छोटुभाई : आदिवासी सेवा-९ : स्वामी आनन्द

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    ठाणा जिला यानि दमणगंगा से वसई की खाड़ी तक , दक्षिण गुजरात के घुटने
से ले कर पैर तक का अरब सागर और सह्याद्री की दीवार के बीच का इलाका।
पहाड़, समुद्र , खाड़ी और घने जंगल से भरा हुआ। चालीस प्रतिशत जनसंख्या वारली
काथोडी एवं अन्य आदिवासी जातियों की। इन आदिवासियों के बीच ठाणा के गांधी
आश्रम के लिए छोटुभाई ने काम शुरू किया।
    आश्रम की स्थापना छोटुभाई की हिम्मत की ताकत के बूते मैंने ही की थी। पहाड़ी इलाका।आदिवासी जंगल में से लकड़ियां तोड कर कोयला बनाते। ठेकेदारों के जुल्म और सितम की कोई सीमा नहीं थी। मुंबई शहर के २०-२५-३० मील की दूरी पर ऐसे लोग बसते थे जिन्होंने अपने जीवन में कभी रेल गाड़ी से सफर नहीं किया था।  भीतरी  गांवों में तो ऐसे भी लोग थे जिन्होंने अपने जीवन में कभी रेलगाड़ी देखी तक नहीं थी ।

    इन आदिम जातियों में काथोडी जाति के लोगों की अवस्था सब से आदिम। १००-१५०
शब्दों से बनी भाषा। खेती करना नहीं जानते थे । एक जगह टिक कर न रहते। जंगलों
में शिकारी पशु की तरह भोजन की तलाश में घूमंतू जीवन गुजारने वाले। सांप, छछुंदर, तिलचट्टा, गिरगिट, कुछ भी दिखा तो शिकारी जानवर की भांति झपट कर पकड़ लेते।
    ऐसी काथोड़ी जाति के लोगों ने पिछले १०० बरसों में जंगल की लकड़ी से  कोयला
बनाना सीख लिया । इस कला में वे इतने माहिर हो गए कि कोई अन्य उनका
मुकाबला न कर सकता था । लेकिन यही हूनर अमरीका के हब्शियों की तरह उनके गले
का फंदा और पैरों की बेड़ियां बन गया। काथोडी जंगल के ठेकेदारों के गुलाम बन गए। ठेकेदार के मुलाजिम उन्हें उनकी बीवी-बच्चों के साथ, गाय-बकरी की तरह जंगल के एक छोर से दूसरे, जहां कहीं भी कोयला बनाने का काम चलता हो, हांक कर ले जाते। एक बोरी कोयला बनाने की दो आना मजदूरी दे्ते। बोरी भी ३६ इंच की जगह ५४ इंच की सिलते और नाप भी उसी की । ठेकेदार आपस में इन काथोड़ियों की  १०-१२ रुपए प्रति व्यक्ति खरीद फरोख्त भी करते। दो आना मजदूरी के बदले, चावल मिल से राई के आकार के चावल के टुकड़े, जिसमें प्रचुर मिट्टी और कंकड़ मिला होता, जिसे सिर्फ़ मुर्गी तथा बतख को दाने के रूप में खिलाया जाता है- दो आना पाव की दर से देते। इसी की राब बना कर काथोड़ी अपना पेट भरते। ठेकेदार ऐसा चूरा चावल ट्रकों में भर कर चावल मिलों से लाते और उसे जंगल के अपने गोदामों में रखते।
    कोयला बनाने के काम में न लगे काथोडी जंगल में लकडी काटने का काम करते।
वारली जाति के खेतिहर आदिवासियों के पास बैल गाड़ियां जिससे वे जलावन की
लकड़ी तथा कोयला स्टेशन या बंदरगाह पहुंचाते ।
    जब से अंग्रेजी हुकूमत के नीचे मुंबई फलने-फूलने लगा तब से ठाणा जिला के सवर्ण, कोंकणी-मुसलमान लोगों में से पढे-लिखे तथा अनपढ़ मगर व्यापार बुद्धि से तेज ऐसे लोग जंगल की लकड़ी, कोयला आदि के व्यापार में लग गए तथा जंगल में रहने वाले आदिवासियों को गुलाम बना कर उनका खून चूसकर तगड़े होते गए।
    एक ही उदाहरण देता हूं। लगभग पचास साल पहले, एक व्यक्ति जो एक आना दिहाड़ी
पर मजदूर, दो आना पर हरवाहा और पांच आना रोज पर बैलगाड़ी भाड़े पर चलाने
वाला ,वन प्रदेश में रहने वाला गंवार जब बड़ा धनपशु बन कर मरा तब वह अपने पीछे सैंकड़ों वर्ग मील के जंगल, ३,००० एकड़ धान की खेती, इमारत की लकड़ी तथा कोयला एवं नमक की खेती के धंधे में लगे तीन हजार वारली, काथोड़ी गुलाम और रोकडा मिला कर ५० लाख से भी ज्यादा कीमत की संपत्ति छोड कर गया । लखपति बन कर घूमने लगा तब तक तो वह हस्ताक्षर की जगह अंगूठे का निशान लगाया करता था।
     अब तो हालात बिलकुल बदल गए हैं। लेकिन चालीस साल पहले जंगल के भीतरी भाग
में रहने वाले काथोडियों के हालात ‘अंकल टॉम्स कैबिन’ में वर्णित अमरीका के हब्शियों के जैसे थे। पेड से बांध कर मरते दम तक कोड़े मारना और कोयले की भट्ठी में काथोड़ियों को जिंदा जला देने के किस्से भी हमने सुने थे।

