( सिटिज़न्स न्यूज सर्विस से साभार । आशा परिवार के बॉबी रमाकान्त द्वारा प्रस्तुत ऑनलाईन प्रतिवेदन (अंग्रेजी में) पर हिन्दी में टिप्पणी सहित सहमति दें ।
हम नागरिक, लोक सभा चुनाव २००९ के दौरान राजनीतिक पार्टियों एवं चुनाव प्रत्याशियों द्वारा किये गए मीडिया के दुरूपयोग से, बहुत चिंतित हैं. हमें इस बात से भी आपत्ति है कि मीडिया ने अपना दुरूपयोग होने दिया है. यह पाठक के उस मूल विश्वास को तोड़ता है जिसके आधार पर निष्पक्ष एवं संतुलित खबर पढ़ने के लिए पाठक पैसा दे कर समाचार पत्र खरीदता है. मीडिया को लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में माना गया है परन्तु मीडिया के द्वारा प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया की चुनाव के दौरान पत्रकारिता हेतु मार्गनिर्देश (१९९६) के निरंतर होते उल्लंघन ने उसकी लोकतंत्र में सकारात्मक भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
समाचार, विचार और प्रचार के बीच भेद ही नहीं रह गया है. पाठक को यह बताने के लिए कि प्रकाशित सामग्री समाचार, विचार या चुनाव प्रचार है, छोटे अक्षरों में ‘ए.डी.वी.टी’ या ‘मार्केटिंग मीडिया इनिशिएटिव’ छापना पर्याप्त नहीं है. कुछ समाचार पत्र तो यह भी छापने का कष्ट नहीं उठाते हैं.
मोटे तौर पर कहा जाए तो खबर से सम्बंधित निर्णय लेने में संपादक की भूमिका पर अब मार्केटिंग वाले सहकर्मी हावी हो रहे हैं. छोटे जिलों या शहर-नगर-कस्बों में तो अक्सर जो व्यक्ति संवाददाता होता है उसी को विज्ञापन इकठ्ठा करने की जिम्मेदारी भी दे दी जाती है, जिसके फलस्वरूप वो विज्ञापन-दाताओं की खबर को महत्व देता है और अक्सर विज्ञापन न देने वाले लोगों की खबर को नज़रंदाज़ कर देता है.
विज्ञापन, ‘विज्ञापन-जैसे-संपादकीय’, ‘मार्केटिंग मीडिया इनिशिएटिव‘ और अन्य ऐसे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीकों से जो खबर मीडिया में आती है, उसपर हुआ व्यय, अक्सर चुनाव आयोग द्वारा तय की गई २५ लाख रूपये के अधिकतम चुनाव खर्च सीमा से, अधिक होता है. इसलिए मीडिया अब इन प्रत्याशियों की मिलीभगत से चुनाव के दौरान लागू आचार संहिता का उलंघन कर रही है.
मीडिया में छप रहे विज्ञापनों, विज्ञापन-जैसी-ख़बरों आदि पर हुए पूरे व्यय निर्वाचन अधिकारीयों को नहीं दिए जाते हैं. मीडिया को यह रपट देनी चाहिए जिससे यह पता चल सके कि किस राजनीतिक पार्टी ने और किस चुनाव प्रत्याशी ने मीडिया पर कितना व्यय किया है.
राजनीतिक पार्टियों के संचालन हेतु कोई भी कानून नहीं है, ऐसा कानून बनना चाहिए। चुनाव में अधिकतम खर्च-सीमा के उलंघन की सज़ा भी अधिक सख्त होनी चाहिए और मौजूदा चुनाव में ही लागू होनी चाहिए. वर्त्तमान में चुनाव में अधिकतम-खर्च सीमा के उलंघन की सज़ा सिर्फ़ अगले चुनाव में ही लागू होती है, जो पर्याप्त अंकुश नहीं है.
इलेक्ट्रोनिक मीडिया (टीवी) के लिए भी प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया जैसी नियामक संस्था होनी चाहिए।
समाचार पत्रों को ‘ओम्बुड्समैन’ या विश्वसनीय लोकपाल नियुक्त करने के लिए देश-भर में उठ रही मांग का हम समर्थन करते हैं।
मूल रूप से हम नागरिक यह चाहते है कि मीडिया लोकतंत्र में निगरानी करने वाली निष्पक्ष भूमिका को पुन: ग्रहण करे. आर्थिक स्वार्थ के लिए मीडिया को अपनी स्वायत्ता को दाव पर नहीं लगानी चाहिए. जब लोगों का लोकतान्त्रिक संस्थाओं में विश्वास उठ रहा हो, तो मीडिया को इस पतन में शामिल होने के बजाय, लोकतंत्र में नागरिकों के विश्वास को पुनर्स्थापित करना चाहिए.
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9 Comments
May 12, 2009 at 4:54 pm
हस्ताक्षर कहाँ किये जाएँ?
May 12, 2009 at 4:59 pm
पोस्ट की शुरुआत में हस्ताक्षर करने के लिए कड़ी दी गयी है । पुन: बता रहा हूँ – यहाँ ई-पते के अलावा बाकी सब हिन्दी में बतायें ।
सविनय ,
अफ़लातून
May 12, 2009 at 5:03 pm
अच्छी पहल है
मैंने हस्ताक्षर कर दिये हैं
May 12, 2009 at 5:54 pm
कर दिया जी.
May 12, 2009 at 11:27 pm
आपकी पहल अच्छी है। इस मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करना बेहद जरूरी है। हालांकि मुझे लगता है कि इसके साथ-साथ वैकल्पिक मीडिया के बारे में भी गंभीरता से जनपक्षधर लोगों को सोचना चाहिए।
May 13, 2009 at 2:54 am
I have signed but could not add comment
May 13, 2009 at 10:30 am
बहुत अच्छा कार्य . मै भी साईन कर रहा हू जी
May 13, 2009 at 6:38 pm
Maine bhi apne hastakshar kar diye hain. Aapke pryas ki safalta ki shubhkamnayein.
May 18, 2009 at 1:14 pm
मशहूर पत्रकार और जनसत्ता के पूर्व संपादक प्रभाष जोशी ने भी अपने दो लेखों के माध्यम से इस मसले को ज़ोरदार ढंग से उठाया है। जनसत्ता में छपे उनके दोनों लेख आप यहां भी पढ़ सकते हैं:
http://janatantra.com/2009/05/18/save-indian-journalism-prabhash-joshi/