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श्री नारायण देसाई कि ‘संत सेवतां सुकृत वाधे’ मूल गुजराती में पढ़ी । एक अनूठी कलाकृति है । उसमें आत्मकथा की सजीवता और प्रतीति है , फिर भी अहन्ता का दर्प नहीं है । जिन घटनाओं और परिस्थियों का वर्णन इस छोटी-सी पुस्तक में है , उनके साथ लेखक का घनिष्ठ और प्रत्यक्ष सम्बन्ध रहा है । वह केवल एक तटस्थ प्रेक्षक नहीं रहा है । कई प्रसंगों में उसकी अपनी भूमिका भी महत्वपूर्ण है । परन्तु अन्य व्यक्तियों की भूमिका का चित्रण करने में उसने अपने को गौण स्थान ही दिया है । लेखक की सदभिरुचि का यह द्योतक है ।
‘मोहन और महादेव’ इस सुन्दर पुस्तक की दो विभूतियाँ हैं । ‘हरि-हर’ की तरह उनका विभूतिमत्त्व अविभाज्य है । अनेक घटनाओं और प्रसंगों के चित्रण में नारायणभाई ने उस विभूतिमत्त्व की जो झाँकियाँ दिखाई हैं , वे नितान्त मनोज्ञ हैं । ‘साबरमती’ और ‘सेवाग्राम’ आधुनिक भारत के विश्व-तीर्थ माने जाते हैं। वहाँ के आन्तरिक जीवन के जो दर्शन इस पुस्तक में कराये गये हैं , वे हृदयस्पर्शी हैं । नारायणभाई की भाषा में एक अन्लंकृत लावण्य है ।
पृष्ठ २३ पर लेखक के मानस पर जो छाप पड़ी , उसकी उपमा उसने कृष्णपक्ष के नभोमण्डल से दी है । पुस्तक में करुण , उदात्त आदि रसों के साथ-साथ ऋजु और सौजन्ययुक्त विनोद की छटाएँ भी हैं , जो उसे अधिक चित्ताकर्षक बनाती हैं
लेखक की सहृदयता की छाप तो पृष्ट-पृष्ट पर है ।
इस पुस्तक का हिन्दी-भाषान्तर हमारे मित्र श्री दत्तोबा दास्ताने ने किया है । दत्तोबा का ‘उपनयन’ पवनार के सन्त ने किया है । उनके जीवन में जो संस्कारिता और प्रगल्भता है , वह विनोबा के साथ दीर्घ-सहवास का परिपाक है। नारायणभाई को भाषान्तरकार भी समानशील मिले । पाठक की दृष्टि से यह बड़ा शुभ संयोग है। गांधी की विभूति की विविधता की झाँकी जो देखना चाहते हों , उनके लिए यह पुस्तक निस्सन्देह उपादेय है ।
शिवकुटी , माउण्टआबू
२० - १ - ‘६९ - दादा धर्माधिकारी
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वर्षों पूर्व ‘जन्मभूमि’ गुजराती - पत्र में प्रतिसप्ताह ‘स्वातंत्र्य संग्रामनी गाथा’ स्तम्भ में श्री नारायणभाई ने बापू के सम्बन्ध में धारावाहिक रूप में संस्मरण लिखे थे , जो बाद में ‘संत सेवतां सुकृत वाधे’ शीर्षक से पुस्तकाकार में प्रकाशित हो गये । सौभाग्य से आज वे हिन्दी में रूपान्तरित होकर पाठकों के समक्ष उपस्थित हैं । २२ प्रकरणों की यह छोटी-सी पोथी गांधीजी के अनेक अनजाने अलौकिक गुणों पर प्रकाश डालती है । प्रस्तुत संस्मरणों की विशेषता श्री दादा धर्माधिकारी ने प्राक्कथन में लिपिबद्ध कर दी है । संस्मरण तो अनूठे हैं ही , लेखक की साहित्यिक प्रतिभा ने उन्हें रसाप्लुत भी बना दिया है ।
गांधी - शताब्दी के शुभ -अवसर पर हमें इस पुस्तक के प्रकाशन का सुअवसर मिला था । अब हम इस पुस्तक का दूसरा संस्करण प्र्काशित कर यह आशा करते हैं कि पाठकों को प्रथम संस्करण की भाँति निश्चय ही यह रोचक और उद्बोधक सिद्ध होगा। गुजराती-भाषी जनता ने जिस प्रकार इस श्रेष्ठ रचना का आदर किया है , हम समझते हैं कि कि हिन्दी-भाषी जनता भी इसमें पीछे नहीं रहेगी । गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता का हिन्दी-रूपान्तर करने में श्री भवानीप्रसाद मिश्र ने सहयोग दिया, अत: हम उनके आभारी हैं ।
- सर्व सेवा संघ प्रकाशन , राजघाट , वाराणसी-२२१००१.
(जून १९९६)
आगा खाँ महल में जाने के बाद छह दिनों के अन्दर काका का स्वर्गवास हो गया । उनकी मृत्यु के बारे में सरकार की ओर से हम लोगों को कोई समाचार नहीं दिये गये थे । हम सेवाग्राम में हैं , यह जानकारी सरकार को थी , फिर भी रेडियो पर खबर सुनकर मित्रों ने दूसरे दिन यानी १६ तारीख को खबर दी , तब हमें जानकारी मिली । जेल में काका अचानक गुजर गये , इसके कारण देश में उनकी मृत्यु के सम्बन्ध में तरह - तरह की अफवाहें फैलीं। किसीने कहा , सरकार ने उनको विष दे दिया । किसीने कहा बिजली के शॊक दिये । हम जानते थे कि काका को हृदय - विकार था । और हम यह भी जानते थे कि बापू के उपवास को लेकर काका के मन पर चिन्ता का बड़ा भारी बोझ था । इसलिए अफवाहों पर हमारा विश्वास नहीं था । मुझे और माँ को जीवन में एकमात्र काका का ही आधार था । हम दोनों की जो हानि हुई , वह किसी तरह भरनेवाली नहीं थी ।दोनों ने उनकी विरह - व्यथा दीर्घकाल तक सहन की थी । फिर भी हम दोनों में से किसीके मन में अंग्रेज सरकार के प्रति एक क्षण के लिए भी कड़वाहट की भावना उठी हो , ऐसा याद नहीं आता । मैं तो काका की मृत्यु जेल में हुई इस घटना के कारण मन में गर्व का अनुभव करता था । अंग्रेज सरकार के साथ की लड़ाई का ही यह एक अंग (पार्ट ओ दि गेम) मैंने माना । अहिंसक लड़ाई की यह खूबी थी ।
काका की चिता जल रही थी तब बापू ने हमारे नाम एक तार भिजवाया था । उस तार की मूल प्रति तीन सप्ताह के बाद सेवाग्राम में पहुँचायी गयी । तार में लिखा था , ‘ महादेव को एक योगी और देशभक्त की मृत्यु प्राप्त हुई है - Mahadev died yogi’s patriot’s death । इस मजमून के कारण शायद तार पहुँचाने में देर की गयी होगी । सरकार की ओर से इतना ही कहा गया था कि ‘ हमारे ऒफ़िस की भूल के कारण देर हुई , उसके लिए हमें अफसोस है । ‘ इस स्पष्टीकरण के कारण मेरे मन में चिढ़ जरूर हो गयी थी ।
इस समय बापू के पास जाने की हमने इजाजत माँगी । लेकिन इजाजत नहीं मिली । काका के शव का दाह - संस्कार कहाँ किया गया , इस सम्बन्ध में भी हमें किसी प्रकार की जानकारी नहीं दी गयी । उनकी भस्मी भी हमें नहीं दी गयी ।
लेकिन काका का दाह - संस्कार आगा खाँ महल के आहाते में ही किया गया था , इसकी खबर हमें लग गयी थी । बापू हर रोज उस स्थान पर जाकर फूल चढ़ाकर आते हैं , यह भी जानकारी मिली थी । लेडी प्रेमलीला ठाकरसी की ‘ पर्णकुटी ‘ से दूरबीन द्वारा हर रोज वह दृश्य दिखाई देता था ।
बापू ने जेल में उपवास शुरु किये , उस समय फिर से हमने उनके पास जाने की माँग की। उस समय जवाब मिला कि ‘ आप जाना चाहेंगे तो एक कैदी की तरह वहाँ रहना होगा , बाहर की दुनिया के साथ आपका सारा सम्पर्क बन्द कर दिया जायगा । ‘ हमने यह शर्त मंजूर की और मैं , मेरी माँ , और कनुभाई को आगा खाँ महल में जाने की इजाजत मिली ।
