सुनाऊं तुम्हे बात एक रात की,
कि वो रात अन्धेरी थी बरसात की,
चमकने से जुगनु के था इक समाँ ,
हवा में उड़ें जैसे चिनगारियां ।
पड़ी एक बच्चे की उस पर नज़र ,
पकड़ ही लिया एक को दौड़ कर ।
चमकदार कीड़ा जो भाया उसे ,
तो टोपी में झटपट छुपाया उसे ।
तो ग़मग़ीन कैदी ने की इल्तज़ा ,
‘ओ छोटा शिकारी ,मुझे कर रिहा ।
ख़ुदा के लिए छोड़ दे ,छोड़ दे ,
मेरे कैद के जाल को तोड दे ।’
-”करूंगा न आज़ाद उस वक्त तक ,
कि देखूं न दिन में तेरी मैं चमक ।”
-”चमक मेरी दिन में न पाओगे तुम ,
उजाले में वो तो हो जाएगी गुम ।
न अल्हड़पने से बनो पायमाल -
समझ कर चलो- आदमी की सी चाल” ।
-अल्लामा इक़बाल ।

Jugnu ji ek bhaut hi achhi kavita aur sandesh aapki taraf se
thnx
Meri pariticriya mujhe to dikhayi nahi di kisi ko dikhayi di kya?
बहुत सही कविता दी भाई साहब । आनंद आ गया ।
बहुत अच्छी रचना पढ़वाने के लिए शुक्रिया।
वाह जी, अल्ल्मा इकबाल जी की कविता पढ़वाने का बहुत आभार. और लाईये इस तरह की रचनायें.
बाल कविता और संदेश बड़ा !
बहुत ख़ूब !!