जुगनू : अल्लामा इक़बाल की बाल कविता

सुनाऊं तुम्हे बात एक रात की,

कि वो रात अन्धेरी थी बरसात की,

चमकने से जुगनु के था इक समाँ ,

हवा में उड़ें जैसे चिनगारियां ।

पड़ी  एक बच्चे की उस पर नज़र ,

पकड़ ही लिया एक को दौड़ कर ।

चमकदार कीड़ा जो भाया उसे ,

तो टोपी में झटपट छुपाया उसे ।

तो ग़मग़ीन कैदी ने की इल्तज़ा ,

‘ओ छोटा शिकारी ,मुझे कर रिहा ।

ख़ुदा के लिए छोड़ दे ,छोड़ दे ,

मेरे कैद के जाल को तोड दे ।’

-”करूंगा न आज़ाद उस वक्त तक ,

कि देखूं न दिन में तेरी मैं चमक ।”

-”चमक मेरी दिन में न पाओगे तुम ,

उजाले में वो तो हो जाएगी गुम ।

न अल्हड़पने से बनो पायमाल -

समझ कर चलो- आदमी की सी चाल” ।

-अल्लामा इक़बाल ।

6 Responses to “जुगनू : अल्लामा इक़बाल की बाल कविता”


  1. 1 shrddha September 6, 2007 at 11:35 am

    Jugnu ji ek bhaut hi achhi kavita aur sandesh aapki taraf se

    thnx

  2. 2 shrddha September 6, 2007 at 11:36 am

    Meri pariticriya mujhe to dikhayi nahi di kisi ko dikhayi di kya?

  3. 3 yunus September 6, 2007 at 4:47 pm

    बहुत सही कविता दी भाई साहब । आनंद आ गया ।

  4. 4 आभा September 6, 2007 at 5:05 pm

    बहुत अच्छी रचना पढ़वाने के लिए शुक्रिया।

  5. 5 समीर लाल September 6, 2007 at 8:54 pm

    वाह जी, अल्ल्मा इकबाल जी की कविता पढ़वाने का बहुत आभार. और लाईये इस तरह की रचनायें.

  6. 6 Annapurna September 12, 2007 at 11:29 am

    बाल कविता और संदेश बड़ा !

    बहुत ख़ूब !!


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