तार के खंभे : भवानी प्रसाद मिश्र

[ 'भवानी प्रसाद मिश्र के आयाम' , संपादक लक्ष्मण केड़िया,विशेषांक 'समकालीन सृजन' , २० बलमुकुंद मक्कर रोड, कोलकाता - ७००००७ से साभार ]

तार के खंभे

एक सीध में दूर-दूर तक गड़े हुए ये खंभे

किसी झाड़ से थोड़े नीचे , किसी झाड़ से लम्बे ।

कल ऐसे चुपचाप खड़े थे जैसे बोल न जानें

किन्तु सबेरे आज बताया मुझको मेरी माँ ने -

इन्हें बोलने की तमीज है , सो भी इतना ज्यादा

नहीं मानती इनकी बोली पास-दूर की बाधा !

अभी शाम को इन्हीं तार के खंभों ने बतलाया

कल मामीजी की गोदी में नन्हा मुन्ना आया ।

और रात को उठा , हुआ तब मुझको बड़ा अचंभा -

सिर्फ बोलता नहीं , गीत भी गाता है यह खंभा !

- भवानी प्रसाद मिश्र

[ १९५९ ]

1 Response to “तार के खंभे : भवानी प्रसाद मिश्र”


  1. 1 विनय प्रजापति February 11, 2008 at 8:02 pm

    wow, great modern poem.


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