार को हिला दिया था । वे व्यक्ति हैं आचार्य भणसाळी । हम सबके लाड़ले भण्साळीकाका ।

     एक दृश्य । किला सोनगढ़ गाँव का एक सुनसान मकान । उसमें आधा पागल और आधा साधु जैसा दीखनेवाला एक आदमी पड़ा था । एक समाजसेवक वहाँ पहुँचा ।

    ‘ ओहो ! भणसाळीभाई ! आपकी यह हालत ? ‘ जवाब में भणसाळीकाका ने सप्त स्वर में अट्टहास किया । लेकिन मुँह से एक शब्द भी नहीं बोले । समाज-सेवक ने उनके दोनों पाँवों के तलवों से बीस-बीस,पचीस -पचीस काँटे निकाले । उनके जख्मों को धोकर ,पीप निकालकर साफ कर दिया । ‘ यहाँ कुछ दिन आराम करो । ‘ समाज-सेवक ने विनती की । लेकिन साधु तो चलता ही भला । फिर पाँवों में से काँटे भी तो निकल चुके थे ।

    ‘ लेकिन आप बोलते क्यों नहीं ? ‘ कागज - पेन्सिल लेकर भणसाळीकाका ने लिख दिया , ‘ बारह साल का मौन लिया है । ‘

    ‘ बारह साल ! ‘

    भणसाळीकाका के पास छोटा आँकड़ा कभी था ही नहीं । प्रथम बार अनशन किया ४० दिनों का । दूसरी बार किया ५५ दिनों का और तीसरी बार किया आष्टी-चिमूर के अत्याचारों के निषेध में ६३ दिनों का देशविख्यात उपवास ।

    थोर की बाड पर से कूदने के प्रयोग के कारण उनके शरीर में फोड़े हो गये थे । भणसाळीकाका साबरमती-आश्रम से वर्धा के लिए निकले थे । ५५ दिनों के  अनशन  में मानसिक अस्थिरता आ गयी । फिर हिमालय तक पैदल सफर और और बारह वर्ष का मौन । देश की सही परिस्थिति का दर्शन उनको इस यात्रा में हुआ ।

    हिमालय से वापस आते समय राजस्थान के एक देहात में बैल जहाँ बाँधते हैं , ऐसे बाड़े में उनको ठहरने कि जगह मिली । रात में जानवर का पाँव लगा । भणसाळीकाका के मुँह से अचानक शब्द निकला ‘ कौन ? ‘ तुरंत उनके ध्यान में आ गया कि मौन टूटा। 

 फिर सोचने लगे कि कई ऐसी तरकीब करनी चाहिए कि रात में नींद में भी मौन न टूटे । तरकीब तो सूझी, लेकिन उसको अमल में लाने वाला तरीका  उनको मिला ध्रांगध्रा में । एक सुनार ने ताँबे का तार गरम करके लाल किया और भणसाळी्काका के दोनों होठों को सिल कर तार मोड़ दिया । भणसाळीकाका ने उस सुनार के उपकार माने। इसी सुनार ने प्रवाही पदार्थ मुँह में डालने के लिए एक फनेल भी बना दी । उन दिनों वे कच्चा आटा और कड़वे नीम के पत्ते खाते थे । आटा पानी में घोलकर चूस लेते थे । नीम की पत्तों को मुँह के कोने से अन्दर घुसा देते थे । साबरमती में आश्रम में बापू के साथ भेंट हुई , तब होठों के तार कटवा दिये । यह दूसरा दृश्य । ( अगली प्रविष्टी में जारी ) 

मोहन और महादेव : बापू की गोद में (१२)

    बापू के पास आने के बाद इक्कीस वर्षों में काका ने दो बार छुट्टी ली थी । पहली बार टाइफाइड हो जाने पर और दूसरी बार ब्लडप्रेशर ( रक्तचाप ) बढ़ जाने पर । काका के पिताजी का देहान्त हुआ , तब भी काका का काम जारी ही था । इक्कीस साल के बाद की बीमारी में बाकायदा छुट्टी लेकर काका आराम करने शिमला गए । इसके बाद की तीसरी बीमारी में तो वे सदा के लिए छुट्टी मनाने चले गए । इन दो अपवादों को छोड़ कर पचीस वर्षों में काका ने एक भी रविवार , दीवाली , होली या गरमी की छुट्टी नहीं ली थी ।

    सन १९३८ में जब मगनवाड़ी में रहते थे , तब काका का रक्तचाप बढ़ गया था । बीच - बीच में चक्कर आने लगे थे । इसका प्रमुख कारण था वर्धा की कड़ी गरमी । धूप में काका रोज वर्धा से सेवाग्राम पैदल आते - जाते थे ।कभी - कभी तो दो बार आना - जाना हो जाता था । २२ मील की पैदल यात्रा हो जाती थी ! वर्धा में गरमी के मौसम में ११५ से १२० डिग्री (फ़ैरन्हाइट) तक तापमान हो जाता है ।

