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प्रिय चिट्ठेकार अभय त्रिपाठी ने ‘खूबसूरत’-से निर्मल-आनन्द अन्दाज में टोका था, “फिल्मी गीतों का बुझौव्वल ‘शैशव’ पर क्यो देते हो ? ” मुझे लगा उनका बिल्लू जिन दृश्यों के लावण्य से किंकर्तव्य्विमूढ़ हो सकता है तो जरूर फिल्मी गाने भी सुनता होगा ,कभी कदाच हॉल ( गुजरातियों या मालवा के लोग जिसे ‘होल’ कहेंगे । ) में अद्धा टिकट पर आधी फिलम भी देख ली होगी , तो अचरज नहीं । लेकिन अभयजी ने हमें जिस भावना से टोका था उसको बहुत जल्दी नजरअन्दाज कर रहा हूँ ! दुनिया के बच्चे माफ़ करें ।
काहे , भाई ? इसलिए ‘शैशव’ चुना है कि हमारे ‘अप्रिय’ निर्णय वाले प्रिय दोस्त अनूप ने हमे बचकाना कह दिया । सही कहा कि नाराज नहीं होंगे।हम ने कहा कि ऊ औ देबासीस जयपरकास नीयर हैं लेकिन उसको बाबा विनोबे का रोल पसन्द है । बाबो कहते थे , ‘गाँधी ने आजादी की एक व्याख्या की थी - आजादी मतलब ग़लतियाँ करने का हक’ । तब बाबा को करे दो गलती ! त भाई , गलतिया खाली आपै करेंगे ? कोई गलती करेगा तो सुधरेगा भी नहीं ?
ई अप्रिय निर्णय वाला हमारा प्रिय अनूप का ए गो किस्सा सुनिए,बचपन का नहीं ,’छोटी जवानी’ का( १९८५ का होगा) :
प्रौद्योगिकी संस्थान , काशी विश्वविद्यालय के एम टेक. के छात्र अनूप और सांख्यिकी के शोध छात्र हम । छात्रसंघ चुनाव में समता युवजन सभा का उम्मीदवार मैं और प्रौद्योगिकी संस्थान में हम्मे लड़ावे वाला मुख्य साथी लोगन में एक अनूप । आदर्शवादी तरुण ।
सयुस का चुनाव लड़े का ढ़ंग अलग , लड़ावे वाले अलग ढंग के , नारा भी अलगै होता था । दूसरा सब का मोटर साइकिल जुलूस निकले तो हमिनी का साइकिल जुलूस । तब देखा-देखी और लोग भी साइकिल जुलूस का कोसिस किए।बड़ा-बड़ा लाद वाले मनोज सिन्हा ( बाद में सांसद गाजीपुर ) , वीरेन्द्र सिंह जिनको चंचल कुमार वीरेन्द्र सिंह ‘पोतेदार’ कहता था ( इन्दिराजी वाले पोतेदार की नकल में नहीं,’जस नाम तस गुन’ के नाते) आदि । तबका हमहने क साथी ओमपरकसवा ( अभी प्रोफ़ेसर पत्रकारिता , काशी विद्यापीठ) नारा बनाया , ‘सयुस की साइकिल देखी , सबने मोटरसाइकिल फेंकी ‘ । चिढ़ जाँए सब,’सरवा एक तो साइकिल पे चढ़वाया , अब सब मजा ले रहा है ।
पोस्टरवा भी हाथे का बना रहता था । छपलका नहीं । कौनो साथी रमन हॉस्टल(इंजीनियरिंग वाले लैकों के दस में से एक हॉस्टल) के नोटिस बोर्डे पर हमारा पोस्टर साट दिया ।गलत जगह साटा।पोस्टरवा से नोटिस तोपा जाएगी। हॉस्टल में प्रतिक्रिया शुरु हो गई । मैं पहुँचा तो मुझे बुलाकर बन्द कमरे में समझाया गया कि आप खुद अपने हाथ से उसे उखाड़िएगा , दिनवे में । तो भैय्या अपने पोस्टर अपने हाथ से उखड़वाये अनूप और साथी , आपत्तिजनको नहीं था । पोस्टरवा निकाले , माहौल बन गया । इन्जीनियरिंग कॉलेज , दृश्य कला संकाय , महिला महाविद्यालय और चिकित्सा विज्ञान संस्थान में तो एक साल पहिले ही नं १ पर रहे - फिर चँप गया माहौल।
मेरे भाई अनूप ,पोस्टरवा (चिट्ठा की प्रविष्टी) फिर हट चुका ,अबकि आपत्तिजनक था तो माफ़ी भी माँग लिया, लेखक ।अब फिर माहौल काहे नहीं बना पाए ?
