[ बचपन में स्कूल में अल्लामा इकबाल की तीन कवितायें सीखी थीं | 'जुगनू' काफी पहले दे चुका हूँ , इसी चिट्ठे पर | 'बच्चे की दुआ ' को आगाज़ में प्रस्तुत करूंगा , हालांकि तरन्नुम में जो क्लिप मिली है उसकी तर्ज जुदा है | आज यहाँ पेश है 'परिंदे की फ़रियाद ' | उम्मीद है स्कूली बच्चों को यह सिखाई जाएगी | ]
परिंदे की फ़रियाद
आता है याद मुझको गुजरा हुआ ज़माना
वह बाग़ की बहारें , वह सबका चहचहाना
आज़ादियाँ कहां वह अपने घोंसले की
अपनी ख़ुशी से आना , अपनी से जाना
लगती है चोट दिल पे , आता है याद जिस दम
शबनम के आंसुओं पर कलियों का मुस्कुराना
वह प्यारी – प्यारी सूरत , वह कामिनी-सी मूरत
आबाद जिसके दम से था मेरा आशियाना*
आती नहीं सदायें* उसकी मेरी कफस* में
होती मेरी रिहाई ऐ काश ! मेरे बस में
क्या बदनसीब हूं मैं , घर को तरस रहा हूं
साथी तो हैं वतन में , मैं कैद में पडा हूं
आई बहार, कलियां फूलों की हंस रही हैं
मैं इस अंधेरे घर में किस्मत को रहा हूं
इस कैद का इलाही ! दुखड़ा किसे सुनाऊं
डर है यही कफस में मैं गम से मर न जाऊं
जब से चमन छुटा है यह हाल हो गया है
दिल गम को खा रहा है , गम दिल को खा रहा है
गाना इसे समझ के खुश हों न सुनने वाले
दुखते हुए दिलों की फ़रियाद यह सदा* है
आज़ाद मुझको कर दे ओ कैद करनेवाले !
मैं बेज़बां हूँ कैदी , तू छोड़कर दूआ ले
- अल्लामा इकबाल
[ आशियाना = घोंसला , सदाएं = आवाजें , कफस = पिंजरा , सदा = आवाज , बेज़बां =गूंगा ]



11 Comments
November 30, 2009 at 1:02 pm
i am searching this poem from last one year.but i find it here. thanks for share this poem
November 30, 2009 at 5:36 pm
आपका आभार!!
November 30, 2009 at 6:23 pm
बहुत अच्छी अभिव्यक्ति है शुभकामनायें
November 30, 2009 at 6:24 pm
बहुत अच्छी अभिव्यक्ति है बधाई
November 30, 2009 at 7:48 pm
nice
November 30, 2009 at 8:04 pm
बेहतरीन…
बच्चों को सुनाई, बेहद पसंद आई….
November 30, 2009 at 10:40 pm
मेरी पसन्दीदा नज़्म, जनाब आप ने बड़ी बेहतरीन चीज़ पेश की है
December 1, 2009 at 2:33 am
पक्षियों को पिज़ड़ों में कैद करने वालों को जरूर सुननी चाहिए ये नज़्म
December 1, 2009 at 12:49 pm
श्रीमान, ये विचार तो आप से ही लिया है, आप की पोस्ट पढ़कर।
इसके लिये आपका शुक्रिया। आप के सुझाव चाहिए
December 4, 2009 at 12:26 pm
क्या बात है !
गुलामी और परवशता में सुख कहां . ऐसी ही एक कविता शिवमंगल सिंह सुमन की है :
हम पंछी उन्मुक्त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाएंगे
कनक-तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाएंगे ।
हम बहता जल पीनेवाले
मर जाएंगे भूखे-प्यासे,
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक-कटोरी की मैदा से ।
स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में
अपनी गति, उड़ान सब भूले
बस सपनों में देख रहे हैं
तरु की फुनगी पर के झूले ।
ऐसे थे अरमान कि उड़ते
नील गगन की सीमा पाने
लाल किरण-सी चोंच खोल
चुगते तारक-अनार के दाने ।
होती सीमाहीन क्षितिज से
इन पंखों की होड़ा-होड़ी,
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
या तनती साँसों की डोरी ।
नीड़ न दो, चाहे टहनी का
आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो
लेकिन पंख दिए हैं, तो
आकुल उड़ान में विघ्न न डालो ।
*****
January 27, 2010 at 6:56 pm
बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना ….