” मगर, आपका असली नाम क्या है ?”

    डॉ. अजित वडनेरकर ने कई किश्तों में मेरा आत्मकथ्य छापा । आम तौर पर जितने लोग मुझे पढ़ते हैं उससे कहीं ज्यादा लोगों ने टीपा भी ।  ” मगर , आपका नाम क्या है ?” कई लोगों ने यही पूछा तो कुछ समय के लिए लगा कि मैं शोले की बसन्ती हो गया ? वही कहावत हुई कि सारी रामायण बीत गयी ,पूछ रहे है सीता……….

    चिट्ठालोक से अलग भी यह सवाल मुझसे पूछा जाता रहा है लेकिन चिट्ठालोक में अनामदासों की भरमार के कारण मेरे जैसे अललटप्पू नाम की बाबत यह सवाल पूछा जाना लाजमी है। ‘शब्दों का सफ़र’ पर लगातार कुछ दिन छपने के संक्रमण के प्रभाव में सर्वप्रथम यह बता दूँ कि प्लेटो ,प्लातो, अप्लातो ,अफ़लातू इस क्रम में यूनानी से फारसीकरण हुआ है । ऐसे ही इसी परम्परा के दार्शनिक सॉक्रेटीस और ऍरिस्टॉटल भारत में सुकरात और अरस्तू पुकारे जाते हैं । मेरे दो भतीजे सुकरात और अरस्तू भी हैं । 

  मेरे पिता उपनिषद के नचिकेता और अशोक की पुत्री संघमित्रा के नाम मेरे बड़े भाई बहन के रख चुके थे तब तीसरे नम्बर पर यूनानी सभ्यता से यह नाम लिया गया । वैसे गुजराती में अफ़लातून के माएने हँसमुख भी है ।

11 Responses to “” मगर, आपका असली नाम क्या है ?””


  1. 1 maithily May 9, 2008 at 10:24 pm

    वैसे आपके लिये तो यूनानी और गुजराती दोनों नाम मौजूं हैं.

  2. 2 अशोक पाण्डे May 9, 2008 at 11:24 pm

    अललटप्पू पसन्द आया. बाक़ी तो बेजोड़ है ही. शुभकामनाएं और धन्यवाद.

  3. 3 kakesh May 10, 2008 at 6:48 am

    राज़ राज़ ही रहा या खुल गया :-)

  4. 4 दीपक भारतदीप May 10, 2008 at 9:27 am

    दिलचस्प परिचय है आपका! वैसे आपका नाम अफलातून प्रसिद्ध हो गया है और आप चाहें भी तो हम आपको दूसरे नाम से पुकार नहीं पायेंगे.
    दीपक भारतदीप

  5. 5 swapandarshi May 10, 2008 at 9:55 am

    apakaa naam shayad Aflatoon ke alaawa ho bhi kya saktaa hai?

    achchha laga ki ye aapakaa sachmuch ka naam hai.

  6. 6 अरूण May 10, 2008 at 9:56 am

    हम तो सम्झे थे कि बचपन मे आप अफ़लातूनी हरकते करते रहते होगे तभ घर वालो के प्यार मे इस नाम से पुकारना शुरु किया होगा,और यही आपने मुख्य रूप से स्वीकार कर लिया , आफ़िसियल नाम दूसरा होगा :) चलिये परदा तो उठा :)

  7. 7 संजय बेंगाणी May 10, 2008 at 10:26 am

    पहले मुझे लगा था, तक़लुश उपनाम जैसा कुछ होगा. मगर फिर अनुपजी ने बताया की इनके पिताजी द्वारा रखा गया है. अफ्लातुन…नाम है जी :)

  8. 8 प्रमोद सिंह May 10, 2008 at 11:36 am

    शायद घरवालों के मन में यह भोला मोह रहा होगा कि कम से कम बच्‍चे के अफ़लू (फ्लू नहीं)वाली अक़ल आ जाय? या और नहीं तो.. अपनी प्‍लाटून ही खड़ा करने लायक बन जाये? ख़ैर, कोई बात नहीं, घरवालों का मोह होता ही इसलिए है कि फल और प्‍लाटून बनने की जगह महज़ माया बनकर रह जाये..

  9. 9 chandrabhushan May 10, 2008 at 12:14 pm

    मेरे ख्याल से जिस दार्शनिक का नाम हम अंग्रेजी में प्लेटो पढ़ते हैं, वह उसके मूल नाम से बहुत दूर का है। दर्शन की पुरानी किताबों में इस व्यक्ति के नाम की स्पेलिंग का आखिरी अक्षर ओ न होकर एन है। यूरोप में नवजागरण की शुरुआत इटली से हुई थी लिहाजा ज्यादातर व्यंजनांत पूर्वी नामों को स्वरांत बनाकर उनका बंटाधार कर दिया गया। मूल ग्रीक या एरेमेइक जुबान में यह नाम प्लातोन या प्लातून (PLATON) के करीब ही उच्चरित होता था। जैसे स्कूल को हम लोग इस्कूल या स्टाफ को अस्टाफ बोलते हैं, उसी तरह पूरब की अरबी-फारसी जुबानों में प्लातून को बिना किसी विकृति के सहज उच्चारण के रूप में अफलातून बोला जाने लगा। अफलातून देसाई तक आते-आते इसमें कुछ न कुछ अर्थ-ध्वंस भी हुआ ही है, लेकिन इससे इतर मेरी राय यही है कि प्लेटो की तुलना में अफलातून उच्चारण संबंधित दार्शनिक के मूल नाम के कहीं ज्यादा करीब है।

  10. 10 neeraj1950 May 10, 2008 at 12:14 pm

    शेक्ष्पीअर ने कहा था “नाम में क्या रखा है” .आप के संस्मरण बहुत धयान से पढे और खूब आनंद उठाया. आप जैसे व्यक्ति को चाहे जिस नाम से पुकारा जाए आप रहेंगे विलक्षण ही.
    नीरज

  11. 11 mamta May 10, 2008 at 12:50 pm

    अच्छा किया जो नाम का राज खोल दिया। :)

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