शिकायतकर्ता का हाल सुनने के पहले एक कनपुरिया किस्सा और एक कनपुरिया कहावत ।
कानपुर के झकरकटी मोहल्ले में गधैय्या गोल में एक माट साहब थे । हिन्दी वर्णमाला लिखने के बाद ,एक -एक अक्षर पर छड़ी ले जा कर शुरु हो जाते , ” त” . ” ख” , ” ग “….
फिर लड़कों से पहिला अक्षर दिखा के बोलें ” बोलो ,- ’त “
लड़के कहें , ” त”
माट साहब फिर कहें ” बोलो ” त” (जोर दे कर )
लड़के फिर कहें , ” त ” जोर लगा कर ।
अब माट साहब का सब्र छूटने लगा तब बिगड़ कर बोले , ” हम चाहे जौन तहें तुम तहो - ” त “
तुतलाने वाले माट साहब के चेलों को यह झेलना पड़ता है।
कहावत का निर्मान हुआ होगा कानपुर के भन्नानापुरवा में । एक सज्जन थे, मकुन्द(इस्कूल में भले मुकुन्द रहे हों ) । जिनके पास एक घोड़ी ( भई असली किस्से में तो घोड़ी ही थी , चेला नहीं।हम अपनी तरफ़ से छेड़-छाड़ नहीं करते। ) । दोनों की एक जरूरी काम की आदत समान थी। इस समानता पर कनपुरिया कहावत का जन्म हुआ ,
जस मकुन्द , तस पादन घोड़ी
अब आईं रामचेलवा पर । तब दूनो किस्सवा क्लीयर हो जाएगा । सृजन शिल्पी की धार्मिक आस्था पर चोट के सवाल पर कुल कर-कानून , नर-नियम गिना के मोहल्ला पर प्रतिबन्ध का माँग किए थे , तब भाई सृजन की पोस्ट पर का कहे थे, शिकायतकर्ता -
” का मेरे भाई ? शिकायतकर्ता-cum(कम)-संचालक-ज्यादा अब उद्देश्य बदल गया , राहुल का चिट्ठा हटाओ हो गया ? अपने शिकायत पे, खुदे विचार किया ? ओदा पारी हमरा संगी अनूप पूछे रहा, ‘संचालक मण्डल के लिए नाम सुझाओ’ । हम सिधाई में सुझाव दे दिए- मैथिली ,प्रियंकर ।
एक दाईं बड़ा सराफत से पूछा सिकायतकर्ता,’अफ़लातूनजी इतना आपराधिक मुकदमा?’ मेरे भाई ,ऊहो छात्र-संघ बहालिए का लड़ाई था,लोकतंत्र बहालीइए न हुआ ,ऊ लड़ाई भी ? जब आजीवन निस्कासन के पहले जो जाँच बैठा तो जाँच की कमीटी बदलावा दिए ,कानून बता के। ओही से पूछते हैं, अपना सिकायत पर खुदे विचार किए क्या?
