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तब कैसा मौसम ठंडा जी
आया फिर जाड़े का मौसम
लगता सबको ठंडा जी
खुले बदन फिर भी बैठे हैं
नदी किनारे पण्डा जी
मास्टर जी के हाथ कोट में
कहां गए वो डंडा जी
कहता है हर साल यही
गणतंत्र दिवस का झण्डा जी
हो सबके पास गरम कपड़े
तब कैसा मौसम ठंडा जी !
राजेन्द्र राजन
मानव मानव एक समान
मानव मानव एक समान
निर्धन हों चाहे धनवान
मानव मानव एक समान
चाहे गोरे हों या काले
मानव मानव एक समान
बनाएंगे हम ऐसी दुनिया
ऐसा सुंदर एक समाज
जिसमें न हों ऊंच नीच के
भेदभाव के रस्म-रिवाज
हम चाहेंगे मानव के सब
गल जाएं झूठे अभियान
मानवता का अर्थ यही है
मानव मानव एक समान ।
राजेन्द्र राजन
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8 Comments
February 8, 2008 at 2:05 pm
बहुत सुन्दर !
इस बार सौराष्ट्र मैं भी आया है
कैसा मौसम ठंडा जी
१० डिग्री पर गिरा है पारा
ना देखा ८ साल से
हमने मौसम ऐसा ठंडा जी !
घुघूती बासूती
February 8, 2008 at 3:38 pm
खूब पसंद आई आपकी कविता।
इस बार तो लगता है ठंड हर जगह अपने सारे रेकॉर्ड तोड़ रही है ।
February 8, 2008 at 6:04 pm
इस ठंडे मौसम में तो इस कविता को पढ़कर और भी अधिक ठंड लगने लगी है.:)
February 8, 2008 at 6:50 pm
बहुत अच्छी कविताएं . बच्चों के साथ-साथ बड़ों के लिए भी बहुत ज़रूरी कविताएं .
February 8, 2008 at 11:58 pm
bahut badhiya.aur thand lag rahi hai padhkar.
February 9, 2008 at 12:23 pm
बहुत सुंदर बाल गीत । मज़ा आया।
February 10, 2008 at 7:12 am
सचमुच सुन्दर रचनाएँ, पढ़कर बचपन-सी उमंग आ गयी!
September 29, 2008 at 11:44 am
[...] तब कैसा मौसम ठंडा जी – राजेन्द्र राजन [...]