मुन्शी नहीं थे प्रेमचन्द

भारतीय सहित्य-प्रेमियों में व्याप्त एक व्यापक भूल की ओर पत्रकारिता के इतिहासकार और वरिष्ट पत्रकार योगेन्द्र नारायण ने ध्यान दिलाया । योगेन्द्र नारायण आज ’गाँव – गिराँव’ अखबार द्वारा आयोजित प्रेमचन्द जयन्ती के मौके पर मुगलसराय में मुख्य अतिथि के नाते बोल रहे थे । ’सोज़-ए-वतन’ नामक पाँच उर्दू कहानियों के संग्रह पर अंग्रेजों की दमनात्मक कार्रवाई के बाद नवाब राय और धनपत राय से प्रेमचन्द बनने की कहानी तो प्रसिद्ध है लेकिन प्रेमचन्द को मुन्शी प्रेमचन्द बनाने वालों की भूल की चर्चा कभी नहीं हुई है ।

बनारस से निकलने वाले फारसी – उर्दू अखबार ( द्विभाषी )- आवाज-ए-ख़ल्क में वे लिखा करते थे । यह १९०५ में हुए बंग भंग के बाद की बात है । आवाज-ए- ख़ल्क बंग-भंग के विरुद्ध था और गांधी के भारत आने के लगभग दस वर्ष पहले स्वदेशी का प्रचार करता था ।

प्रेमचन्द

प्रेमचन्द

प्रेमचन्द बनारस से निकलने वाले पाक्षिक जागरण से भी जुड़े़ । यह पत्रिका १९३२ से छपनी शुरु हुई थी । इसे व्यापक आधार देने के उद्देश्य से पत्रिका को बनारस से मुम्बई ले जाया गया । मुम्बई में जागरण का सम्पादन प्रसिद्ध ऐतिहासिक साहित्यकार कन्हैयालाल मानिकलाल मुन्शी के साथ प्रेमचन्द  कर रहे थे । पत्रिका में सम्पादक के रूप में कन्हैयालाल मानिकलाल मुन्शी – प्रेमचन्द छपा रहता था  ।  बस यहीं से मुन्शी प्रेमचन्द की शुरुआत कर दी गई । उनके साहित्य , पत्रों और पत्रिकाओं में मुन्शी प्रेमचन्द नहीं लिखा गया है । मुन्शीगिरी करने में चूँकि उनकी जाति (कायस्थ ) व्यापक तौर पर लगती थी इसलिए यह भूल और व्यापक और पुख़्ता होती गयी ।

योगेन्द्र नारायण ने पत्रकारों द्वारा एक और शब्द के अर्थ बदलने की चर्चा  भी की । यह शब्द है किन्नर । यह उत्तर भारत मे पाई जाने वाली एक जाति थी । कादम्बरी में इसका व्यापक उल्लेख है । बाबा नागार्जुन द्वारा एक कविता में ’किन्नर – किन्नरी” का उल्लेख है तथा -’यदि होता किन्नर नरेश मैं,राजमहल में रहता’ इन चर्चित उदाहरणों के बावजूद पत्रकारों ने हिजड़ों के लिए किन्नर शब्द हाल ही में चला दिया । ’किन्नर-किन्नरी’ तथा ’किन्नर-नरेश’ में इस अर्थ को जोड़ देने पर ,क्या होता ? – यह उन पत्रकारों ने  सोचा ?

प्रेमचन्द

प्रेमचन्द जयन्ती

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13 टिप्पणियाँ

Filed under banaras, premchand

13 responses to “मुन्शी नहीं थे प्रेमचन्द

  1. मेरे लिए नई जानकारी है। लेकिन पत्रकार बहुत से शब्दों के अर्थ बदल देते हैं।

  2. वाक़ई काफ़ी अच्छी और रोचक जानकारी है। शुक्रिया।

  3. अच्छी और नई जानकारी..

