टहनी पे किसी शजर* की तनहा
बुलबुल था कोई उदास बैठा
कहता था की रात सर पे आई
उड़ने चुगने में दिन गुज़ारा
पहुँचूँ किसी तरह आशियाँ* तक
हर चीज़ पे छा गया अन्धेरा
सुनकर बुलबुल की आहो ज़ारी*
जुगनू कोई पास ही से बोला
हाज़िर हूँ मदद को जानो-दिल से
कीड़ा हूँ अगरचे मैं ज़रा-सा
क्या गम है जो रात है अंधेरी
मैं राह में रौशनी करूंगा
अलाह ने दी है मुझको मशआल
चमका के मुझे दिया बनाया
हैं लोग वही जहां में अच्छे
आते हैं जो काम दूसरों के
- अल्लामा इकबाल
[ शजर = पेड़ , आशियाँ = घोंसला , आहो ज़ारी = रोना-चिल्लाना ]


शब्दों को देखें तो बच्चों के लिए नहीं लगती. बाकी ठीक है.
जुगनू की यह सीख सीखने लायक है।
इकबाल की यह रचना बेहतरीन है, और शायद उन दिनों के हिसाब से बोधगम्य भी । इस पंक्ति से सहज क्या होगा, और अर्थपूर्ण भी -
“हैं लोग वही जहां में अच्छे
आते हैं जो काम दूसरों के”
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