आपातकाल की औपचारिक घोषणा के पहले भी सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा पत्र-पत्रिकाओं पर नकेल कसना शुरु हो चुका था । सेन्सरशिप न होने के बावजूद सरकारी विज्ञापन और अखबारी कागज के कोटे आदि के द्वारा यह अंकुश रखा जाता । इसी दौर का एक प्रसंग बता रहा हूँ । धर्मवीर भारती की प्रसिद्ध कविता मुनादी ,एक छोटी साहित्यिक पत्रिका कल्पना में प्रकाशित हुई । मैंने उन्हें लिखा कि व्यापक पाठक समूह तक पहुँचाने के लिए मुनादी को धर्मयुग में छापा जाए । भारतीजी के उत्तर का चित्र पाठक देख सकते हैं । कुछ ही समय बाद आपातकाल लागू हुआ । भारती जी और सचेत हो गए । भवानीप्रसाद मिश्र ने आपातकाल के खिलाफ़ प्रतिदिन तीन कविताएं लिख कर त्रिकाल सन्ध्या का संकल्प पूरा किया । १९७७ में जनता पार्टी के जीतते ही धर्मयुग ने आपातकाल पर विशेषांक निकाला जिसके बीच के पृष्ट पर एक तरफ़ जेपी द्वारा चण्डीगढ़ जेल में लिखी कविता ( जीवन विफलताओं से भरा है , सफलता जब कभी आईं निकट,दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से।…..) और दूसरी तरफ़ मुनादी छापी गयी । ‘ आत्म प्रचार ‘ तब आवश्यक हो गया था । संकट के दौर में ही बड़े बड़ों की औकात का पता चल पाता है ।
धर्मवीर भारती का पोस्ट कार्ड
धर्मवीर भारती का पोस्ट कार्ड
’ शब्दों का सफ़र’ में मेरी यह टिप्पणी ४ मई २००८ को छपी थी ।
आज पुष्पा भारती जी ने मन्नू भण्डारी की आत्मकथा की बाबत ’हिन्दुस्तान ’ में एक लेख लिखा है । धर्मवीर भारती की ’मुनादी’ के हम भी कायल थे । शायद जेपी आन्दोलन का हर छोटा – बड़ा सिपाही था । भारतीजी अपातकाल लगने के पहले ही चिंगुर चुके थे । आपातकाल के दौरान भवानी बाबू की कविताओं ( बाद में ’त्रिकाल सन्ध्या’ में प्रकाशित ) को न छाप पाने की मजबूरी जताते हुए धर्मवीर भारती रोए भी थे । भाकपा खेमे के बुद्धिजीवियों से वे नहीं जुड़ गये यह गनीमत थी । काशी विश्वविद्यालय के कुछ संघी अध्यापक भी भाकपा खेमे के अध्यापक संगठन के सदस्य बन गये थे उस ’दु:शासन पर्व’ में ।
मन्नूजी को जितना पुष्पाजी ने उद्धृत किया है उसमें सच का अंश भी है । इसलिए पुष्पाजी द्वारा हल्की भाषा में लिखे गए इस प्रतिवाद के बावजूद मन्नूजी का लिखा टिका भी रहेगा। जिस दौर में अभिव्यक्ति पर रोक लगाने की कोशिश की गयी हो उस दौर में साहित्यकारों की भूमिका की बिबाक विवेचना जरूरी है ।
भवानीबाबू ने न सिर्फ़ आपातकाल में कविताओं की त्रिकाल सन्ध्या की अपितु जब जनता पार्टी वाले आपस में लड़ने लगे तब भी एक कविता में लिखा -
’जब आकाश घिरा था , काले बादल छाये थे, तब हम सब साथ थे
काले बादल छँट गये तो क्या हम भी छँट लें ? ’


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8 Comments
October 7, 2009 at 10:37 am
“…संकट के दौर में ही बड़े बड़ों की औकात का पता चल पाता है ।…”
सच है. यह बात आपने ख़ूब कही.
October 7, 2009 at 12:05 pm
सही है, सही है..
October 7, 2009 at 6:13 pm
भारती जी बड़े लेखक-संपादक थे . पर आपके पोस्टकार्ड से यह साबित होता है कि वे बेहद चतुर-होशियार भी थे . उन्नीस सौ पचहत्तर में जो उन्हें आत्मप्रचार लग रहा था,वह उन्नीस सौ सतत्तर तक आते-आते घटनाक्रम के बदलते ही ज़रूरी लगने लगा होगा .
वे कोई भवानी भाई तो थे नहीं जो पूरे साहस के साथ त्रिकाल-संध्या में लगातार तमाम ’औगुनियों’ की खबर लेते हों और सत्त्ता से एक आवश्यक दूरी रखते हों . तभी तो भवानी भाई कह पाए कि ’होशियारी बास देने लगी है अब’ .
होशियारी एक न एक दिन बास ज़ुरूर मारती है,सदा सुगंधित रहना तो सच्चाई और ईमानदारी और साहस के ही हिस्से आता है .
October 7, 2009 at 7:09 pm
हाँ आज अख़बार में उनकी प्रतिक्रिया पढ़ी है ..पर नंदन जी की किताब के कुछ सच …..सच से प्रतीत होते है
October 8, 2009 at 5:54 pm
bilkul sahi likha hai aapne.
October 9, 2009 at 12:30 am
साहित्यकारों का निजी जीवन अकसर कई विपरीत वास्तु स्थितियों को लिए हुए रहता है
पुष्पा जी ने भारती जी के पक्ष में लिखा है और मन्नू जी ने , जो उन्हें सही लगा वह लिखा
मारा मत यही है कि, सिर्फ साहित्यकारों के सृजनात्मक पहलू पर ही , मैं, ध्यान देती हूँ –
ये दुनिया तो ऐसी है के ,
महात्मा गांधी जैसे सदी के असली महानायक में भी , दोष देखती है
कई सारे पहलू होते हैं, कई व्यक्तिगत बातें ,
जैसे दिनकर जी के बारे में या बच्चन जी के बारे में भी
कहीं या चुपके से दुहराई जातीं हैं –
उनसे , इन महान रचनाकारों के साहित्यिक अवदान पर क्या असर पडेगा
कौन जाने ?
मैं तो नमन करके , आज्ञा लेती हूँ …
कुंवरनारायण जी को बधाई —
सादर,
- लावण्या .
October 9, 2009 at 8:25 am
मेरे पिता, इमरजेन्सी के दौरान, दो साल जेल में रहे। उस समय दुनिया को बहुत कुछ सीखा, समझा।
October 9, 2009 at 5:42 pm
nice