चिट्ठा हटाने , गलती पर खेद प्रकाश ए पर भी एगो किस्सा याद आता है,जनेवि(जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) का । पहिला अनिश्चितकालीन बन्दी( जनेवि छात्रसंघ के अध्यक्ष हमरे संगठन का रहे - नलिनीरंजन मोहान्ती तब) के बाद जब कुल कम्युनिस्टी( मुख्यधारा वाले, प्र.छा.स. नहीं ) माफी माँग-माँग अन्दर हो गया तब सयुस के साथी अटल बिहारी शर्मा से कुलपतिया कहा ,’लिख कर दे दो अनुशासनहीनता नहीं करूँगा,भविष्य में।निष्कासन वापस हो जाएगा ।” अटल टप्प से कहा ,”आप भी लिख कर दे दीजिए कि भविष्य में बलात्कार नहीं करेंगे ।”
भाई चिट्ठाकारी में ई सीखे कि चैटियाने , ईमेल औ फोन का उद्धरण मत दो। चिट्ठा से जेतना मन दो । लेकिन अनूप एका पालन ऐलानिया नहीं किए । हम तब्बो चैट ,फोन औ मेलामेली का उद्धरण नहीं देंगे ।
हमरे लिए हार्दिक वेदना का बात है कि धुरविरोधी भाई अपना चिट्ठा को खतम कर दिए । लोकतंत्र सेनानी रहे , धुरविरोधी भाई । हम्मे पूरा विस्वास है, पूरा तेवर के साथ लौटेंगे , जल्दिए । इस कदम पर कहता है सब - व्यक्तिगत निर्णय है । अरे तो का नारद संचालक(समूह) (सामूहिक निर्णय) ई कह सकता है का, ‘कि चिट्ठेवे खतम कर दो ?’ औ छुआछूत व्यक्तिगत आचार है कि सामाजिक बीमारी ? कई सनातनी ई मानें कि छुआछूत निजी मामला है | गाँधी काहे बीच में पड़ता है?छुआछूत ,सेन्सर,तानासाही ई सब व्यक्तिगत मामला न होता है। व्यक्ति प्रतिकार में कदम जरूर उठाते हैं।जैसे ५ जून १९७४ को,पटना की गाँधी मैदान में रेणू और नागार्जुन सरकारी सम्मान लौटा दिए,जेपी की विशाल सभा में -ईहो लैकपने वाला बात हो गया ?
छोड़ के जाए वाले अच्छा-अच्छा चिट्ठाकार सब को कौन रोकेगा ? औ ऊ साथी लोग से भी कहेंगे राहुलजी का गीत भुला गए साथी ? ” भागो मत,दुनिया को बदलो” । प्रमेन्द्र , मेरे मित्र , बताओ कौन राहुलजी ? जौने लैका का चिट्ठा हटा है , ऊहे राहुल ? बौद्धिकवा में चाहे शखवा में ई गीत न सुनोगे । ई महापण्डित राहुल सांकृत्यायन का लिखा गीत है ।
ई कहेंगे ,छोड़ के जाए का मन बनाए साथी- सब से कि , कहते हो मोहल्ला के पहले साम्प्रदायिकता को ले कर चिट्ठालोक में बहस नहीं थी तो लगेगा गलतफहमी में जा रहे हो। पूछो सागर से,प्रमेन्द्र से,बेंगाणी से? मतभेद था जम के लड़ाई भी था,मनभेद नहीं था ।
साथियों व्यंग्य लिखना आसान नहीं , पद्य में पैरोडी लिखना शायद आसान है। अनूप ने राजन की एक कविता पर एक पैरोड़ी टिप्पणी में भेजी।हमें लगा कि अनूप के स्तर की नहीं तो रोक लिए। कह देगा , “नहीं, हमारा ईहे स्तर है” तो छाप देंगे ।
कहा अफलातुनवा ‘सब से तेज’ चैनल बने के चक्कर में है । परचा लिखे वाला , पोस्टर साटे वाला , क्लास लेवे वाला को चैनल मान लिए - और कोई जाने न जाने तूं तो जानते रहे । भाई ई मामला में सरकारी चैनल, जेके सब से ज्यादा लोग देखेला ,फुरसतिया स्वयंभू है ,जे सरकारी पक्ष सब के समझावे की कोसिस करेले । कुछ जिम्मेदरियो निभावे । मकुन्द को अपनी आदत के अलावा भी कुछ करना होगा।
इसलिए चिट्ठाकारों के मंच नारद से अपील करूँगा कि सामूहिकता ,सद्भावना और सहिष्णुता को प्रकट करते हुए अब भी कुछ सोचें । कुछ संचालन प्रक्रिया को लोकतांत्रिक बनाएँ । यह शंका तो हटा ही लें कि कोई आपका स्थान तुरन्ते छीन लेगा । ई डर भी हर मेल के तानासाह को सताता है ,तब्बे ऊ हो डेरवाता है ,अन्याय करता है। अब बीस सूत्री कार्यक्रम का भी घोषणा कर दीजिए,इन्दिराजी की थी और हिटलर भी ।
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