Archive for the 'छोटी जवानी' Category

चौराहे पर रुकने की बात : कविताएँ

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एक छोटी-सी बात

अनकही ।

अभी - अभी नहीं सूझी -

लेकिन दबी रही ।

साथ चलने की बात -

दूर तक साथ चलने की बात

या

क़रीब ही कहीं जा कर,

साथ बैठ जाने की बात

जताने की बात

और जानने की बात,

पिछड़ने या बढ़ने की बात,

एक चौराहे की बात ।

चौराहे से

बाहों की तरह निकले अलग-अलग रास्ते।

एक ही रास्ते पर चलते वक्त हो सकती है

पिछड़ने या बढ़ने की बात।

चौराहे पर रुकने की बात ॥

तुम से सारी कवितायें

कह रही हैं-

‘ सह रही हैं हम

तुम्हारा बोझ ,

तुम्हे हल्का किया है-

तुम्हारे साथ बह कर ।

बेतुकी में हैं तुम्हारे साथ

हाथ दे कर तुक भरा।’

क्या ऐसे ही होते हैं दोस्त ?

एक बहुत विशेष बात-

कहूँ ? या समझ ही गयी ?

शायद बात कहने की

हो ही नहीं-

समझ लेने की ही हो !

भूलने की हो ही नहीं-

समझे रहने की ही हो?!

कभी-कभी बेसमझियाँ

समझ ने लगती हैं-

इस विशेष बात को।

अनकहे से हो जाते हैं-

वो एक-एक पल ।

और बाद में-

वो एक-एक पल

नासमझी के,

एक-एक कहानी

बन कर-

पुख़्ता कर देते हैं-

ऐसी कहानियों को

खुद से ही सुना करने की-

इस पुरानी हो चली आदत को ।

तुमसे इजाजत कभी न माँगी

अपने ख्वाबों में तुम्हें खींचने के ।

क्या नाली ने कभी माँगी है इजाजत-

मुहाने पर उगे,

फूल के खूबसूरत पौधे से-

उसे सींचने की ?

उन प्यारी बातों की याद

क्यों न बने

इस वीरान और बंजर की खाद ?

फिर न मिलें शायद जो पल,

बन जाँए जल ।

अब मुझे उस पक्षी का इन्तेजार है न ?

जो वीराना देख

खुशी-खुशी निपटेगा ,

और निपटेगा बीज,

तब कहीं हट पाएगी वह खीज

-जिसका इस बंजर पर राज है ।

[ १९८० से -८२ के बीच लिखी थीं ]

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