आगा खाँ महल की चहारदीवारी के पास कँटीले तार की ११ फुट ऊँची बाड़ बनायी गयी थी। पूना शहर की तरफ के महल के हिस्से में लकड़ी की जाली लगा दी गयी थी । इसके अलावा महल के चारों ओर बन्दूकधारी संतरी चौबीस घन्टे खड़ा पहरा दे रहे थे ।
बापू का पलंग महल के लम्बे बरामदे में बीचोबीच रखा हुआ था । हमने बापू के चरण छुए , तब मेरी माँ के छह महीनों से रोके हुए आँसुओं का बाँध फूट पड़ा । बापू ने कुछ बोलने की कोशिश की , लेकिन ‘ महादेव . . .’ इस एक शब्द का उच्चारण करते ही उनका गला भर आया । आँख से गंगा - जमना की धारा बहने लगी । उस दिन पहली बार बापू की आँखों में मैंने आँसू देखे । बापू के अनशन का वह सातवाँ दिन था । उनको कष्ट न हो , इस खयाल से मेरी माँ वहाँ से तुरन्त हट गयीं । इसके बाद इक्कीस दिन तक हम लोग आगा खाँ महल में रहे , लेकिन बापू के साथ शायद ही बोले होंगे । काका की रक्षा बापू ने सुरक्षित रखी थी , वह माँ के सिपुर्द की । शुरु में कुछ दिन वह रक्षा बापू अपने भाल-प्रदेश में लगाते थे , यह जानकारी प्यारेलालजी और सुशीलाबहन ने हमें दी ।
प्यारेलालकाका के साथ मेरी हमेशा बात होती रहती थी । मुझे उस समय पता चला कि सन १९४२ की तोड़-फोड़ के लिए बापू का समर्थन नहीं था । लेकिन मैं तो प्रत्यक्ष में भले न हो , लेकिन मन से तोड़-फोड़ के पक्ष में था ।मैंने भी अँधेरी रात में खेतों में धारियावाले लोगों के गिरोह में शामिल होकर डाक-विभाग के डिब्बे जलाने की योजना बनायी थी । गिरोह में से एक व्यक्ति ने मुझसे रिवाल्वर की माँग की , तब मैं सचेत हो गया और उससे कहा कि अहिंसा में रिवाल्वर को स्थान नहीं है । किसी व्यक्ति के जान-माल को नुकसान नहीं पहुँचाना है , इतना ध्यान में रखकर बाकी सब कार्रवाइयाँ अहिंसा में बैठती हैं , ऐसा मैं भी मानता था । टेलीफोन के तार काटे जाने की खबर पाकर मुझे खुशी होती थी । ट्रेन की पटरियाँ उखाड़ी गयीं , यह सुनकर मैं गर्व से फूल उठा था । बिहार और बलिया में तोड़-फोड़ की वृत्ति के कारण थोड़े दिन तक वहाँ का शासन जनता के हाथ में आ गया था , यह सुनकर तो मेरी छाती गजभर फूली थी । मैंने भी नकाबपोश टोलियों के साथ सम्पर्क साधने का प्रयास किया था । बम्बई में कई मकानों में घूम-घूमकर मैं श्री अच्युत पटवर्धन से मिला था । वे उस समय भूमिगत थे । छिप-छिपकर मैं बुलेटिन भी निकालता था । और ये सारे काम मैं यह मानकर करता था कि मैं बापू के आदेश का पालन कर रहा हूँ । इसकी चर्चा मैंने प्यारेलालजी के साथ की । उन्होंने सारा किस्सा बड़े धीरज के साथ सुन लिया । केवल धीरज के साथ ही नहीं , बल्कि सहानुभूतिपूर्वक सुन लिया । फिर धीरे - धीरे समझाना शुरु किया कि किसी भी प्रकार के माल को नष्ट करने में कैसे हिन्सा है , गुप्तता अहिंसक आन्दोलन को कैसे नुकसान पहुँचाती है । सारी चर्चा में मुख्य बात यह थी कि सारी हिंसा का प्रारम्भ सरकार ने किया था , अनेक प्रकार के कार्यक्रमों के संकेत भी सरकार ने ही दिये थे और अंत में इस सारी हिंसा के लिए कांग्रेस जिम्मेवार है , यही सरकार मानती थी । इसलिए हमलोगों ने जो रास्ता सोचा था , वह गलत था , यह तो मैं समझ गया । लेकिन मेरे मन में विफलता की (frustration) की भावना नहीं थी । देश में जो गैर बातें हुईं वे गलत थीं , यह बापू ने कहा था । और देश को सही रास्ते पर लाने की उन्होंने कोशिश भी की थी । फिर भी देश-प्रेम की भावना से की गयी इन गलत कार्रवाइयों की बापू ने निन्दा नहीं की । इसीसे वे राष्ट्र के सामान्य नागरिकों को अपने साथ रख सके थे और उनको सही रास्ते पर ला सके थे ।
आगा खाँ महल में काफी समय खाली रहता था , इसलिए मैंने वहाँ विक्टर ह्युगो के प्रसिद्ध उपन्यास ‘ ला मिज़रेबल ‘ का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ लिया । बापू ने यह सुना तो उनको थोड़ा आश्चर्य हुआ । शायद उनके मन में पुराने छोटे बाबला की ही प्रतिमा अब तक थी । उन्होंने मुझे अपने पास बुलाकर मेरा विशेष अभिनन्दन किया । मैं शरमा गया । प्यारेलालकाका ने बापू से कहा , ‘आप तो इसको बिलकुल बच्चा समझते हैं ।लेकिन यह तो मेरे साथ देश के प्रश्नों की चर्चा करता है । इतने दिनों में अहिंसा का बहुत सारा विवेचन इसने मेरे साथ किया । ‘ मैं और भी शरमा गया ।
बापू ने कहा , ‘ यह तो मैं जानता ही था । बचपन से ही इसे बहस करने की आदत है । मुझे तो इसके अंग्रेजी ज्ञान के बारे में आश्चर्य हुआ। और अहिंसा की बात निकली है तो इतना कह देता हूँ कि अहिंसाविषयक मेरे विचारों में भी विकास हुआ है । एक जमाना था , जब मैं मानता था कि देश में कहीं भी हिंसा हुई तो वह समय अहिंसा के प्रयोग के लिए अनुकूल नहीं है। आज तो मैं मानता हूँ कि सच्ची अहिंसा की ज्योति ऐसी होगी कि उसके चारों ओर हिंसा की तूफानी हवा बहती हो तो भी वह जलती रहेगी । ‘
उपवास के समय एक नेता ने बापू से कहा था , ‘ आपकी मृत्यु होने पर देश में जो प्रचंड ज्वाला भड़केगी , उसे दबाने के लिए सरकार ने टैंक तैयार रखे हैं । ‘
उपवास के बारहवें या तेरहवें दिन बापू बड़ी नाजुक अवस्था में से गुजरे थे । उस दिन उनके गले के नीचे पानी भी नहीं उतर रहा था । ऐसी अवस्था हो जाय तो नारंगी या ऐसे खट्टे फलों (साइट्रिक फ्रूट) का रस पानी में घोलकर पीने की छूट उपवास के प्रारम्भ में बापू ने जाहिर कर दी थी । पानी में संतरे का रस ४-५ चम्मच घोलकर वह गले के नीचे उतर जाय , ऐसा बनाकर बापू को दिया गया ।
लेकिन सरकार ने इस प्रसंग का दुरुपयोग करने की ठानी । हर रोज बापू का वजन लिया जाता था । इस प्रसंग के दूसरे दिन वजन लिया गया ,तो एकाएक ४ पौंड वजन बढ़ा हुआ पाया । सरकार इसीकी राह देख रही थी कि उपवास के समय खुराक ली है , यह कैसे सिद्ध किया जाय । डॊ. सुशीलाबहन इस मामले में बहुत सतर्क थीं । उन्होंने कहा , ‘यह असम्भव है। जरूर कुछ दाल में काला है ।’ फिर उसी काँटे पर मेरा वजन करके देखा गया तो वह भी ४ पौंड अधिक पाया गया ।फिर एक-एक करके सबका वजन देखा गया और सबका वजन ४ पौंड बढ़ा हुआ मिला । इस प्रकार बापू की फजीहत करने पर तुली हुई बेमुरव्वत सरकार का साथ यांत्रिक काँटे ने नहीं दिया । वह सरकार से अधिक निष्पक्ष था । उसने अपनी भूल की पोल खुद ही खोल दी ।
