मैदान में जैसे ही पहला पहलवान आया
उसकी जयकार शुरु हो गई
उसी जयकारे को चीरता हुआ दूसरा पहलवान आया
और दोनों परिदृश्य पर छा गए
पहले दोनों ने धींगामुश्ती की कुछ देर
कुछ देर बाद दोनों ने कुछ तय किया
फिर पकड़ लाए वे उस आदमी को जो खेतों की तरफ़ जा रहा था
दोनों ने झुका दिया उसे आगे की ओर
अब वह हो गया था उन दोनों के बीच एक चौपाए की तरह
तब से उस आदमी की पीठ पर कुहनियां गड़ा कर
वे पंजा लड़ा रहे हैं
परिदृश्य के एक कोने से
कभी-कभी आती है एक कमज़ोर-सी आवाज़
कि उस तीसरे आदमी को बचाया जाए
मगर इस पर जो प्रतिक्रियाएं होती हैं
उनसे पता चलता है कि सबसे मुखर लोग
दोनों बाहुबलियों के प्रशंसक
या समर्थक गुटों में बदल गए हैं
- राजेन्द्र राजन
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3 Comments
August 28, 2008 at 5:07 pm
kadwi sachchai bayan karti hai apki kavita.badhai.
arvind kumar singh
February 27, 2009 at 11:20 am
It is again great creation … your poems are reality … these are speaking to heart directly … these are not words there is something supernatural hidden in these words. I am greatful to you, I have felt these great truths.
July 10, 2009 at 5:26 pm
It’s a nice poem.