१९९२ के दौर में वाराणसी के तीन भिन्न – भिन्न विचारधाराओं से जुड़े़ तीन समूहों ने महसूस किया था कि साम्प्रदायिकता के बारे में एक समझदारी बना कर साथ – साथ लोगों के बीच जाना होगा । समझदारी बनाने के क्रम में हमने तीन लम्बे सत्रों में चर्चा की तथा साझा समझदारी के आधार पर एक परचा तैयार किया ।
पिछले दिनों ब्लॉग जगत में साम्प्रदायिक आधार पर परस्पर वैमनस्य फैलाने वाली पोस्टों की बाढ़ आई हुई है । मैंने १९९२ में प्रकाशित उपर्युक्त परचे को अपने ब्लॉग में दो हिस्सों में छापा । परचे की खूबी लाजमी तौर पर यह थी कि गैर साम्प्रदायिक बहुमत को वह पसन्द आता तथा फिरकापरस्ती पर जिन्दा लोगों को उससे परेशानी होती । ब्लॉग जगत में ऐसा ही हुआ। १३ लोगों की कुल १४ टिप्पणियाँ आईं । ७ टिप्पणीकर्ता परचे की बातों से पूरी तरह सहमत थे और ६ के गले में बातें उतरने में दिक्कत हो रही थी । अनिल पुसादकर की टिप्पणी ने मुझे भाव विह्वल कर दिया । रामकुमार अंकुश , दिनेश द्विवेदी ,रवि कुमार , वीरेन्द्र जैन ,लोकसंघर्ष और निर्मला कपिला ने इस विषय पर सहज सामान्य समझदारी से मानो देश की समझदारी की नुमाईन्दगी की ।
हमारी बात चिपलूणकर और सलीम खान जैसे ६ पाठकों के गले उतरने में दिक्कत हो रही थी शायद उन्हें मरचा लग रहा था । उस परचे का मुकाबला करने में सलीम खान ने कहा,’सुरेश चिपलूणकर के पहले दो पैरा से सहमत.’ इस तरह की सहमती का जिक्र कहानियों और नाटकों में पढ़ते वक्त मुझे अतिरंजना लगती थी लेकिन ऐसा सोचना गलत था ।
राही मासूम रजा की एक कहानी में मस्जिद के आहाते में सूअर का गोश्त डालने वाले मुस्लिम अपराधी और मन्दिर में गोमांस डालने वाले हिन्दू अपराधी का भी जिक्र चौंकाता है लेकिन जिन्हें साम्प्रदायिकता की आग लगानी होती है वे यह सब भी कर सकते हैं । एक बार मेरी एक ही पोस्ट पर ’रमेश’ और ’पीटर ’ ने एक ही IP पते से टिप्पणियाँ की थीं ।
ओड़िया में एक कहावत है : माँ कहती है , ’ रसोई घर में कौन है ?’ बेटा जवाब देता है , ’ मैंने केला नहीं खाया’ ।
अब हम आते हैं कांग्रेस की साम्प्रदायिकता की बाबत । कांग्रेस द्वारा साम्प्रदायिक उन्माद के आधार पर सबसे बड़ी चुनावी सफलता इन्दिराजी की हत्या के बाद हुए चुनावों में हासिल की गई थी। राजीव गांधी ने भिण्डरावाले को पंजाब के किसान आन्दोलन और अकालियों के मुकाबले खड़ा करने के लिए ’सन्त’ का दरजा दिया । भिण्डरावाले द्वारा हिन्दुओं के विरुद्ध तमाम विष वमन के बावजूद पंजाब में सिखों द्वारा हिन्दू विरोधी दंगे नहीं हुए । हरमन्दर साहब में फौज भेज कर इन्दिरा गांधी ने अटल बिहारी सरीखों की वाहवाही पाई वहीं सिखों के हृदय पर एक गहरा जख़्म लगाया । इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस ने पूरे सिख समुदाय को ’गद्दार’ कहते हुए चुनाव लड़ा । पूरे देश में निर्दोष सिखों की हत्याएं हुई और उनके व्यापारिक प्रतिष्ठान लूटे गये।पहली बार प्रचार में लाई गई विदेशी कम्पनी रीडिफ़्यूजन के पूरे पन्ने के विज्ञापनों में कहा जाता ,’क्या आप चाहते हैं कि देश की सीमायें आप के घर की चाहरदीवारी तक सिकुड़ जाएं?’ इस चुनाव में कांग्रेस के अब तक के सर्वाधिक बड़े बहुमत(करीब अस्सी फीसदी सीतें) से जीती । भारतीय जनता पार्टी(जिसमें जन संघ पृष्टभूमि के लोग शामिल थे) लोक सभा में मात्र दो सीटें जीत पाई । पता चला कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को उस चुनाव में लगा कि ’हिन्दू हित’ तो कांग्रेस देख रही है । पूरे देश में ’अपनेजी’ लोगों को ’आदेश-निर्देश’ दे दिए गए ! पहले आम चुनावों से जम्मू की जिन सीटों पर हमेशा जनसंघ जीतती आई थी वहाँ भी कांग्रेस जीती । यह है मौसेरे भाइयों का रिश्ता ।