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८ अगस्त सन १९४२ की रात को बम्बई के बिरला हाउस में दो प्रकार की राय व्यक्त की जा रही थी । उस दिन शाम को ‘ भारत छोड़ो ‘ के प्रस्ताव पर बापू कांग्रेस - महासमिति की बैठक में भाषण कर चुके थे । काका का अभिप्राय था कि सारे राष्ट्र मे बिजली का संचार करानेवाले बापू के इस भाषण के बाद सरकार उनको अधिक दिन बाहर नहीं रहने देगी । उसी रात वे पकड़े जायेंगे । बापू ने अपने भाषण में वाइसराय को पंद्रह दिन का समय दिया था । उन्होंने कहा था कि वे वाइसराय को अन्तिम पत्र लिखेंगे और १५ दिन के अन्दर उनकी ओर से अनुकूल उत्तर नहीं मिला तो वे ‘ भारत - छोड़ो ‘- आन्दोलन छेड़ देंगे । बापू की राय थी कि सरकार उनको पंद्रह दिन तक नहीं पकड़ेगी । बापू जिस सरकार के लिए भारत से चले जाने का आवाहन कर चुके थे , उसके प्रतिनिधि की ओर से अभी भी उनको इतनी आशा थी कि पंद्रह दिन की मर्यादा वे नहीं तोड़ेंगे ।
सभा से लौट कर बिरला हाउस में बापू ने प्रार्थना की ।प्रार्थना के बाद वे निश्चिंत मन से गाढ़ निद्रा में सो गये । केवल दो व्यक्तियों को नींद नहीं आ रही थी - कस्तूरबा और महादेवभाई। मेरा और काका का बिछौना पास-पास था ।बिरला हाउस की बड़ी घड़ी ने रात का का एक बजाया ।
‘ कितने बजे महादेव ? ‘ कस्तूरबा ने पूछा ।
‘ एक बजा है बा । ‘
‘ तुमको क्या लगता है ? बापू को पकड़ेंगे ? ‘
‘ मुझे तो ऐसा ही लगता है । लेकिन बापू मानते हैं कि उनको नहीं पकड़ा जायगा । मन तो यही कहता है कि अ. भा. कंग्रेस-कमेटी के भाषण के बाद सरकार उनको बाहर नहीं रहने देगी । लेकिन कह नहीं सकते । बहुत दफ़ा बापू की बुद्धिगम्य न होनेवाली बातें सही निकलती हैं । इस समय भी वैसा नहीं होगा , ऐसा कौन कह सकता है ? ‘
मैं बीच - बीच में झपकी ले लेता था और घड़ी के ठोके सुनकर बीच में जाग पड़ता था ।
दो . . . तीन . . . चार !
क्स्तूरबा और काका सारी रात जागकर इसी विषय में बात करते रहे थे । चार बजे काका ने कहा , ‘ बा , अब तो बापू की ही बात सही निकलेगी , ऐसा लगता है । बम्बई की पुलिस को आधी रात में चोर की तरह आकर गिरफ्तार करने की आदत है । अब तो सुबह हो रही है । अब शायद उनको नहीं पकड़ेंगे । लेकिन सरदार को तो अवश्य पकड़ा होगा ।सरदार का कल का भाषण ऐसा तीखा था कि सरकार उनको एक क्षण के लिए भी बाहर रहने देने को तैयार नहीं होगी । चलो सरदार के घर पर फोन करके खबर पूँछेंगे। फोन नहीं लगा । लाइन काट दी गयी थी । पड़ोस के बँगले में फोन करने स्वामी आनन्द बाहर गये ही थे कि फाटक से ही वापस आकर उन्होंने खबर दी कि ‘ वे आ गये । यजमान आ पहुँचे हैं । ‘
बापू को पकड़ने के लिए वारंट का जो कागज पुलिसवाले लाये थे , वह कुछ अजीब ढंग का था । उसमें बापू , मीराबहन और काका को पुलिस-इन्स्पेक्टर के साथ जाने का ( यानी गिरफ्तारी का ) हुक्म था । लेकिन बा और प्यारेलालजी के लिए उस कागज में विचित्र फ़रमान था । लिखा था कि ये लोग बापू के साथ आना चाहें तो आ सकते हैं , लेकिन न आना हो तो उनको छूट है ।
यह जेल - यात्रा आखिर की है , यह अंदज़ सबको ही हो गया था । अंतिम जेल - यात्रा में बापू के साथ रहने का मौका मिल रहा है , यह देखकर मीराबहन खुश हो रही थीं । लेकिन बा के सामने धर्मसंकट खड़ा हो गया । बा ने बापू से पूछा , ‘ इस हुक्म का अर्थ क्या है ? ‘
बापू ने अर्थ समझाकर पूछा , ‘ तुम्हारी क्या इच्छा है ? ‘
बा ने कहा , ‘ आप ही कह दीजिये न ! ‘
बापू ने कहा , ‘ मेरी इच्छा पूछती हो तो मैं चाहूँगा कि अभी मेरे साथ चलने के बदले शिवाजी पार्क में मेरे लिए जो सभा रखी गयी है , उस सभा में मेरी ओर से तुम भाषण करो और स्वतंत्र रूप से पकड़ ली जाओ तो अच्छा होगा । लेकिन मेरे साथ चलने की इच्छा हो तो मैं मना नहीं करूँगा ।तुम्हें अलग से पकड़ने पर सरकार मेरे साथ तुम्हें न रखे , यह भी संभव है । यह सब सोचकर निर्णय करना चाहिए । ‘
बा के सामने कठिन पेंच खड़ा हुआ । एक तरफ सारी जिन्दगी का सवाल था । जेल में बापू जिन्दा रहेंगे या नहीं , इसमें भी शंका थी । फिर से बापू से भेंट हो सकेगी या नहीं , यह भी अनिश्चित था । दूसरी तरफ बापू की इच्छा का प्रश्न था ।
लेकिन इस प्रसंग को लिखने में मुझे जितना समय लगा , उतना भी बा को निर्णय करने में नहीं लगा । उन्होंने तुरंत गम्भीर स्वर में कहा , ‘ मेरी इच्छा पूछोगे तो इस समय आपके साथ रहना मैं पसन्द करूँगी , लेकिन उससे भी अधिक आपकी इच्छा पूरी करना मुझे अच्छा लगेगा , इसलिए रुक जाती हूँ । ‘
मैं तो अवाक होकर इस सती की ओर देखता ही रह गया ! त्रेता-युग में राम और सीता के वियोग का प्रसंग आया , तब राम ने सीता को जंगल में साथ चलने के बदले महल में ही रुक जाने का आग्रह किया था , लेकिन सीता ने राम का साथ नहीं नहीं छोड़ा था । कलिकाल में बापू कस्तूरबा से किसी प्रकार का आग्रह नहीं करते । निर्णय भी उन्हीं पर छोड़ते हैं । और चमत्कार यह कि बा को बापू की इच्छा पूरी करने के लिए उनसे दूर रहना पसन्द है ।
मैंने काका का सामान बाँधना शुरु किया । मैं कई बार काका से कहता था , ‘ काका , आप कुछ मौलिक साहित्य तो लिखते ही नहीं । जो लिखते हैं , वह बापू के भाषणों की रिपोर्ट या किसी पुस्तक का अनुवाद । ‘ काका हँसकर जवाब देते , ‘ मौलिक साहित्य तू लिख। ‘ कभी कहते थे कि पाँच - छह उपन्यासों की कथावस्तु मन में तैयार है । कभी लम्बे समय की फुरसत मिलेगी , तो लिखा जायगा । गुरुदेव टैगोर की ‘गीतांजलि’ के सभी गीतों का मूल छंद में गुजराती अनुवाद करने की भी इच्छा थी । अंतिम बार जब शांतिनिकेतन गये थे , तब कुछ गीतों की धुन सुन कर आये थे । मैं यह सब जानता था , इसलिए सन १९४२ की लड़ाई के आसार दिखायी देने लगे , तब से बंगला गीतांजलि की एक प्रति और लिखने के लिए पाँच-छह कोरे कागज पैड मैं हमेशा साथ रखता था । वह इस समय ले आया और काका से पूछा कि ‘ सामान के साथ यह भी बाँध दूँ न ? अब तो आपको फुरसत मिलेगी । ‘
