आज मुझे थोड़ा उदास होने दीजिए , साथियों !- महेश्वर

आज मुझे थोड़ा उदास होने दीजिए , साथियों !

उदास होने दीजिए मुझे

बदलने के लिए दर्द का जायका

घुटन का अहसास

ताकि कहीं-न-कहीं तो टूट सके

एकरसता का लम्बा सिलसिला

मुझे उदास होने दीजिए

ताप को चुनौती देते

अमलतास और गुलमुहर के बाग़ी फूलों से

अँकवार भरकर भेंटने के वास्ते

हो सकता है जब तक मैं उन तक पहुँचूँ

बेगाने मुसाफ़िर-सा गुज़र जाये गुस्ताख़ मौसम

उदास होने दीजिए मुझे

उद्दाम आवेग से नाचती किसी पहाड़ी नदी की तरह

उन्मत्त जवानी के उन पुर-असरार नग़मों के लिए

जिन्हें गाते-गाते बीच ही में

बेदम हो गयी थी मेरी आवाज़

मुझे उदास होने दीजिए

सहयोद्धाओं के संग बनायी गयी

जंग की उन विराट योजनाओं के वास्ते

जिन्हें अमल में उतारने के लिए

एड़ लगाते ही टूट गयी मेरे घोड़े की बाग

उदास होने दीजिए मुझे

समन्दर के ज्वार

और बर्फ़ीली चोटियों की दुर्गम चढ़ाइयों

और घने जंगलों को मथते बवण्डर के वास्ते

जिनसे टक्कर लिये बिना ही

निष्पन्द हो गया मेरा शरीर

दरअसल

मुझे उदास होने दीजिए

आपकी सच्ची खुशी के लिए

ताकि मेरे लिए ग़मग़ीन

आपके चेहरे पर दमक उठे

आदमी की यातनाओं के इतिहास को मेटने के लिए

आदमी की निश्छल कोशिश -

ताकि मेरे लिए उदास आपके चेहरे से खिल उठे

मौत के ख़िलाफ़

जीवन की जद्दोजहद का मासूम संकल्प

इसी से तो धधकती है

अन्तत: बेरोक परिवर्तन की आग

जिसमें संचित है हम सबके लिए

अनन्त प्रेम और राहत की सुखद धूप

हाँ , इसी धूप के जश्न में आज

मुझे थोड़ा उदास होने दीजिए , साथियों !

- महेश्वर

१८-३-८६ : पटना अस्पताल.

7 Responses to “आज मुझे थोड़ा उदास होने दीजिए , साथियों !- महेश्वर”


  1. 1 ghughutibasuti February 20, 2008 at 8:28 pm

    हम्म ! कविता सुन्दर है । विचार नहीं ।
    घुघूती बासूती

  2. 2 mehhekk February 20, 2008 at 10:00 pm

    bahut khubsurat kavita,kabhi udasi ki chadar odhana bhi thik hi hota hai.

  3. 3 इरफ़ान February 20, 2008 at 10:23 pm

    आपने महेश्वरजी की एक ऐसी कविता की याद दिलाई जो मुझे बरसों पीछे उन दिनों में ले गई जब वे मौत के साथ एक कडी जंग लड रहे थे. उनकी कुछ और भी कविताएँ यहाँ पढने को मिलेंगी इस

    विश्वास के साथ मैं महेश्वर जी की स्मृति को नमन करता हूँ.

  4. 4 chandrabhushan February 21, 2008 at 12:48 pm

    बहुत दिन बाद गुरू का लिखा कुछ पढ़ा। बहुत-बहुत शुक्रिया अफलातून भाई।

  5. 5 maithily February 21, 2008 at 2:48 pm

    कविता अच्छी लगी.
    आप जल्दी स्वास्थ्य लाभ कर शीघ्रातिशीघ्र आयें.
    इन्हीं कामनाओं के साथ

  6. 6 विनय प्रजापति February 21, 2008 at 7:24 pm

    जिसमें संचित है हम सबके लिए
    अनन्त प्रेम और राहत की सुखद धूप…

    यह अति सुन्दर भावना है जो हर किसी के मन में होनी चाहिए… सुन्दर रचना है…

  7. 7 प्रियंकर February 21, 2008 at 7:45 pm

    उदासी भीतर उतर जाती है . बहुत संक्रामक कविता . उदासी और उत्साह जीवन की जद्दोजहद में साथ-साथ चलते हैं — हाथ में हाथ डालकर .


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