अल्लामा इकबाल : बच्चों के लिए (३) : हमदर्दी

टहनी पे किसी शजर* की तनहा
बुलबुल था कोई उदास बैठा
 
कहता था की रात सर पे आई
उड़ने चुगने में दिन गुज़ारा
 
पहुँचूँ किसी तरह आशियाँ* तक
हर चीज़ पे छा गया अन्धेरा
 
सुनकर बुलबुल की आहो ज़ारी*
जुगनू कोई पास ही से बोला
 
हाज़िर हूँ मदद को जानो-दिल से
कीड़ा हूँ अगरचे मैं ज़रा-सा
 
क्या गम है जो रात है अंधेरी
मैं राह में रौशनी करूंगा
 
अलाह ने दी है मुझको मशआल
चमका के मुझे दिया बनाया
 
हैं लोग वही जहां में अच्छे
आते हैं जो काम दूसरों के
 
- अल्लामा इकबाल
 
[ शजर = पेड़ , आशियाँ = घोंसला , आहो ज़ारी = रोना-चिल्लाना ]

4s टिप्पणियाँ

Filed under अल्लामा इकबाल, hindi, hindi poems, nursery rhymes , kids' poetry, poem

4 Responses to अल्लामा इकबाल : बच्चों के लिए (३) : हमदर्दी

  1. शब्दों को देखें तो बच्चों के लिए नहीं लगती. बाकी ठीक है.

  2. जुगनू की यह सीख सीखने लायक है।

  3. इकबाल की यह रचना बेहतरीन है, और शायद उन दिनों के हिसाब से बोधगम्य भी । इस पंक्ति से सहज क्या होगा, और अर्थपूर्ण भी -
    “हैं लोग वही जहां में अच्छे
    आते हैं जो काम दूसरों के”

  4. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टॉप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

Gravatar
WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Connecting to %s