१९६७ में डॉ. लोहिया ने कहा था कि भाकपा की एक पहाड़ गद्दारी से कांग्रेस की एक बूँद गद्दारी और जनसंघ की एक पहाड़ फिरकापरस्ती से कांग्रेस की एक बूँद फ़िरकापरस्ती ज्यादा ख़तरनाक है क्योंकि वह सत्ता में है ।
कुछ लोग बहुसंख्यकों का मानो ठीका लिए हुए हैं और हमारे मित्र संजय बेंगाणी की तरह कहते हैं,’ जिम्मेदारी मात्र बहुसंख्यकों के सर डाली जा रही है.’(’ जब मार पड़ी शमशेरन की तो कहें, ’ महाराज मैं नाऊ’ की तरह कभी संजय जैन भी हो जाता है) दरअसल देश की गंगा जमुनी तहजीब में यक़ीन रखने वाले बहुसंख्यक समुदाय को इन बातों को समझने में दिक्कत नहीं होती है वे इसे आत्मसात किए हुए है। देश में फिरकापरस्तों का जो अल्पमत है उसे जरूर दिक्कत आती है , चाहे वे खुद को हिन्दू कहने का दावा करते हों अथवा मुसलिम ।
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9 Comments
October 11, 2009 at 5:53 pm
जिन लोगों के गले में धर्म के ढोल टंगे हुए हैं. वे कहीं न कहीं किसी राजनीतिक दल से जुड़े हुए हैं या धार्मिक गुटबंदी और फिरकापरस्ती के शिकार हैं…
October 11, 2009 at 7:24 pm
सांप्रदायिकता भारतीय समाज के लिए सबसे घातक विष है . एक ओर इसे फैलाने वाले हैं तो दूसरी ओर कुछ ऐसे संगठन भी हैं जो लगातार इस खतरे के स्वरूप की सूक्ष्म जांच-पड़ताल कर वस्तुनिष्ठ आचार-विचार का ’एंटी वेनम’ देते रहते हैं . सावधान रहना और सावधान करते रहना सबसे ज़ुरूरी काम है जो आप बखूबी कर रहे हैं . लोहिया जी का कथन कितना सच्चा और दूरअंदेशी से भरा था, इसे आज उनके आलोचक भी समझ पा रहे हैं .
इधर नेट पर सांप्रदायिक प्रचार बढा है . शुरुआती दौर में सांप्रदायिकता के मुद्दे पर ज्यादा उत्साह दिखाने वाले दूसरी शोशेबाजी में सुख पा रहे हैं . ऐसी विकट स्थिति में यह जिम्मेदारी आप बखूबी निभा रहे हैं . आभार !
October 11, 2009 at 8:48 pm
मर्ज़ बढता ही है ज्यों ज्यों दवा करो।
October 11, 2009 at 11:03 pm
nice
October 12, 2009 at 8:48 am
@भिण्डरावाले द्वारा हिन्दुओं के विरुद्ध तमाम विष वमन के बावजूद पंजाब में सिखों द्वारा हिन्दू विरोधी दंगे नहीं हुए ?????
what is your age kid ?
October 12, 2009 at 8:53 am
मुनीश दद्दा,
मैं ५० का हूँ । आतंकी हिन्सा और दंगों में आप जैसे बुढ़ऊ फर्क समझते होंगे ? पता नहीं ।
October 12, 2009 at 10:30 am
chitthakarita mein aajkal jo ho raha hai,usey dekhte huye aapne samay v sthiti ko dekhte huye bahut sahi v aavashyak kaam kiya hai.
Anil ji se mai sahmat hun. atma aalochana karne ke unke saahas ko salaam. jo ve kah rahe hain veh merey liye bhi sach hai.
shayad kuchh lekh likhe hi isliye jaate hain ki hum jaise log bhi sanyyam kho dalen. phir aap jaise log punah jagrit kar hamein hamari galati ka aabhas kara detey hain. aabhaar.
roman lipi ke liye kshama yaachana sahit.
ghughuti basuti
October 12, 2009 at 10:48 am
मेरे हिन्दु या जैन होने पर जो भ्रम है उसका मैं कुछ नहीं कर सकता. मैं जन्म से जैन हूँ. खुद को हिन्दु मानता हूँ.
रही बात साम्प्रदायिकता की तो पता है कौन साम्प्रदायिक है.
आज हर कोई स्वर्ण-मन्दीर की कार्यवाही को गलत मनते हो, मैं मानता हूँ, देशद्रोही जहाँ देश के विरूद्ध षड्यंत्र करते हो उस जगह को उड़ा दो, चाहे वह राम का मन्दीर ही क्यों न हो.
भारत से बड़ा कोई नहीं, धर्म निरपेक्षता भी नहीं.
October 12, 2009 at 11:45 am
आपके ही शब्द रिपीट… “जनसंघ की एक पहाड़ फिरकापरस्ती से कांग्रेस की एक बूँद फ़िरकापरस्ती ज्यादा ख़तरनाक है क्योंकि वह सत्ता में है…”, ज़रा एक बार कोलकाता के रिज़वान शेख और कश्मीर के रजनीश मामले की तुलना कर लीजिये सर… आप तो उम्र में बहुत बड़े हैं और समझदार भी, मैं क्या कहूं…