    इतने परिश्रम के बाद बापू के काम का बोझा तो काका ही ढो सकते थे । पिचले दस - पन्द्रह वर्षों में मैंने काका को हर रोज पन्द्रह घण्टे से कम काम करते नहीं देखा था । जब हम मगनवाड़ी से सेवाग्राम रहने गये , तब वर्धा से सेवाग्राम जाने - आने का श्रम बच गया । लेकिन उतने घण्टों का काम बढ़ गया । दिनभर करके रात को सोने से पहले कोई-न-कोई पुस्तक पढ़ने की काका की आदत थी । वाचन के सम्बन्ध में वे हमेशा अद्यतन रहते थे । एक वालजीभाई देसाई और दूसरे प्यारेलालजी को छोड़कर बापू के आश्रम में काका से अधिक पढ़नेवाला कोई नहीं था ।

    काका को आम तौर पर जो काम करने पड़ते थे , उनमें मुख्य रूप से रोज की डाक देखकर बहुत सारे पत्रों का जवाब लिखना , बापू  से मिलने आनेवालों के साथ पहले बात करके बापू का समय बचाना , मुलाकातों की रिपोर्ट लिखना , ‘हरिजन’ साप्ताहिक के लिए लेख लिखना या अनुवाद करना , ये काम थे । हर रोज के इन कामों के अलावा कभी कोई पुस्तक लिखना , दैनिक समाचार - पत्रों के लिए बीच - बीच में लेख लिख कर देना , या सभाओं में भाषण के लिए जाना इत्यादि अतिरिक्त काम माने जायेंगे ।

    बापू के साथ काम का प्रमाण भी असाधारण था । इतने सारे काम काका कैसे कर पाते थे , यह एक बड़े आश्चर्य का विषय था। मुझे लगता है कि बापू और काका के बीच जो असाधारन एकात्मता सध गयी थी , उसी कारण यह बन पाता था । इस सम्बन्ध में दास्यभक्ति और सख्यभक्ति के लक्षणों का अजीब मेल था । सन १९१५ में पहली बार काका बापू से मिलने अहमदाबाद के पास के कोचरब - आश्रम में गये , तब काका की लिखी हुई सामग्री को देखकर बापू ने कहा , ‘तुम्हारा स्थान तो मेरे ही पास है।’ उस दिन एलिस ब्रिज पर से वापस आते समय काका ने स्व. नरहरिभाई परीख से कहा , ‘सारी जिन्दगी किसीके चरणों के पास बैठकर बिताना चाहूँ तो इस पुरुष के पास बिताऊँ ऐसा लगता है।’ प्रथम दृष्टिभेट में जो तारा-मैत्रक का नाता बँध गया , उसका धीरे - धीरे परिपाक एकात्मता में हो गया ।

     काका का व्यक्तिमत्व बापू से एकदम अलग और स्वतंत्र था । बापू का विभूतिमत्व प्रखर सूर्य जैसा था , तो काका का चन्द्रमा के जैसा शीतल था । बापू अनास्क्त कर्मयोगी थे तो काका रसिक भक्त , बापू हिमालय की तरह ऊँचे और उज्जवल थे तो काका गंगा के समान करुणा से भरे थे । इतना भिन्न व्यक्तिमत्व होते हुए भी दोनों में अजीब आत्मिक अभिन्नता थी ।

    कुछ उदाहरण लीजिए । साहित्य की दृष्टि से देखा जाए तो बापू यथार्थवादी थे , शब्दलाघव में सम्राट थे । एक शब्द से काम चलता हो तो दो शब्दों का उपयोग न करनेवाले । काका थे स्वैर विहार करने वाले । समुचित अलंकारयुक्त रसमय शैली से लिखनेवाले । फिर भी लेखों में बापू की शैली को काका ने ठीक आत्मसात किया था । ‘हरिजन’ या ‘हरिजन बंधु’ के कई पाठकों के पत्र आते थे कि लेख के अन्त में एम. के. जी. (मो. क. गां. ) या एम. डी. (म.दे.) अक्षर पढ़ने तक पता ही नहीं चलता था कि लेख बापू का है या महादेवभाई का । ‘हरिजन’ पत्र में जो भी काका लिखते , वह बापू को बताये बिना प्रेस में नहीं भेजते थे । बापू भी उन लेखों को बारीकी से पढ़ते और आवश्यक सुधार भी करते थे । लेकिन कई बार ऐसा होता कि काका लिखा हुआ लेख बापू के देखने के लिए रखा हो , उसे पढ़ कर बापू अपना हस्ताक्षर कर देते और वह लेख बापू का बन जाता ।

सन १९४२ के आन्दोलन के पूर्व इस प्रकार के एक लेख ‘एन अपील टु एव्री ब्रिटन’ (An appeal to every Briton ) था और शायद ‘ एन अपील टु एवरी जापानीज़ ‘ ( An appeal to every Japanese ) भी ऐसा ही लेख था ।

