November 30, 2009...12:45 pm

अल्लामा इकबाल : बच्चो के लिए (2) : परिंदे की फ़रियाद

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[ बचपन  में स्कूल में अल्लामा इकबाल की तीन  कवितायें सीखी थीं | 'जुगनू' काफी पहले दे चुका हूँ , इसी चिट्ठे पर | 'बच्चे की दुआ ' को आगाज़ में प्रस्तुत करूंगा , हालांकि तरन्नुम में जो क्लिप मिली है उसकी तर्ज जुदा है | आज यहाँ पेश है 'परिंदे की फ़रियाद ' | उम्मीद है स्कूली बच्चों को यह सिखाई जाएगी | ]

परिंदे की फ़रियाद

आता है याद मुझको गुजरा हुआ ज़माना
वह बाग़ की बहारें  , वह सबका चहचहाना

आज़ादियाँ कहां वह अपने घोंसले की
अपनी ख़ुशी से आना , अपनी से जाना
लगती है चोट दिल पे , आता है याद जिस दम
शबनम के आंसुओं  पर कलियों का मुस्कुराना
वह प्यारी – प्यारी सूरत , वह कामिनी-सी मूरत
आबाद जिसके दम से था मेरा आशियाना*
आती नहीं सदायें* उसकी मेरी कफस* में
होती मेरी रिहाई  ऐ काश ! मेरे बस में
क्या बदनसीब हूं मैं , घर को तरस रहा हूं
साथी तो हैं वतन में , मैं कैद में पडा  हूं
आई बहार, कलियां फूलों की हंस रही हैं
मैं इस अंधेरे घर में किस्मत को रहा हूं
इस कैद का इलाही ! दुखड़ा किसे सुनाऊं
डर है  यही कफस में मैं गम से मर न जाऊं
जब से चमन छुटा है यह हाल हो गया है
दिल गम को खा रहा है , गम दिल को खा रहा है
गाना इसे समझ के खुश हों न सुनने वाले
दुखते हुए दिलों की फ़रियाद यह सदा* है
आज़ाद मुझको कर दे ओ कैद करनेवाले !
मैं बेज़बां हूँ कैदी , तू छोड़कर दूआ ले
- अल्लामा इकबाल

[ आशियाना = घोंसला   , सदाएं = आवाजें , कफस = पिंजरा  , सदा = आवाज , बेज़बां =गूंगा ]

 


11 Comments

  • i am searching this poem from last one year.but i find it here. thanks for share this poem

  • बहुत अच्छी अभिव्यक्ति है शुभकामनायें

  • बहुत अच्छी अभिव्यक्ति है बधाई

  • बेहतरीन…
    बच्चों को सुनाई, बेहद पसंद आई….

  • मेरी पसन्दीदा नज़्म, जनाब आप ने बड़ी बेहतरीन चीज़ पेश की है

  • पक्षियों को पिज़ड़ों में कैद करने वालों को जरूर सुननी चाहिए ये नज़्म

  • श्रीमान, ये विचार तो आप से ही लिया है, आप की पोस्ट पढ़कर।
    इसके लिये आपका शुक्रिया। आप के सुझाव चाहिए

  • क्या बात है !

    गुलामी और परवशता में सुख कहां . ऐसी ही एक कविता शिवमंगल सिंह सुमन की है :

    हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के
    पिंजरबद्ध न गा पाएंगे
    कनक-तीलियों से टकराकर
    पुलकित पंख टूट जाएंगे ।

    हम बहता जल पीनेवाले
    मर जाएंगे भूखे-प्‍यासे,
    कहीं भली है कटुक निबोरी
    कनक-कटोरी की मैदा से ।

    स्‍वर्ण-श्रृंखला के बंधन में
    अपनी गति, उड़ान सब भूले
    बस सपनों में देख रहे हैं
    तरु की फुनगी पर के झूले ।

    ऐसे थे अरमान कि उड़ते
    नील गगन की सीमा पाने
    लाल किरण-सी चोंच खोल
    चुगते तारक-अनार के दाने ।

    होती सीमाहीन क्षितिज से
    इन पंखों की होड़ा-होड़ी,
    या तो क्षितिज मिलन बन जाता
    या तनती साँसों की डोरी ।

    नीड़ न दो, चाहे टहनी का
    आश्रय छिन्‍न-भिन्‍न कर डालो
    लेकिन पंख दिए हैं, तो
    आकुल उड़ान में विघ्‍न न डालो ।
    *****

  • बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना ….


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