लेकिन काका को उत्साह नहीं था । उन्होंने कहा , ‘ कुछ भी सामान साथ में मत दो । बापू के उपवास की बात डेमोक्लीस की तलवार की तरह मेरे सिर पर लटक रही है । इस समय बापू अनशन करेंगे तो सरकार शायद उनको मरने देगी । यह सब देखने के लिए मैं जिन्दा नहीं रहूँगा । मैं जेल में एक सप्ताह तक भी जिन्दा रह सकूँगा या नहीं , कह नहीं सकता । तू किसी प्रकार की लेखन - सामग्री साथ मत दे । ‘
मैंने कहा : ‘ आप ऐसा कुछ मत बोलिये । ‘ काका ने कुछ जवाब नहीं दिया ।
पुलिस-इन्स्पेक्टर देसाई के साथ निकलने से पहले बापू ने प्रार्थना की । सारे वातावरण में एक बिजली-सी थी । बापू ने कह दिया था कि उनके पकड़े जाने के बाद हरएक भारतवासी अपना नेता है , ऐसा समझकर अहिंसा का विचार ध्यान में रखकर आन्दोलन जारी रखे । यह आन्दोलन अल्पकालीन , लेकिन गतिमान ( शार्ट एण्ड स्विफ़्ट) होगा , ऐसा इशारा भी बापू ने दिया था । इसलिए हम सबके मन में एक अजीब उत्साह था ।
पुलिस-इन्स्पेक्टर की गाड़ी में सब बैठे । काका बैठने जा रहे थे , तब मैंने कहा : ‘ अब तो स्वतंत्र भारत में मिलेंगे । ‘
इसके जवाब में काका ने मुझे चूम लिया ।
यह उनका अंतिम चुम्बन था ।
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सन १९४२ - ४३ का वर्ष भारत के इतिहास में बड़ि धूमधाम का था । देश में पिछले पचास वर्षों में जो परिवर्तन नहीं हो सके थे , वे इस एक ही वर्ष में हो गये । बापू के आश्रम की दृष्टि से देखा जाय तो १९४२ की फरवरी से ले कर १९४४ की फरवरी तक बापू ने पहले जमनालालजी , फिर महादेवभाई और कस्तूरबा को खो दिया था । एक से एक बढ़कर निजी सम्बन्ध के ये व्यक्ति ! हरएक से गहरा आत्मीय सम्बन्ध । बापू के जीवन में इन दो वर्षों के जैसा शायद ही काल होगा , जिसमें उनको इतने व्यक्तिगत आघात सहन करने पड़े होंगे । स्वातंत्र्य-संग्राम के यज्ञ में अंतिम आहुति का यह काल था । उसमें इन तीनों का बलिदान एक पवित्रतम बलिदान माना जाएगा ।
जमनालालजी को बापू के दरबार के नवरत्नों में से एक कहा जायगा । उनके सम्बन्ध में बापू ने एक बार लिखा था : ‘ बाईस साल पहले की बात है , तीस साल का एक नवयुवक मेरे पास आकर कहने लगा , ‘ आपके पास मेरी एक माँग है । ‘ मैंने चकित होकर कहा , ‘माँगो - माँगो , मुझसे वह माँग पूरी हो सकती है तो जरूर पूरी करूँगा । ‘ नवयुवक ने कहा , ‘ आप मुझे अपने देवदास की जगह पर समझें । ‘ मैंने कहा अच्छा मान लिया। लेकिन इसमें आपने क्या माँगा ? वास्तव में इसमें आपने दिया और मैंने प्राप्त किया , ऐसा हुआ है।’
‘ यह नवयुवक जमनालाल थे । वे मेरे पुत्र बनकर कैसे रहे , यह तो भारतवासियों ने अपनी नजर से देखा ही है। लेकिन मैं तो यही कहूँगा कि मेरी जानकारी में ऐसा पुत्र आज तक किसीको नहीं मिला होगा । ‘
मृत्यु के कुछ दिन पहले जमनाललजी ने बापू के सामने राजनीति से मुक्त होकर रचनात्मक काम में लग जाने की अपनी इच्छा व्यक्त की थी । वे कांग्रेस की कार्यकारिणी के सदस्य थे और अखिल भारत कांग्रेस कमेटी के खजांची थे । इस समय बापू ने उनके लिए गोसेवा का काम चुना , जो जमनालाजी को हृदय से प्रिय था ।
बाहर से देखा जाय तो जमनालालजी बापू से मिलने आनेवाले छोटे-बड़े अतिथियों को प्रेमपूर्वक सत्कार करनेवाले यजमान , उनके सम्पर्क में आनेवाले विशाल कार्यकर्ताओं की जमात के जवान लड़के-लड़कियों की शादियाँ तय करा देनेवाले बापू के शब्दों में ‘शादीलाल’ तथा वर्धा और आसपास की दर्जनों संस्थाओं के संस्थापक , पोषक तथा एक दूरदर्शी कुशल व्यापारी थे । लेकिन अन्दर से वे सत्संग के पिपासु , विरक्त और मुमुक्षु थे । आदमी की सही परीक्षा करने में वे किसी पारखी जौहरी को भी शरमा देनेवाले थे । साबरमती- आश्रम मे बापू से वर्धा के लिए उन्होंने माँग की तो वह विनोबा जैसे व्यक्ति की , अपने राजनीतिक मामलों में सलाहकार और निजी मंत्री के तौर पर उन्होंने दादा धर्माधिकारी का चुनाव किया , रचनात्मक कार्यों में सत्यनिष्ठ तथा व्यावहारिक सलाह देने के लिए उन्होंने श्रीकृष्णदासजी जाजू को चुना , बजाजवाड़ी में अपने निवास के बगल में उन्होंने किशोरलाल मशरूवाला को बसाया , इसके अलावा कितने ही अप्रसिद्ध , लेकिन चुनिन्दा कार्यकर्ताओं को वे वर्धा खींच लाये थे , उनके सामने उन्होंने अपनी भूमिका नम्र भक्त , जिज्ञासु और जीवनसाधक की ही मानी थी । बापू के काम में आये , तब उन्होंने अपने पास की सारी अर्जित संपत्ति राष्ट्र के चरणों में अर्पित कर दी । लेकिन इस दान के कारण लेशमात्र अहंकार का स्पर्श उनको नहीं हुआ था । संपत्ति के सम्बन्ध में उनकी वृत्ति जनक के जैसी अनासक्त थी ।
जमनालालजी की बीमारी की खबर सुनते ही बापू सेवाग्राम से वर्धा आने के लिए निकल पड़े । रक्तचाप की अपनी सर्पगंधा नामक दवा साथ लाये थे। लेकिन बापू के पहुँचने से पहले ही बापू के प्राण-पखेरू दुर्भाग्य से उड़ चुके थे । उनका सिर अपनी गोदी में लेकर बापू कहने लगे , ‘ भाई , तू मेरा पाँचवाँ पुत्र बना था , तो मुझसे पहले जाना तो तेरा धर्म नहीं था । ‘
मृत्यु के बाद उनके मुख पर जो शांति और कांति दिखाई दे रही थी , वैसी क्वचित ही देखने को मिलती है । सारा वर्धा शहर और आसपास के देहातों से बहुत सारे लोग उनकी श्मशान-यात्रा में इकट्ठा हो गये थे । उनका दाह-संस्कार वर्धा से दो मील की दूरी पर गोपुरी में ‘शांति-कुटीर’ नाम के उनके तत्कालीन निवासस्थान के सामने के मैदान में किया गया था। आखिर के दिनों में बजाजवाड़ी का अपना बँगला छोड़कर वे शांति -कुटीर में रहने लगे थे ।
उनकी पत्नी जानकीदेवी बजाज ने उस समय जमनालालजी की चिता पर ही अपनी देह का विसर्जन करने की इच्छा व्यक्त की थी। उनको बापू ने सलाह दी कि जमनालालजी का गोसेवा का अधूरा काम पूरा करने के लिए उनको जीवित रहना चाहिए। वैसा संकल्प बापू ने उनसे करवाया। जानकीदेवी ने भी अपने हिस्से की सारी संपत्ति गोसेवा-संघ को अर्पण कर दी ।
जमनालालजी के निमित्त होनेवाली शोक-सभा में विनोबा ने कहा था , ‘जमनालालजी के साथ मेरा बीस साल का परिचय था ; लेकिन उनके मन की जो उन्नत अवस्था पिछले डेढ़-दो महीनों में मैंने देखी , वैसी पहले कभी नहीं देखी थी । मन की ऐसी दुर्लभ अवस्था में मृत्यु हो जाना दुर्लभ बात है । जमनालालजी को वह भाग्य प्राप्त हुआ है ; इसलिए उनकी मृत्यु से मुझको दु:ख नहीं बल्कि आनन्द ही हुआ । इस तरह की पवित्र मृत्यु का लाभ हो , ऐसी हम सब कोशिश करें । आत्मा जब अपनी संकल्प-पूर्ति का दर्शन शरीर में करना सम्भव नहीं मानती है , तब वह शरीर का त्यागकर सबमें प्रवेश करके अपना काम पूरा करती है ।’
जमनालालजी द्वारा साधु-पुरुषों की जो खोज चलती थी , वह केवल सर्वोदय के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं थी । रमण महर्षि के आश्रम में उनको शान्ति मिलती थी ।माता आनन्दमयी के साथ उनका हार्दिक सम्बन्ध था ।माँ आनन्दमयी जमनालालजी के स्वर्गवास के बाद वर्धा आयीं थीं ।बापू से मिलने वह सेवाग्राम गयी थीं ।अपनी बातचीत में उन्होंने सहज रूप से कहा कि ‘ छह माह के अन्दर-अन्दर और एक महापुरुष का निर्वाण होनेवाला है ।’ यह सुनकर काका को लगा कि यह वचन बापू को लक्ष्य करके कहा गया होगा ।इसलिए वे बहुत उद्विग्न हो उठे थे । काका ने अपनी चिन्ता हमारे सामने भी व्यक्त की थी । लेकिन उन्हें या हमें क्या कल्पना थी कि वह वचन उन्हीं पर लागू होनेवाला था ।
बापू ने ‘भारत-छोड़ो’ आन्दोलन शुरु किया , तब से काका का काम बहुत बढ़ गया था । मुलाकातों का ताँता लग जाता था । पत्र-व्यवहार का ढेर भी बढ़ गया था । लेख अधिक लिखने पड़ते थे । कुछ कसर रह गयी होगी तो बापू ने पूरी की। उन्होंने कहा,’इस समय की जेल-यात्रा अब तक की यात्राओं से अलग प्रकार की होगी। जेल में पहुँचते ही मैं अन्न-जल का त्याग करने का सोच रहा हूँ।’ इससे काका की चिन्ता और बढ़ गयी।जेल जाते ही अनशन शुरु करने का बापू का विचार काका को जरा भी पसन्द नहीं था । उन्होंने सेवाग्राम में रहते ही बापू के साथ इस सम्बन्ध में पत्रों की झड़ी लगा दी।
काका का स्वास्थ्य उन दिनों ठीक नहीं रहता था ।आन्दोलन के नगाड़े बजने शुरु हो गये थे । काका को कुछ दिन आराम लेकर अपना स्वास्थ्य ठीक कर लेना चाहिए , इस बात के लिए बापू ने उनको मना किया था ।श्री घनश्यामदास बिड़ला काका को अपने साथ नासिक ले जाने को तैयार हुए । एक सप्ताह आराम लेने का कार्यक्रम बना था । उनके साथ हम में कोई नहीं जाने वाला था।
वर्धासे फिर फोन आया कि महादेवभाई को स्टेशन पर चक्कर आ गया , इसलिए वे रुक गये हैं। बापू ने संदेशा भिजवाया कि उनको तुरंत सेवाग्राम वापस लाओ। रास्ते में काका को सिविल सर्जन को दिखा दिया गया ।उस दिन बापू की जो व्याकुलता मैंने देखी , वैसी कभी नहीं देखी थी । रविवार का दिन था । हर रविवार की शाम को बापू मौन शुरु करते थे और सोमवार की शाम तक वह जारी रहता था। मौन के दरमियान बापू अपने कमरे से बाहर आकर पास के छोटे कमरे में चले जाते थे , जहाँ टेलीफोन रखा हुआ था। थोड़ी-थोड़ी देर में वे काका के समाचार पूछने की सूचना देते थे ।आखिर काका को लेकर मोटर आ गयी। उनको सीधे हमारे मकान पर लिवा गये। बापू दौड़कर वहाँ पहुँच गये। माँ ने उनके लिए जो बिस्तर तैयार करके रखा था,उसपर उनको सुलाया गया ।बापू ने उनका सिर अपनी गोद में लेकर कहा , ‘क्यों महादेव,अब कैसे हो?’ मगनलालकाका की मृत्यु के के बाद बापू द्वारा अपना मौन-भंग करने का यह पहला प्रसंग था ।
‘ बस, मेरी इच्छा पूर्ण हो गयी। स्टेशन पर लगता था कि अब चला। इसीलिए मैंने आग्रहपूर्वक कहा कि मुझे नासिक नहीं जाना है और अस्पताल में भी नहीं जाना है। मरना ही होगा तो बापू की गोद में मस्तक रखकर मरूँगा । फिर भी ये लोग मुझे डॊक्टर के पास ले ही गये । ‘
बापू अपनी गोद में काका का सिर सहलाते रहे। थोड़े दिनों के बाद यानी १५ अगस्त की सुबह आगा खाँ महल में काका की मृत्यु हुई , तब उनका मस्तक बापू की गो में ही था ।
[ अगला प्रसंग : ९ अगस्त , १९४२ ]
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सेवाग्राम में डाकघर खुल गया , तब हम मगनवाड़ी छोड़कर सेवाग्राम रहने गये थे । वहाँ हमारे लिए एक कुटिया बनायी गयी थी । यह कुटी बापू-कुटी के नजदीक थी । एक तरफ बा-कुटी , बीच में बापू - कुटी और दूसरी तरफ हमारी कुटी थी । बापू , बा और महादेवभाई की त्रिपुटी की मानो निशानी। हम लोगों की कुटी इतनी नजदीक थी और काका करीब सारा दिन बापू की कुटी में बिताते थे , तब भी मैं या मेरी माँ बापू की कुटी में बहुत ही कम जाते थे । बापू को व्यक्तिगत रूप से किसी प्रकार की तकलीफ न देने की हम तीनों की वृत्ति थी ।
सन १९४२ में काका का काम दिन-ब-दिन बढ़ने लगा था। बहुत दफा काका दोपहर में आग्रहपूर्वक आराम लेने का प्रयत्न करते थे । अपने कमरे का दरवाजा बन्द करते हुए मुझे कहते थे , ‘ बाबला , मैं जरा आराम करने जा रहा हूँ। भले कोई राजा आ जाय , लेकिन मुझे जगाना नहीं ।’अपनी बात को फिर से दोहराते हुए कहते थे , ‘ अरे, प्रत्यक्ष यमराज आ जाय , तो भी उससे कहना कि जरा ठहर जा , काका आराम कर रहे हैं , इस समय दरवाजा नहीं खोलने दूँगा । ‘
यमराज की बात में मुझे दिलचस्पी नहीं थी , इसलिए मैं उसके बदले पूछता था , ‘लेकिन काका,बापू आ जायँ तो ?’ इस प्रश्न से काका निरुत्तर हो जाते थे ।बापू उनके दरवाजे पर पहुँचे हैं और वे सो रहे हैं,यह कल्पना ही काका के लिए सम्भव नहीं थी ।
घर की कोई भी बात ऐसी नहीं थी , जो काका या माँ मुझसे छिपा रखती हो। वैसे तो उन दोनों को आपस में बातचीत करने के लिए समय ही कम मिलता था ।नाश्ता करते समय या भोजन के समय जो कुछ बात होती होगी,वही उनकी बातचीत।वह भी खुल्लम्खुल्ला होती थी। आखिर तक काका को बापू की तरफ से सत्तर रुपये माहवार मिलते थे । इतने में घर का खर्च कैसे चलाया जाय , यह प्रश्न कई बार उठता था । कभी-कभी बहुत तंगी हो जाती , तब काका अखबार में लेख लिखकर घर-खर्च की कमी भर देते थे । कभी - कभी घर में कटौतियाँ करने का संकल्प किया जाता था । ऐसी चर्चाओं में काका और माँ मुझे भी शरीक करते थे । इससे मुझे लगता था कि घर चलाने में मेरा भी कुछ हिस्सा है । बीच-बीच में मैं भी ध्यान रखता था कि खेलते समय कहीं चड्डी फट न जाय। जेबखर्च जैसी कोई चीज मेरे लिए नहीं थी , और न कभी मुझे उसकी आवश्यकता ही प्रतीत हुई ।
लेकिन एक दिन रात को मैंने काका और माँ को मुझसे छिपाकर बात करते हुए सुना । मुझे नींद लगी है , ऐसा मानकर वे बात कर रहे थे ।
काका ने माँ से पूछा , ‘ आज बापू ने क्या कहा, सुना न ?’
