Entries from February 2008

February 20, 2008

आज मुझे थोड़ा उदास होने दीजिए , साथियों !- महेश्वर

आज मुझे थोड़ा उदास होने दीजिए , साथियों !

उदास होने दीजिए मुझे
बदलने के लिए दर्द का जायका
घुटन का अहसास
ताकि कहीं-न-कहीं तो टूट सके
एकरसता का लम्बा सिलसिला

मुझे उदास होने दीजिए
ताप को चुनौती देते
अमलतास और गुलमुहर के बाग़ी फूलों से
अँकवार भरकर भेंटने के वास्ते
हो सकता है जब तक मैं उन तक पहुँचूँ
बेगाने मुसाफ़िर-सा गुज़र जाये गुस्ताख़ मौसम

उदास [...]

February 11, 2008

तार के खंभे : भवानी प्रसाद मिश्र

[ 'भवानी प्रसाद मिश्र के आयाम' , संपादक लक्ष्मण केड़िया,विशेषांक 'समकालीन सृजन' , २० बलमुकुंद मक्कर रोड, कोलकाता - ७००००७ से साभार ]
तार के खंभे
एक सीध में दूर-दूर तक गड़े हुए ये खंभे
किसी झाड़ से थोड़े नीचे , किसी झाड़ से लम्बे ।
कल ऐसे चुपचाप खड़े थे जैसे बोल न जानें
किन्तु सबेरे आज बताया मुझको [...]

February 10, 2008

डेढ़ रुपए के अनूठे सिक्के का राज

    इस सिक्के ने लाजमीतौर पर पाठकों का ध्यान खींचा । हमारे देश में साक्षरता की कमी और अल्प-साक्षरता के कारण जिनके हाथ यह सिक्का लगा उनमें से कइयों ने इसे डेढ़ रुपए का सिक्का माना ।
    लावण्या जी, यह सिक्का नकली नहीं है और न ही तृटिपूर्ण है , फिर भी अनूठा तो है ही ।तृटिपूर्ण [...]

February 9, 2008

डेढ़ रुपए का सिक्का

आपने यह सिक्का देखा है ? इसके पृष्ट भाग पर 150 अंकित है और यह 2004 में टकसाल से निकला है । मेरे घर के कपड़े लोहा करने वाले मित्र मनोज को कल जब इस सिक्के को दिखाया तब उसने कहा,’डेढ रुपए के सिक्के के बारे में सुना जरूर था,पहली बार देख रहा हूँ।’
मैंने कल [...]

February 8, 2008

तब कैसा मौसम ठंडा जी !

Technorati tags: बाल कविता, बच्चों की के लिए, राजेन्द्र राजन, rajendr rajan, kid’s poetry, hindi nursery rhyme

 
तब कैसा मौसम ठंडा जी
आया फिर जाड़े का मौसम
लगता सबको ठंडा जी
खुले बदन फिर भी बैठे हैं
नदी किनारे पण्डा जी
मास्टर जी के हाथ कोट में
कहां गए वो डंडा जी
कहता है हर साल यही
गणतंत्र दिवस का झण्डा जी
हो सबके पास [...]