    बापू के साथ चर्चा में अधिक समय नष्ट न हो , इस दृष्टि से राजाजी , भूलाभाई और कभी- कभी जवाहरलालजी भी काका के साथ चर्चा करके बहुत सारा काम निपटा लेते थे ।उन दिनों सरदार का ट्रंक काल न आया हो , ऐसा शायद ही कोई दिन जाता था। ‘क्यों? बुड्ढा क्या कहता है ? इस वाक्य से बात शुरु होती थी और पूरे छह मिनट तक चलती थी ।

    काका शीघ्र-लिपि नहीं जानते थे,लेकिन उनकी लिखने की गति असामान्य थी । कई शब्द वे संक्षेप में लिखते थे , लेकिन बापू के मुँह से निकला एक भी शब्द भी वे छोड़ते नहीं थे ।एक बार बापू से चर्चा करने के लिए कुछ अमरीकी मित्र आये थे । काका अपने ढंग से उस चर्चा का नोट ले रहे थे । अमरीकी मित्रों में से एक बहन शीघ्रलिपि में लिख रही थी। दूसरे दिन काका और वह बहन अपनी - अपनी रिपोर्ट एक-दूसरे सेमिलान करने लगे । काका का नोट देखकर वह बहन बोली,’आपने तो मुझे बिलकुल हरा दिया - ‘ Yousimply beat me hollow !’

    बापू के भाषणों की रिपोर्ट लिखते समय काका को सिर्फ बापू जो बोलते थे , उतना ही नहीं लिखना होता था । बापू का भाषण अक्सर सिलसिलेवार या व्यवस्थित नहीं रहता था। उनके भाषण में सहजता होती थी , लेकिन क्रमबद्धता नहीं होती थी । काका भाषण की रिपोर्ट लिखते समय उसको ठीक कर लिया करते थे । फैजपुर-कांग्रेस के समय बापू के हिन्दी भाषण को काका ने सीधे प्रेस-टेलिग्राम फार्म पर अंग्रेजी में ही लिख लिया,ताकि भाषण समाप्त होते ही उसे प्रेस के लिए रिलीज किया जा सके।कभी-कभी तो बापू के निकट के साथी भी बापू ने भाषण में क्या कहा , यह स्पष्ट रूप से नहीं बता सकते थे । ‘ महादेवभाई की रिपोर्ट आयेगी,तब पढ़ लेंगे ।’ऐसा कहकर सन्तोष मान लेते थे ।

    इस तादात्म्य की कल्पना सबको नहीं आ सकती थी। एक बार एक पंजाबी भई बापू से मिलना चाहते थे । उनके साथ बात करके काका ने उस भाई से कहा कि ‘अब आपको बापू से मिलने की आवश्यकता नहीं है ।’ लेकिन उस भाई को सन्तोष नहीं हुआ।दुबारा काका से चर्चा करके वह वापस चला गया ।लेकिन जाते-जाते आश्रमवालों को सुनाकर गया कि ‘ मैं महादेवभाई को जरूर गोली से मार दूँगा ।’ यह सुनकर मेरी माँ घबड़ा गयी , लेकिन काका ठहाका मार कर हँसने लगे ।

    एक बार बापू और काका की एकात्मता का एक अजीब प्रसंग देखा।बापू अपनी कुटी के सामने खड़े थे। काका के साथ कुछ बात हो रही थी। इतने में उनको कुछ लिखने की याद आयी । काका से कहा,’महादेव,लिखो।’ काका ने वहीं खड़े-खड़े लिखना शुरु किया। बापू बोलते गए और काका लिखते गए। मैं बगल में खड़ा देख रहा था । कुछ देर बाद् बापू के बोलने की गति से काका की लिखने की गति तेज हो गयी,यानी आगे बापू क्या बोलेंगे,इसका अनुमान लगाकर काका ने उसे पहले ही लिख दिया । बीच में बापू ने एक ऐसा शब्द कहा, जो काका ने लिखा नहीं था,तो काका ने बापू को रोककर कहा,’बापू,जरा ठहरिए। मैंने इस जगह पर दूसरा ही शब्द लिखा ह्दिया था,आपने इस शब्द का प्रयोग क्यों किया?’ बापू एक क्षण के लिए विचार में पड़े।लेकिन वे भी शब्दों के बारे में बड़े आग्रही थे।’महादेव,तुमने यह शब्द लिखा ही कैसे?मेरे मुँह से तो वही शब्द निकला,जो मैंने तुमको लिखाया ।’

    पत्र लिखाने में जितना समय गया,उससे कहीं अधिक समय उस चर्चा में गया कि बापू की भाषा में कौनसा शब्द ठीक बैठता है। जहाँ तक मुझे स्मरण है,शब्द बापू का ही रखा गया। लेकिन महादेव के लिखे शब्द में भी सार है,यह बापू के स्वीकार करने के बाद ही ।

 

   

वह अपूर्व अवसर (२)