माँ ने कहा , ‘ क्यों? हम दोनों पास ही तो बैठे थे ।’
काका, ‘ फिर तूने क्या सोचा ?’
माँ , ‘ सोचना क्या है ? बापू जो कहते हैं , वैसा करना है । ‘
काका , ‘ मरने की तैयारी है ? ‘
माँ , ‘ तोप के मुँह में जाना है तो मरना पड़ेगा ही । लेकिन बाबला के सम्बन्ध में क्या सोचा है ? ‘
चर्चा का विषय यह था : दूसरा विश्व-युद्ध शुरु हुआ , तब आजादी की लड़ाई के साथ-साथ परराष्ट्रों के आक्रमण का मुकाबला अहिंसक प्रतिकार के द्वारा किया जाय , ऐसी चर्चा चल पड़ी थी ।अंग्रेज यदि भारत को आजादी देंगे तो युद्ध में उनको सशस्त्र सहकार देने के पक्ष में कांग्रेस के कुछ नेता थे।बापू प्रारम्भ में मित्र-राष्ट्रों को अपना नैतिक समर्थन देने के पक्ष में थे। लेकिन बाद में उनका विचार बदल गया । हिटलर के आक्रमण के सामने पोलैंड ने शस्त्र उठाकर बहादुरी के साथ प्रतिकार करना शुरु किया , इसकी बापू ने प्रशंसा की थी । कायरता की अपेक्षा वीरों की हिंसा बापू अधिक पसन्द करते थे । लेकिन बापू अपने और अपने देश के लिए उससे भी ऊँची वीरता का यानी अहिंसक प्रतिकार के मार्ग का रास्ता सोच रहे थे ।
जापानी सेना जब भारत की भूमि पर छिटपुट बम-वर्षा करने लगी और इम्फाल-कोहिमा तक उसकी सेना आगे बढ़ आयी , तब बापू ने इस सम्बन्ध में एक लेख लिखा था । मीराबहन के साथ उनका कुछ पत्र-व्यवहार भी हुआ था । मीराबहन उड़ीसा गयी हुई थीं।उन्होंने वहाँ से बापू को लिखा कि , ‘ जापानी सेना के उड़ीसा के समुद्र किनारे पर उतरने की सम्भावना है । ऐसी हालत में भारत के लोगों को वे क्या सलाह देंगे ? भारत का शासन बापू के हाथ में होता तो वे क्या करते ? ‘
बापू ने दो पत्र लिखकर इसका जवाब देते हुए नि:शस्त्र प्रजा की ओर से तथा स्वेच्छापूर्वक सैन्य-विसर्जन करनेवाली सरकार की ओर से विदेशी आक्रमण का अहिंसक प्रतिकार किस तरह से हो सकता है , इस विषय में अपनी कल्पना तफसील से बतायी थी। परराष्ट्रों के आक्रमण का अहिंसक प्रतिकार करने की बापू की कल्पना को तीन हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है ।आक्रमण के पहले , आक्रमण के समय में और आक्रमण के बाद । आक्रमण के पहले शुभेच्छा , भ्रातृभाव , सेवा और प्रेम का प्रति-आक्रमण करके हमलावरों को आने से ही रोका जाय ; आक्रमण हो जाने पर अहिंसक प्रतिकार की दृष्टि से अहिंसक सेना के सिपाही तोपों के मुँह में अपना बलिदान दें ; फिर भी आक्रमण देश पर हावी हो जाय तो देश की सारी प्रजा उसका अहिंसक असहकार या बहिष्कार या ऐसा ही कोई प्रतिकार करे , यह बापू की योजना थी ।
इस योजना के अनुसार विदेशी आक्रमण की तोपों के सामने अपना बलिदान देने के लिए भारत में ऐसी अहिंसक सेना प्राप्त हो सकेगी या नहीं , यह प्रश्न था । बापू ने कहा था कि ऐसे एक हजार भी सैनिक मिलें तो वे आक्रामकों का अहिंसक प्रतिकार करने को तैयार हैं । उस दिन दोपहर को आश्रमवासियों की सभा बुलाकर बापू ने यह बात उनके सामने रखी थी। इसी सिलसिले में रात को काका और माँ का संवाद हो रहा था ।
दोनों के सामने एक ही समस्या थी । बापू ने एक हजार सैनिकों की माँग की तो उस सेना में काका और माँ शरीक होने को तैयार थे। लेकिन बाबला का क्या किया जाय ? एक विचार यह भी किया गया कि काका सेना में जायँ और माँ पीछे रहें; लेकिन वह विचार रद्द किया गया । अन्त में दोनों ने निर्णय लिया कि बापू ने यदि ऐसे सिपाहियों की माँग की तो दोनों अपने नाम देंगे । बाबला अब समझदार हो गया है । उसकी चिन्ता भगवान करेगा ।
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बापू की गोद में (१८) : दूसरा विश्व-युद्ध और व्यक्तिगत सत्याग्रह
Published January 18, 2007 gandhi 2 Commentsदूसरे विश्व-युद्ध ने दुनिया के इतिहास को एक नया मोड़ दे दिया । सम्राज्यवाद के पाँव-तले कुचले हुए , दुनिया के कई स्वातंत्र्योत्सुक देशों में इसके प्रत्याघात हुए । भारत ने इस युद्ध के सम्बन्ध में जो नीति अपनायी , उसका असर दुनिया के अनेक गुलाम देशों पर भी हुआ ।
प्रारम्भ में तो वाइसराय ने धड़ल्ले से घोषित कर दिया कि इस युद्ध में भारत मित्र-राष्ट्रों के पक्ष में है । देश के ग्यारह प्रान्तों में से आठ प्रान्तों में उस समय कंग्रेस के मंत्रीमन्डल थे । फिर भी उनकी सलाह तक इस विषय पर लेना जरूरी नहीं समझा गया । कांग्रेसी मंत्रियों ने इसके विरोध में अपने त्यागपत्र दे दिये । एक अनुशासन्युक्त पक्ष के तौर पर कांग्रेस की प्रतिष्ठा इस घटना के कारण बढ़ी ।युद्ध की तैयारियों का असर देश पर धीरे-धीरे दिखाई देने लगा था ।युद्ध के विरोध में किसी भी प्रकार मत-प्रदर्शन करना एक गुनाह माना गया । वाणी-स्वातंत्र्य के तत्व को लेकर बापू ने इस युद्ध के खिलाफ आवाज उठाने का निश्चय किया । कौनसी यह आवाज थी ? युद्ध की तोपों के सामने उससे सवाइ तोपों का वह गर्जन नहीं था, बल्कि आजादी के नाम पर लड़नेवाली सरकार ने वाणी-स्वातंत्र्य के लोकतांत्रिक मूल अधिकार पर जो हमला किया था , उसके खिलाफ यह नैतिक आवाज थी । सत्याग्रह का स्वरूप सौम्य था। सारी दुनिया को स्पर्श करनेवाले एक नैतिक मुद्दे पर बापू ने व्यक्तिगत सत्याग्रह चलाने का निर्णय किया ।