 

१०
    यह काम छोटुभाई ने हाथ में लिया और मानो उन्हें पसंदीदा काम मिल गया। तीन महिने पैदल घूम घूम कर जंगल के एक-एक गांव के हाल जान लिए। आकर बोले:
“स्वामी, आज से हम बन गए मिशनरी।”
    यह मिशन उन्होंने पूरे १० साल चलाया। जब कभी किसी वारली काथोड़ी पर जुल्म
की बात सुनी कि जहां भी खड़े हों वहां से चल देते। जो सामने मिले उसे कहते ,”थोडा आश्रम में जा कर बोल देना या कहलवा देना कि छोटुभाई जंगल की ओर तफ़्तीश करने गए हैं।”
    फिर तो सुबह, शाम, रात, दिन, इक्का, बैलगाडी या पैदल कुछ भी हो, किसी बात
की परवाह न करना। न खाने का ठिकाना, न पीने का। नहाने-धोने, ओढ़ने- बिछाने
का साथ में लेने का तो सवाल ही नहीं खड़ा होता। ठाणा जिला में १२५ इंच से ज्यादा पानी बरसता और गर्मियों में तापमान ११० डिग्री। रात को भी पहाड़ गर्म हवा ऊगलते। ऐसे मौसम में वे दिन रात घूमते। जहां कहीं भी कुछ खाने-पीने को मिल जाता वहां रेगिस्तान के ऊंट की तरह तीन-चार दिन का खाना एक साथ पेट के थैले में भर लेते। नहीं मिला तो भूखे पेट ही रह जाते। भूखे-प्यासे घूमते रहते दो-दो तीन-तीन रोज, कभी कभी तो चार-चार दिनो के बाद बिना नहाए-धोए, बिना हजामत किए, धूल धक्कड से मैले कुचेले कपडों में पहचाने भी न जा सकें ऐसे लैला -मजनूं के भेस में घर लौटते। हम कहते:
“यह कैसे हाल बना कर आए हैं? जरा आईने के सामने खड़े हो कर देखिए तो
सही!” तो कहते:
“अधूरा छोड़ कर कैसे आता? आया हूं सब ठीक करकेड। अब भले ही वे चक्कर लगाते
रहें वकील, अधिकारी और मुंबई के सचिवालय तक का। छोटुभाई का खूंटा गाड़ कर
आया हूं। अब भले ही उसे हिलाते रहे बच्चू, छह-छह महिनों तक।”
एक-एक मामले की छोटी-छोटी बातों की जांच करते। लिफाफे से खत का मजमून
भांप लें। स्टेटमेन्ट लें, एफिडेविट करवाएं, कोई शहर का पढ़ा-लिखा पुलिस
अधिकारी, मेजिस्ट्रेट मिल गया तो उसका पीछा न  छोडें:
“चलो, मिस्टर, इतना स्टेटमेन्ट लेना है, एटेस्टेशन करना है, एफिडेविट करनी है।”
वे ना नुकुर करें तो आंख लाल कर कहें:
“बेटा चढा दूंगा। गलत फहमी मत पालना। यह है आदिवासियों का सोटूकाका। ठीक
से पहचान लो।”
वे थरथर कांपने लगते और गाय की तरह सीधे बन जाते।
बड़े से बड़े सरकारी अधिकारी उनसे डरते। उनके नाम मात्र से भयभीत रहते।
सारे वन इलाके में उनके नाम का डंका बजता।
    १९३७ के बाद राज्य सरकारों की स्थापना हुई। खेर साहब हमारे पुराने साथी
रह चुके थे। अनेक सामाजिक कार्यों से जुड़े हुए तथा ठाणा आश्रम के भी वे एक ट्रस्टी थे। ठक्कर बापा के साथ मिल कर उन्होंने इस इलाके में ‘आदिवासी सेवा मंडल’ की स्थापना की इससे पहले छोटुभाई ही जंगलवासियों के एक मात्र त्राता थे। उन्होंने दो ही वर्षों में यहां के ठेकेदारों, जमीनदारों तथा उनके चमचे सरकारी अधिकारियों के छक्के छुडा दिए थे।
    दो-तीन साल बाद सरकार बद्ली तो काम थोडा आसान हो गया। मुख्य मंत्री खेर
साहब आदिवासियों के हमदर्द थे। उनके चारों और कार्यकर्ताओं की जमघट लग गई।
जंगल के जुल्म कम हुए। आदिवासियों को भी मजदूरी के रुपए मिलने लगे।
(जारी)

पिछले संस्मरण : एक , दो , तीन

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