आज सुबह से नल था मौन ,
पता नहीं कारण था कौन ?
मैंने पूछा तनिक पास से ,
भैय्या दिखते क्यों उदास से ?
बोला , ‘क्या बतलाऊं यार ,
रोज सहन करता हूं मार .
कान ऐंठता जो भी आता ,
टांग बाल्टी मुझे सताता .
लड़ते मेरे पास खड़े हो ,
बच्चे हों या मर्द बड़े हों .
नहीं किसी को दूंगा पानी [...]
Entries from July 2008
July 27, 2008
नल की हड़ताल
July 22, 2008
भणसाळीकाका (२) : ले. नारायण देसाई
तीसरा दृश्य मगनवाड़ी का । बारह वर्षों का मौन चल रहा था । लेकिन बापू ने बहस करके भगवान का नामोच्चारण करने की छूट उनसे मंजूर करायी । उनकी दोनों बगलों में काख – बिलाई के फोड़े एक के बाद एक हो रहे थे । देखनेवाला सहम जाता था । लेकिन भणसाळीकाका का चरखा चालू [...]
July 21, 2008
भणसाळीकाका : ले. नारायण देसाई
एक बार काका ने सेवाग्राम - आश्रम का वर्णन ‘ गांधीजी का प्राणि – संग्रहालय’ ( गांधीजीज मिनाझरी) इस शब्दों में किया था। बापू के आसपास हमेशा अजीब तरह के लोग जमा हो जाते थे । कभी – कभी सरदार कुछ पर चिढ़ भी जाते थे । काका हँसकर कहते थे , ‘ बापू तो डॊक्टर [...]
July 20, 2008
डॉ. गरिमा क भोजपुरी कहानी पढ़ीं
डॉ. गरिमा राजस्थान क कोटा सहर में रहेलीन । निसर्गोपचार पर चिट्ठो लिखलीन औ ए पद्धती क डॉग्दर हईंन। गरिमा का ननिहाल बलिया बाटे औ आपन मातृभाषा में लिखले क ओन्हें संकोच जरीको नाहि बा। ओन भोजपुरी में लम्बा किस्सा सुनावे क स्री गनेश कइले हइन ।
जेके भोजपुरी से जुड़ाव बा , प्रेम बा ऊ गरिमा [...]
July 9, 2008
यह कौन-सी अयोध्या है ? : राजेन्द्र राजन
अयोध्या का यही अर्थ हम जानते थे
जहाँ न हो युद्ध
हो शांति का राज्य
अयोध्या की यही नीति हम जानते थे
जहाँ सबल और निर्बल
बिना भय के
पानी पीते हों एक ही घाट
अयोध्या की यही रीति हम जानते थे
जहाँ प्राण देकर भी
सदा निभाया जाये
दिया गया वचन
यह था अयोध्या का चरित्र
गद्दी का त्याग और वनवास
गद्दी के लिए खूनी खेल नहीं
अयोध्या का [...]
July 8, 2008
शब्द बदल जाएं तो भी
वे जान गए हैं
कि नहीं उछाला जा सकता
वही शब्द हर बार
क्योंकि उसका अर्थ पकड़ में आ चुका होता है
इसीलिए
वे जब भी आते हैं
उछाल देते हैं कोई और शब्द
गिरगिट के रंग बदलने की तरह
जब बदल जायें शब्द
तो अर्थ वही रहता है
शब्द बदल जायें तो भी
- राजेन्द्र राजन
१९९५.
July 6, 2008
जहाँ चुक जाते हैं शब्द : राजेन्द्र राजन
शब्दों में शब्द जोड़ते
मैं वहाँ आ पहुंचा हूं
जहां और शब्द नहीं मिलते
मैं क्या करूँ
अब मैं कैसे लिखूं
समय के पृष्ट पर
अपनी सबसे जरूरी कविता
शब्दों में शब्द जोड़ते
जहां चुक जाते हैं शब्द
मैं क्या करूं ?
क्या मैं वहीं खुद को जोड़ दूं ?
मगर
क्या अपने शब्दों जैसा मैं हूं ?
- राजेन्द्र राजन
१९९५.
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