प्रथम सत्याग्रही के तौर पर बापू ने विनोबा को चुना । तब देश-विदेशों से पृच्छा होने लगी कि यह विनोबा कौन है ? उनके बारे में एक परिचयात्मक लेख बापू ने लिखा , जो अपने ढंग का अनोखा था । उन्होंने विनोबा की प्रशंसा करते हुए लिखा था , ‘ तकली की सारी सुप्त शक्तियों को विनोबा ने खोज निकाला है । ‘ इस तरह के परिचय से दुनिया क्या समझेगी, या उसका क्या सन्तोष होगा ? काका ने एक दूसरा लेख लिखकर विनोबा का अधिक परिचय कराया। विनोबा के सम्बन्ध में लिखे सर्वोत्तम लेखों में से वह लेख माना जाएगा । उस लेख के अन्त में काका ने लिखा था , ‘ आज इस सत्याग्रह के कारण विनोबा के नाम का परिचय लोगों को हुआ। लेकिन उनकी महत्ता दुनिया को बाद में ध्यान में आयेगी। उस समय विनोबा के नाम से सत्याग्रह को गौरव प्राप्त होगा । ‘
सेलू नाम के एक गाँव में अखबार के संवाददाता के तौर पर काका को बापू ने इस सत्याग्रह की पहली सभा में भेजा । विनोबा की भाषण की शैली पर काका पहले से ही लट्टू थे । भाषण पूरा होते ही काका की रिपोर्ट तैयार हो जाती थी । इसके बाद दूसरी सभा सेवाग्राम में हुई ।बापू के आशीर्वाद लेकर विनोबा सभा-स्थल पर गये । बापू जाहिर सभा में उपस्थित नहीं थे । हम सब आश्रमवासी गये थे ।विनोबा इन दिनों जो बोलते हैं , उसमें सहजता होती है । लेकिन उस समय उनके भाषणों में वक्तृत्व-कला अधिक रहती थी । उनकी वाक्धारा अस्खलित बहती थी । देहात के लोग समझ सकें , ऐसे उदाहरण और कथाएँ उस समय विनोबा के भाषणों में अधिक रहती थीं ।
विनोबा और उनके बाद व्यक्तिगत सत्याग्रह में पकड़े गये अन्य सत्याग्रहियों से जेल में मिलने के लिए काका गये। सेवाग्राम में दूसरे नंबर के व्यक्तिगत सत्याग्रही के चुनाव के सम्बन्ध में काका को खास सन्तोष नहीं था । इस चुनाव के पीछे शायद बापू का यह खयाल होगा कि एक अत्यन्त सामान्य व्यक्ति भी सत्याग्रह में शरीक हो सकता है ।
इसके बाद इस व्यक्तिगत सत्याग्रह ने भी बहुत व्यापक रूप धारण कर लिया ।जगह-जगह लोग युद्ध-विरोधी प्रचार पर लगाये गये सरकारी प्रतिबन्धों को तोड़ कर जेल जाने लगे । सत्याग्रहियों की नामावली में से अंतिम चुनाव करने का काम बापू के लिए काका कर देते थे। हर रोज ढेर सारे नाम उनके सामने आते थे। उनमें से जो नाम परिचित थे,उनके सम्बन्ध में अपने पूर्व के अनुभव के आधार पर और अपरिचित नामों के सम्बन्ध में उनको जो जानकारी नाम के साथ आती थी,उसके आधार पर काका को नाम पसन्द या नापसन्द करने पड़ते थे। इसीलिए बापू ने काका को आखिर तक व्यक्तिगत सत्याग्रह में शरीक नहीं होने दिया ।
इस व्यक्तिगत सत्याग्रह - आन्दोलन में भारत के सामान्य व्यक्तियों की असामान्यता और असामान्य माने गये व्यक्तियों की सामान्यता एक साथ प्रकट हो गयी । देश के कोने-कोने से बिलकुल अपरिचित लोग देश के लिए अपना घर-बार , खेती-बारी , जायदाद आदि छोड़कर जेल जाने को तैयार हो जाते थे और एक आदर्श सत्याग्रही के तौर पर जेल-जीवन बिताते थे । दूसरी तरफ शरम की खातिर या अपना नाम सत्याग्रहियों की सूची में शामिल कराने की खातिर ‘सत्याग्रही’ बने हुए प्रतिष्ठित और गण्यमान्य समझे जानेवाले नेता जेल में जाने के बाद एक सत्याग्रही के नाते तो छोड़ दीजिये , लेकिन सामान्य कैदियों के जितनी सभ्यता , मर्यादा या संस्कारिता का भी परिचय नहीं देते थे । यह देखकर बापू और काका के हृदय विदीर्ण हो जाते थे ।
आजादी की लड़ाई शुरु होने से पहले देश तमोगुण में सोया पड़ा था। शुरु के पचीस वर्षों में जो नेता भारत में कार्य कर रहे थे , वे जनता को उस महानिद्रा से जगाने के लिए रजोगुण का उपयोग करते थे । बापू ने रजोगुण पर सत्त्वगुण का रंग चढ़ाया ।फिर भी आन्दोलन से रजोगुण की छाप पूरी मिट नही गयी थी । अंग्रेजों को हटाकर देश को आजाद बनाना सारे देश का एक सर्वसामान्य ध्येय था ।उस ध्येय में रजोगुण की मात्रा काफी थी । लेकिन सत्याग्रह की नई पद्धति ने ‘ अपनी लड़ाई अंग्रेजों से नहीं , बल्कि अंग्रेजी शासन से है ‘ यह बात लोगों के सामने रखी ।और रजोगुण पर सत्त्वगुण का आवरण चढ़ाया । लेकिन इसको देश के विविध लोगों ने अपनी - अपनी हैसियत के अनुसार अपनाया। एक-दूसरे का हाथ देखकर हस्तरेखा का अध्ययन करना या छूटने की तिथियों का अन्दाज या बाजी लगाना, यह जेल में कुछ सत्याग्रहियों का ‘मूल उद्योग’ था , तो कुछ सत्याग्रहियों ने जेल को अध्ययन करने का अच्छा अवसर मानकर ज्ञानसागर में डुबकी लगायी । दूसरे कुछ लोगों ने जेल-यात्रा का काल चिन्तन-मनन के लिए उपयोग में लिया और गहरा चिन्तन किया । इस तरह के अध्ययन और चिन्तन में से ही सन १९२० से १९४७ के बीच भारत में उत्तम साहित्य लिखा गया । इस वांग्मय की तुलना कंस के कारागृह में जन्मे श्रीकृष्ण के साथ की जा सकती है ।
सन १९४० का व्यक्तिगत सत्याग्रह का अन्दोलन और सन १९४२ का ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन दोनों एक प्रकार से समुद्र-मन्थन जैसे आन्दोलन थे । इन आन्दोलनों के कारण भारत के मानव-महासागर का मन्थन हुआ । इस मन्थन में से अमृत भी निकला और गरल भी । स्वराज्य के बाद के इन बीस वर्षों में हम दोनों प्रकार के फलों का स्वाद ले रहे हैं।
