छुटपन में ऐसा होता था अक्सर
कि कोई टोके
कि फल के साथ ही तुमने खा लिया है बीज
इसलिए पेड़ उगेगा तुम्हारे भीतर
मेरे भीतर पेड़ उगा या नहीं
पता नहीं
क्योंकि मैंने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट
लेकिन आज जब मैंने
एक जवान पेड़ को कटते हुए देखा
तो मैंने सुनी अपने भीतर
एक हरी – भरी चीख
एक डरी – डरी चीख
मेरे भीतर से निकली
मेरी चीख लोगों ने सुनी या नहीं
पता नहीं
क्योंकि लोगों के भीतर
मैं पेड़ की तरह उगा नहीं
क्योंकि मैंने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट.
- राजेन्द्र राजन .


14 Comments
February 25, 2009 at 6:40 pm
बहूत सुन्दर लिखा है आपने राजेंद्र जी
February 25, 2009 at 6:46 pm
लोग तो फ़ल , छाया और वसंत का उल्लास देने वाले पेड़ों पर भी रहम नहीं करते ,इंसनी जज़्बातों की तो कहे ही कौन ?
February 25, 2009 at 7:26 pm
बहुत ही बिंदास रचना . बधाई बधाई
February 25, 2009 at 7:45 pm
ओह! सच भी। मर्मान्तक भी।
February 25, 2009 at 8:07 pm
यह अहसास जरूरी है।
February 25, 2009 at 11:08 pm
अच्छी कविता है, पढवाने के लिए आभार।
February 25, 2009 at 11:22 pm
“मेरी चीख लोगों ने सुनी या नहीं
पता नहीं
क्योंकि लोगों के भीतर
मैं पेड़ की तरह उगा नहीं”
सचमुच, एक बेहतरीन रचना
February 26, 2009 at 12:07 am
बहुत ही सुंदर …
February 26, 2009 at 8:37 pm
[...] पेड़ , जहां चुक जाते हैं शब्द , शब्द बदल जाएं तो भी , पश्चाताप , छूटा हुआ रास्ता , बामियान में बुद्ध , [...]
February 27, 2009 at 4:55 pm
लेकिन आज जब मैंने
एक जवान पेड़ को कटते हुए देखा
तो मैंने सुनी अपने भीतर
एक हरी – भरी चीख
Arthpurn kavita, Badhai.
March 1, 2009 at 12:28 pm
बहुत सुंदर !
कविता पढ़वाने के लिए धन्यवाद।
घुघूती बासूती
April 30, 2009 at 7:31 pm
सुन्दर !
August 30, 2009 at 11:44 pm
बहुत सुन्दर रचना….बहुत बहुत बधाई….
——- प्रसन्न वदन चतुर्वेदी
February 7, 2010 at 9:48 am
kavita kuch khaas nahi hai, thik hai-ok-ok