    भुवन वेणु
    लूज़ शंटिंग

  4. anamdas

    हिजड़ों को किन्नर कहे जाने में मेरी समझ से कोई समस्या नहीं है, किन्नर की व्युत्पति किं नर? बताई जाती है, यानी संदेह की स्थिति है व्यक्ति नर है या नहीं. अधिक प्रकाश अपने अजित जी डाल सकते हैं.
    मुंशी वाला प्रकरण अलबत्ता दिलचस्प है लेकिन इस पर प्रेमचंद के पुत्र अमृतराय का प्रतिवाद न करना (वे अपने पिता की विरासत को लेकर बहुत सजग रहे) जताता है कि यह नाम उन्हें और संभवतः उनके पिता को भी स्वीकार्य था, कायस्थों में नाम के आगे मुंशी लिखने की परंपरा रही है.

    • @ अनामदास .
      किं + नर की व्युत्पत्ति कहीं नहीं है । यदि आपकी अनापत्ति कबूल ली जाए तब :
      बाबा नागार्जुन की अद्वितीय कविता ”बादल को घिरते देखा है” में जब वे लिखते हैं
      नरम निदाग बाल कस्तूरी
      मृगछालों पर पलथी मारे
      मदिरारुण आखों वाले उन
      उन्मद किन्नर-किन्नरियों की
      मृदुल मनोरम अँगुलियों को
      वंशी पर फिरते देखा है।
      तब क्या अर्थ निकलेगा ? अथवा राहुल सांस्कृत्यायन की लिखी किताब ’किन्नर देश में ’ का क्या अर्थ हो जाएगा ? हिमाचल प्रदेश से कश्मीर के इलाके पर यह किताब है ।
      यदि होता किन्नर- नरेश मैं राज महल में रहता”
      बहरहाल ,योगेन्द्र नारायण के इस विषय पर लिखे लेख को हम यहाँ पुनर्प्रकाशित करेंगे।उसमें अमर कोश से लगायत पुराणों के इल राजा के सन्दर्भ आये हैं ।

      प्रेमचन्द ने अपनी किताब , पत्रिका , चिट्ठी-पत्रिका में कहीं भी अपने नाम के आगे “मुन्शी” नहीं लगाया । अमृत राय को कायस्थों में प्रचलित इस परम्परा (सम्मानसूचक मानते हुए) पर आपत्ति न रही हो यह संभव है । प्रेमचन्द को इसकी आवश्यकता नहीं है ।

      • anamdas

        हिमाचल में एक हिस्सा है जिसका नाम आज भी किन्नौर है, किन्नर नहीं, कहीं उसकी वजह से ये भ्रम तो नहीं पैदा हुआ. ज़रा गहराई से जाँच की ज़रूरत है.

      • @ प्रिय अनामदास ,
        राहुलजी की पुस्तक के सन्दर्भ से हिमाचल प्रदेश से काश्मीर के इलाके के बारे में बात कही गई है । यह जरूर है कि हि. प्र. के किन्नौर के कुछ लोगों ने दैनिक पत्र ’अमर – उजाला’ पर हिजड़ा के लिए ’किन्नर’ का प्रयोग करने पर मुकदमा किया था तथा बरसों तक अमर – उजाला में शब्द का प्रयोग बन्द भी कर दिया गया था ।

  5. मित्रों , श्री योगेन्द्र नारायण ने एक सुधार किया है , कन्हैयालाल माणिकलाल मुन्शी और प्रेमचन्द संयुक्त रूप से ’हंस’ के सम्पादक थे । इसे ’भारतीय भाषाओं का प्रतिनिधि पत्र’ बनाने का उद्योग भी किया था । मुन्शी के साथ सम्पादकत्व के दिनों के अंकों में ही ’मुन्शी – प्रेमचन्द’ लिखा जाता था ।

  6. अच्‍छी जानकारी है. कुछ शब्‍द हैं जो चल जाते हैं. आजकल मीडिया और मीडियाकर्मी शब्‍दों को लेकर कितना लापरवाह हैं यह किसी से छुपा नहीं है. इस ओर गंभीर काम किया जाना चाहिए.. सराहनीय प्रयास.

  7. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

  8. रोचक जानकारी. बहरहाल प्रेमचंद जी को कोई आपत्ति नहीं थी.

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