जुगनू : अल्लामा इक़बाल की बाल कविता

सुनाऊं तुम्हे बात एक रात की,

कि वो रात अन्धेरी थी बरसात की,

चमकने से जुगनु के था इक समा,

हवा में उडें जैसे चिनगारियां.

पडी  एक बच्चे की उस पर नज़र ,

पकड़ ही लिया एक को दौड़ कर.

चमकदार कीडा जो भाया उसे ,

तो टोपी में झटपट छुपाया उसे.

तो ग़मग़ीन कैदी ने की इल्तेज़ा ,

‘ओ नन्हे शिकारी ,मुझे कर रिहा.

ख़ुदा के लिए छोड़ दे ,छोड़ दे ,

मेरे कैद के जाल को तोड दे .

-”करूंगा न आज़ाद उस वक्त तक ,

कि देखूं न दिन में तेरी मैं चमक .”

-”चमक मेरी दिन में न पाओगे तुम ,

उजाले में वो तो हो जाएगी गुम.

न अल्हडपने से बनो पायमाल -

समझ कर चलो- आदमी की सी चाल”.

-अल्लामा इक़बाल.

4 Responses to “जुगनू : अल्लामा इक़बाल की बाल कविता”


  1. 1 MEET April 10, 2008 at 6:18 pm

    कमाल है भाई. अल्लामा इकबाल, और ये “जुगनू”. वाह ! बहुत बहुत शुक्रिया आप का.

  2. 2 manish joshi April 11, 2008 at 10:40 am

    खूब - वैसे आजकल तो रात में भी जुगनू कहाँ दिखते हैं - बिजली की बत्तियां ही बत्तियां

  3. 3 vijayshankar chaturvedi April 11, 2008 at 11:51 am

    अल्लामा इक़बाल अपने गहन दर्शन और फ़ारसी ज़बान के ज़्यादा इस्तेमाल के चलते आसान शायर नहीं माने जाते. वैसे भी वह ग़ज़ल से ज़्यादा नज़्म के शायर माने जाते हैं… लेकिन उन्होने बाज कई ऐसी नज़्में कही हैं जो हर आम-ओ-ख़ास को आसानी से समझ में आ जाती हैं. फिर यह तो बच्चों को ध्यान में रखकर लिखी गयी नज़्म है. इसमें बयान की रवानी देखते ही बनती है.

    बच्चे का जुगनू से यह कथन कि-
    ”करूंगा न आज़ाद उस वक्त तक ,
    कि देखूं न दिन में तेरी मैं चमक .”

    मुझे पाकिस्तानी शायरा परवीन शाकिर
    का एक शेर याद आ गया, जो इस नज़्म के सालों बाद उन्होने लिखा. आप भी देखें कि-

    ‘जुगनू को दिन के वक़्त परखने की जिद करें,
    बच्चे हमारी अहद के चालाक़ हो गए.’

    परवीन शाकिर अजीमुश्शान शायरा हैं. यह निर्विवाद है.

  4. 4 ghughutibasuti April 11, 2008 at 11:59 am

    nice one!
    ghughutibasuti


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