इसी अरसे का एक प्रसंग है। बापू उस समय पश्चिमोत्तर सीमाप्रान्त के एबटाबाद गाँव में थे । काका ने एक दिन मुझसे कहा , ‘ आज तुझे एक ऐतिहासिक पत्र टाइप करना है ।’ बापू के अनेक पत्रों का ऐतिहासिक महत्त्व था,यह तो मैं जानता था। फिर भी काका खुद आकर इस तरह की प्रस्तावना करने लगे तो उस पत्र को देखने की उत्सुकता बढ़ी। बापू ने वह पत्र हिटलर के नाम लिखा था । हिटलर यनी उस समय की हिंसा-शक्त का,हिंसा की चरम सीमा का एक प्रतीक और बापू थे अहिंसा के अनन्य पुजारी। दुनिया को विश्व-युद्ध की कराल दाढ़ में न झोंकने की पत्र में आर्द्र हृदय से अपील की थी ।युद्ध की ज्वाला में वह पत्र हिटलर तक पहुँचा या नहीं,भगवान जाने ! लेकिन दैत्यतुल्य माने गये मनुष्य के चित्त में भी मानवता का अंश रहता ही है और उस अंश का स्पर्श करके उस मनुष्य को बदला जा सकता है। पृथ्वी पर कोई भी मनुष्य असाध्य नहीं है; यह एक सत्याग्रही के नाते बापू की दृढ़ श्रद्धा थी । उसी श्रद्धा को व्यक्त करने वाला यह पत्र था । इस पत्र के सम्बन्ध में जब अखबारों में टीका-टिप्पणी हुई, तब भारत के कुछ सयाने लोगों ने इसे एक पागलपन समझा था ।इन पचीस वर्षों में दुनिया की परिस्थिति का सन्दर्भ इतना बदल गया है कि जहाँ उन दिनों एक आजीवन अहिंसा के पुजारी की कलम से निकली शांति की अपील भी भारत के विद्वानों को पागलपन लगी थी , वहाँ आज पचीस वर्षों के बाद किसी साधारण व्यक्ति की शांति की अपील भी लोगों को रद्दी की टोकरी में फेंकने की चीज नहीं लगती है । बापू की विशेषता यही थी कि वे कम-से-कम पचीस साल के आगे का भविष्य देख सके थे ।
गत प्रविष्टी से आगे : यह कुटी बापू की कुटी के बगल में ही थी । १२ फुट चौड़ी और १२ फुट लम्बी जगह और एक बाथरूम ।इस कुटी में प्रार्थना - भूमि की ओर ४ फुट चौड़ा बरामदा था।इस कुटी के बगल में आश्रमवासियों के रहने के लिए एक बड़ा मकान ( आदिनिवास ) भी था । दूसरी ओर बापू कुटी और बा कुटी के बीच में बा के हाथ के लगाये तुलसी और मोगरा के पेड़ भी थे । हरिजन ‘सत्याग्रहियों’ ने लेटने के लिए बा का कमरा और बरामदा पसंद किया । बा के लिए रह गया बाथरूम ।
बापू ने बा से पूछा , ‘ इन लोगों ने तुम्हारा कमरा पसंद किया है । क्यों , इनको दिया जाय न ? ‘ प्रारम्भ में बा ने कुछ आनाकानी की । बापू ने सत्याग्रहियों की ओर से आग्रह किया। अंत में बा ने कहा , ‘ ये तो आपके लड़के हैं , अपनी झोपड़ी में ही जगह दे दीजिए न ? ‘ बापू ने हँसकर जवाब दिया , ‘ लेकिन मेरे लड़के तेरे लड़के भी तो हैं ? ‘ बा निरुत्तर हो गयीं और अपना कमरा इन ‘सत्याग्रहियों’ के लिए खाली कर दिया ।
यह ‘सत्याग्रह’ कुछ दिन चला और शायद नये सत्याग्रहियों के अभाव में समेट लिया गया। लेकिन तब तक उन्होंने बा के कमरे पर कब्जा कर रखा था । इनकी रहन-सहन में सफाई नहीं थी । बा ने वह सब चुपचाप सहन किया । इतना ही नहीं , आवश्यकता पड़ने पर उन लोगों को पीने के लिए पानी देतीं थीं और समय - समय पर खबर पूछ लेती थीं । एक बार खुद के लड़कों की तरह स्वीकार कर लेने के बाद वे चाहे जैसे भले-बुरे हों तो उसकी बा को परवाह नहीं थी । उनका कर्तव्य तो पुत्रों की स्नेहयुक्त सेवा करना ही था ।
आश्रम में भोजन परोसने का काम बापू करते थे । भोजन-सम्बन्धी अपने तरह-तरह के प्रयोगों की जानकारी वे मेहमानों को देते जाते । ‘ इस खाखरे (कड़ी पतली रोटी) में एक चम्मच सोड़ा डाला है , यह चटनी किस चीज की है जानते हो ? खाओगे , तब पता चलेगा।कडुवे नीम का कुडुवापन तो उसका गुण ही है न ? लहसुन रक्तचाप के लिए लाभदायी है ।’इत्यादि। परोसने में बा भी बापू की मदद करती थीं , लेकिन वह मक्खन , गुड़ या ऐसी ही कोई मीठी चीज परोसती थीं । उनके परोसने में हम बच्चों को विशेष मजा आता था । बाहर से कोई चीज भेंट के तौर पर आयी हो तो बा वह हमारे लिए बचाकर रखती थीं ।सफर में भी हम लोगों को भरपेट भोजन मिला या नहीं , इसकी बा चिन्ता रखती थीं ।
नयी - नयी चीज सीखने की हविस में बा को कभी बुढ़ापा छुआ नहीं। एक बालक के जितनी उत्सुकता से वह सीखने को तैयार रहती थीं । बा का अक्षर-ज्ञान मामूली था। इसलिए ज्ञान-विज्ञान के दरवाजे उनके लिए बन्द जैसे थे । बापू के साथ रहने में पढ़ाई का बड़ा मौका मिल सकता था यह बात सही है,लेकिन उनके साथ रहकर भी जड़ के जड़ रहे लोगों को भी मैंने देखा है । बा के बारे में यह बात नहीं थी । कुछ-न-कुछ नया सीखने के लिए उनका मन हमेशा ताजा था । एक बार मुझे नजदीक बुलाकर उन्होंने पूछा,’क्यों बाबला,तेरे आजकल कौन-कौन से वर्ग चल रहे हैं ? ” मैंने कहा , ‘ राजकुमारी अमृतकौर के पास अंग्रेजी और विज्ञान , भणसाळीकाका के पास अंग्रेजी का व्याकरण , मॊरिस फ्रीडमन के पास बढ़ईगिरी और रेखागणित तथा रामनारायण चौधरी के पास हिन्दी व्याकरण और रामायण पढ़ रहा हूँ । अंग्रेजी , गणित आदि विषय ऐसे थे , जिनमें बा की खास गति नहीं हो सकती थी। इसलिए उन्होंने मुझसे कहा , ‘ तू मुझे रामायण नहीं पढ़ायेगा ?’ मैं असमंजस में पड़ गया । मैंने कहा ,’मोटी बा , आप रामनारायणजी के पास ही पढ़िये न ?मैं तो नौसिखिया हूँ ।’ बा ने कहा ,’नहीं,नहीं, रामनारायण के पास तो समय होगा या नहीं,कह नहीं सकती।फिर कोई मुझे गुजराती में समझानेवाला तो चाहिए ? ऐसा कर। तू दिन में उनके पास जो सीखता है , वह मुझे शाम को सिखाता जा । मैं भी तो नौसिखिया ही हूँ न !’ फिर कुछ दिन तक रोज शाम को सत्तर साल की मोटी बा ने पन्द्रह वर्ष के बाबला से तुलसीकृत रामायण के पाठ लिये। एक बार बापू भी यह नाटक देख गये और अपनी मुस्कराहट द्वारा उन्होंने सम्मति प्रकट की । आज भी मैं जब रामचरितमानस खोलता हूँ , तब मेरे मानसपटल पर जगन्माता सीता के साथ-साथ जगदंबा कस्तूरबा की वह भक्तिमयी निर्मल मूर्ति विराजमान हो जाती है ।

