मवालियों से भिडन्त : स्वामी आनन्द

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    निडरता तो कोई उनसे सीखे| ठाणा से कल्याण जाते समय खाड़ी पार करते ही
पारसीक की पहाड़ियों में एक बड़ी सुरंग आती है। ‘थ्रू’ गाड़ी इस सूरंग से तथा
लोकल ट्रेन पुराने रास्ते से खाड़ी के किनारे से सट कर पहाड़ी का चक्कर लगा
कर जातीं । लोकल के पहाड़ पार करते ही पहा्ड़ियों से घिरा मुंबरा स्टेशन आता।
पुणे जाने वाली सड़क यहीं रेलवे लाइन से लग कर स्टेशन के पास से पनवेल की
ओर जाती। स्टेशन अलग- थलग, एकांत तथा बियाबान जगह है। दिन के उजाले में भी
अकेले चलने में डर लगता। एक ओर ७०० फीट उंची सीधी चट्टानों से बने पहाड़
की शृंखला तथा उसकी गोद में विशाल वृक्षों की घटाओं में छिपा वह स्टेशन।
बस्ती में सिर्फ दो-पांच चाय-नास्ते की ‘होटल’ और बीड़ी-पान-तमाकु की
दुकानें । और कुछ भी नहीं। मात्र मुंबई-पूना लाइन की जब्बर ट्राफिक वाला
मस्त बड़ा ट्रंक मोटर रोड ।
    मुंबई के तड़िपार मवाली और गुंडे बदमाशों ने यहां जुए का अड्डा जमा रखा
था। हर एक पैसेन्जर बस यहां रुकती। ड्राइवरों को जुआरियों ने मिला रखा
था। पैसेन्जर विरोध करें, हल्ला मचाएं, फिर भी बसों को यहीं रोक दिया
जाता।
    चाय, बीडी, पान तमाकु के लिए उतरने वाले पैसेन्जरों को मवाली खड़े-खड़े एक दो
दांव खेलने के लिए बुलाएं, ललचाएं, धमकाएं। जरूरत पड़ने पर छूरा दिखा कर
भी खेलने को मजबूर करें ।  कुछ लालच तो कुछ जोर जबरदस्ती कर के मिनटों में
जेब खाली करवा दें ।
    स्व. प्यारेअली शेठ मुंबई के चकला स्ट्रीट में फर्नीचर के व्यापारी थे ।
पुराने खानदानी रईस , खोजा गृहस्थ। गांधीजी के मित्र और परम भक्त। संपूर्ण
खादीधारी। गांधीजी के सत्संग लाभ के लिए कभी-कभी पति-पत्नी दोनों साबरमती
आश्रम आकर रहते। हम सब उन्हें भली भांति जानते थे । मुंबरा से दो मील आगे
पनवेल की दिशा में कौसा गांव में उनका बगीचा, बंगला और एस्टेट था ।
ठाणा आश्रम की स्थापना के समय से ही अपनी कौसा गांव की एस्टेट आते-जाते
प्यारेअली शेठ तथा उनकी बेगम नूरबानू बहन कई दफ़ा आश्रम में झांक कर हम सब
की कुशल मंगल अवश्य लेते। छोटुभाई के लिए तो कल्याण, पनवेल, कौसा, मुंबरा
गांव का इलाका तो उनके स्थाई कार्यक्षेत्र का इलाका था। आते-जाते स्वयं
कौसा एस्टेट पर कई बार रात गुजारा करते।
    आते-जाते उन्होंने मुंबरा स्टेशन पर इन तडिपार मवालियों के जुए के अड्डे
का तमाशा तथा पैसेन्जरों की दुर्दशा देखी। तुरंत ही ठाणा पुलिस
अधिकारियों से मिल कर जांच चालू कर दी। ऊपरी पुलिस अधिकारियों से भी मिले।
पता चला कि मुंबई का जुआ निरोधी कानून ठाणा की खाड़ी के उस पार लागू
नहीं होता । इसीलिए इन जुआरियों ने मुंबरा स्टेशन वाले एकांत निर्जन स्थान
को अपने धंधे के लिए अनुकूल समझ कर चुना था ।
    महिनों तक इस बुराई के पीछे लगे रहे। छह महिने तक कौसा एस्टेट को अपना
मुख्यालय बना कर रहे। न सोये न ही ठाणा की पुलिस को सोने दिया । पुलिस के
गोरे बड़े अधिकारी को आधी रात को नींद से जगा कर पुलिस दस्ते को अपने साथ
ले कर अचानक छापा डलवा कर पुलिस के सामने सबूत पेश किया करते । पुलिस के पास
किसी प्रकार का बहाना न रहे इस बात का ध्यान रखते। रात दिन उठा पटक कर
जुआ निरोधक कानून को ठाणा से आगे लागू करवाने के लिए पुलिस विभाग को
बाध्य किया ।
    मवालियों ने भी अनेक बार उन्हें मारने तथा उनकी हत्या करने की कोशिश की।
एक बार तो उनमें से एक ने ठाणा स्टेशन से दिन दहाड़े चलती ट्रेन के दरवाजे
के पटिया पर च्ढ़ कर उनका नाक काट लिया था । लेकिन नाक टूटा नहीं। सिर्फ
ट्रेन के झटके से वह नीचे गिर गया और प्लेटफार्म पर भागते हुए पकड़ा गया।
छोटुभाई अपने हाथ से काते हुए सूत की गठरी उस झमेले में खो कर घर लौटे।
नाक पर दांत के निशान लगे थे। मरहम पट्टी के बाद कुछ ही दिनों में सब मिट गया।
लेकिन छोटुभाई को यह ठीक न लगा। घटना के दिन आश्रम में आते ही मुझसे कहा
(और बाद में जब भी इस बारे में बात निकले तो कहते):
“स्वामी यह तो विक्टोरिया क्रोस पाने का मौका था। लेकिन किस्मत ने साथ न दिया।”
वह बदमाश प्लेटफार्म पर ही पकड़ा गया था। लेकिन छोटुभाई ने पुलिस में
शिकायत नहीं लिखवाई। वैसे पुलिस केस तो हुआ। उसे सजा भी हुई।
लेकिन वह तो शायद उसकी पच्चीसवीं सजा रही होगी।

( जारी )

3 Responses to “मवालियों से भिडन्त : स्वामी आनन्द”


  1. 1 अरूण August 27, 2007 at 5:20 pm

    दरअसल इस देश मे छोटू भाई जैस को विपदाओ का ही सामना करना पडता है यही विडंबना है..

  2. 2 ghughutibasuti August 28, 2007 at 12:58 am

    बहुत अच्छा लगा ऐसे व्यक्तियों के बारे में जानकर ।
    घुघूती बासूती

  3. 3 सागर चन्द नाहर August 28, 2007 at 3:09 pm

    छॊटू भाई के व्यक्तित्व के बारे में जानना बहुत लग रहा है।


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