हैदराबाद – पुणे रेल मार्ग पर यह मेरा पहला सफ़र था , इसलिए लाजमी तौर पर मन में थोड़ा उत्साह भी था | गाड़ी रात की थी इसलिए सुबह सिर्फ शोलापुर से पुणे का रेल मार्ग देख पाया | हैंडलूम की विशिष्ट बुनाई वाली खेसनुमा चादरों के लिए मशहूर – शोलापुर | महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शिंदे साहब का चुनाव क्षेत्र | पटरी के पास लिखे नारों में शिंदे साहब के कारण क्षेत्र के गौरव और महत्त्व को ही उभारा गया था| सुबह टहलने के समय पर ही गाड़ी में भी नींद खुल गयी थी | प्लैटफोर्म साफ़ – सुथरे थे |
संगमनेर पुणे और नासिक रोड के बीच सड़क मार्ग पर स्थित एक छोटा क़स्बा है |संगमनेर अहमदनगर जिले में शिवाजी के जन्मस्थान और साईं बाबा वाली शिरडी के करीब है| हमें भी पुणे से ही बस पकड़नी थी | यहीं हमारे दल समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय समिति की तीन दिवसीय बैठक थी| चुनाव के बाद होने वाली पहली बैठक थी इसलिए चुनाव समीक्षा और राजनीतिक प्रस्ताव पर महत्वपूर्ण चर्चा होनी थी | बस पकड़ने के पहले हमें महाराष्ट्र के वरिष्ट समाजवादी भाई वैद्य से मिलना था| भाई हमारे दल के संस्थापक महासचिव थे | उत्साह भर देने वाले संगठनकर्ता – अस्सी वर्ष की अवस्था में भी अथक सक्रिय | पुणे के नगर प्रमुख और महाराष्ट्र के गृह राज्य मंत्री रह चुके भाई गोआ – मुक्ति सत्याग्रह के सैनिक थे | मुख्यधारा की राजनीति के किसी भी दल में उन्हें योग्य स्थान मिल सकता था लेकिन उन्होंने देश भर में सक्रिय कई संगठनों के युवाओं और किशन पटनायक जैसे समतावादी चिन्तक के साथ नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के लिए इस नए दल को तरजीह देना उचित समझा | हम चार मेहमानों को अपने कांपते हाथों से परोस कर खिलाने का उनका प्रेमपूर्ण आग्रह था,जो पूरा किया गया | अपनी पुत्र – वधु के लिए वे ‘बहु -बेटी ‘ कह रहे थे – प्रेम से पगा संबोधन | वे हमारे लिए खाना बनवा कर इंजीनियरिन्ग महाविद्यालय में पढाने गयी हुई थीं | घुटने में तकलीफ के बावजूद भाई हमारे १७ साल पुराने दल के सबसे सक्रीय महामंत्री थे , फिर साने गुरूजी द्वारा स्थापित राष्ट्र सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे | आज कल देश भर में ‘समाजवादी शिक्षक सभा’ के माध्यम से स्कूल स्तर तक समान और नि:शुल्क तालीम के लिए अभियान की रहनुमाई कर रहे हैं | माँ – बाप की पीढी के राजनैतिक कर्मियों से भी कितनी प्रेरणा मिलती है |
स्वाति भाई वैद्य के साथ दल के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की टीम में थी इसलिए पुणे में भाई से मिले बगैर जाने का प्रश्न ही नहीं था | मुझे पुणे में आगा खान महल स्थित स्मारक जाने का मन होगा यह जानते हुए स्वाति ने मुझसे वहां जाने के बारे में पूछा | ‘अंग्रेजों भारत छोडो – करो या मरो ‘ के अगस्त क्रान्ति के आवाहन के बाद गांधीजी मुंबई से गिरफ्तार कर पुणे के आगा खान महल में नजरबंद रखे गए थे |उनके सचिव महादेव देसाई भी उनके साथ गिरफ्तार किए गए थे | गिरफ्तारी के ६ दिन बाद गांधीजी द्वारा अनशन की संभावना के तनाव में हृदयाघात से १५ अगस्त १९४२ को महादेव देसाई की एक कैदी के रूप में मौत हुई थी | गांधीजी ने उनकी अंतिम क्रिया की थी | करीब साल भर बाद कस्तूरबा की भी वहीं मृत्यु हुई | इन दोनों लोगों की समाधियों के अलावा अब उस ‘महल’ को राष्ट्रीय स्मारक का रूप दिया गया है | महादेव देसाई मेरे दादा भी थे | भाई वैद्य से बरसों बाद मिलकर मुझे कम संतुष्टि नहीं मिली | स्कूल पूरा करने के बाद एक बार मैं दादाजी की समाधि देखने गया था |
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2 Comments
June 25, 2009 at 8:55 am
आदरणीय वैद्य जी जैसी कर्मठता और निष्ठा आज नज़र ही नही आती।प्रणाम करता हूं उन्हे मैं।बा और आपके दादाजी जी को मेरी श्रद्धांजलि।कभी मौका मिला तो दर्शन ज़रूर करेंगे उनकी समाधी के।
July 18, 2009 at 12:06 am
आपके मनोभाव समझ रही हूँ
आदरणीय वैध जी जैसे लोगोँ के बारे मेँ पढकर
गौरव और आनँद मिलता है
- लावण्या