‘शैशव’ पर अतिक्रमण और शैशव की ताकत

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    दुनिया के बच्चों से इस चिट्ठे पर पहले भी माफी माँगी है । ‘शैशव’ पर अक्सर बड़े बच्चों और छोटी जवानी द्वारा अतिक्रमण हुआ । सरासर गुण्डई ! गुण्डा यानी जो कमजोर को सताये लेकिन मजबूत के पाँव चाटे । बताइए, अन्य दो चिट्ठों पर बचपन को घुसने नहीं दिया गया । एक बार छोटी जवानी के एक मित्र ने बचकानेपन का आरोप जड़ दिया । बस, इसीलिए उसका जवाब ‘शैशव’ पर दे दिया ! यह तो गुण्डई भी नहीं विशुद्ध अल्हड़पन हुआ ।

    बहरहाल , गुण्डई का मुकाबला करने के लिए ताकत की जुगाली कर रहा हूँ । शहरी बच्चों को बता देना चाहिए , ‘ धड़ाधड़ जो चरा है उसे दिन-भर , आराम से चबा-चबा कर पचाने की प्रक्रिया को जुगाली कहा जाता है ‘।

    इस चिट्ठे पर शुरु से ही ‘kids’ poems’ ,’hindi nursery rhymes अथवा ‘hindi poems children’ आदि खोजते हुए लोग पहुँचे । बच्चों की कविताओं वाले एक अन्य चिट्ठे (अब निष्क्रीय)  पर की गयी टिप्पणियों के जरिए भी लोग अक्सर ‘शैशव’ पर पहुँचे । इस मटर-गश्ती में अल्लामा इक़बाल , भवानीबाबू व अन्य कवियों की कुछ छिम्मियाँ जरूर उनके हाथ लगती होंगी।मटर-गश्ती तो खरगोश किया करते हैं लेकिन इन दो अल्फ़ाज़ और उनसे जुड़ी क्रिया के कायल हम अब तक हैं ।

    अपने ऊपर और नीचे दोनों पीढ़ियों से शैशव को ताकत मिलती है , इस चिट्ठे को भी मिली । तीन साल की उम्र में ‘ ठंडी हवा चलेsss’ इस स्वरचित पंक्ति का सस्वर पाठ मौलिक धुन में गुनगुनाने वाली अथवा मेघाच्छादित किसी सुबह ,बिस्तर में लेटे खिड़कियों के शीशों से बाहर देख कर , ‘चारों तरफ अँधेरा छाया ,न कोई रोशनी,न सबेरा आया’ खुद की इन पंक्तियों को गाने वाली मेरे जिगर का टुकड़ा प्योली,मेरी बेटी ।

    पिताजी की चड्डी का नाड़ा पकड़ गंगा में पाँव छपछपाना और फिर खिड़किया घाट से घर तक की ऊँची चढ़ान उनके कन्धों पर सवार ,उनकी गंजी हो रही खोपड़ी पर तबला बजाते हुए लौटना । पिताजी का बचपन गाँधीजी के आश्रमों में गुजरा । उस दौर के अत्यन्त रोचक संस्मरण ‘बापू की गोद में’ नामक एक छोटी किताब में छपे हैं।’शैशव’ पर पूरी किताब ले ली,उसका एक ‘किताब-चिट्ठा’ भी बना दिया । चिट्ठेकार अनुनाद सिंह ने इस किताब को हिन्दी विकीपीडिया पर चढ़ा दिया है ।

    १९४२ में चौदह वर्ष की उम्र में मेरी माँ, उत्तरा जेल गयीं , दो साल वहाँ रहीं । तालीम वहीं मिली परिवार के अन्य बड़ों से । वे साथ में बन्द थे। आकाश में ‘कालपुरुष’ अथवा सप्तर्षि-मंडल’ की पहचान उसी जेल वाले ज्ञान से वे करातीं।शरदचन्द्र और शेक्सपियर भी उन्होंने जेल में ही पढ़े थे। साहित्य आकदमी का पुरस्कार पाने वाली गुजराती रचनाओं का ओड़िया अनुवाद  करतीं।पिछले साल ऐसी एक किताब देखने को मिली जो उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई। बांग्लादेश की मुक्ति के पहले बंगबन्धु शेख मुजीबुर्रहमान के जीवन पर प्रकाश डालते हुए उनका लिखा एक लेख ‘तरुण मन’ में छपा था,याद पड़ता है। सुकुमार राय का बाँग्ला बाल-साहित्य उन्हीं की वजह से हमारे शैशव में अहम स्थान पा सका।

    ‘शैशव’ पर इस एक साल में कुल ६५ प्रविष्टियां हुईं और १९२ टिप्पणियाँ ।एक दिन में सर्वाधिक १३७ दर्शन हुए। दिसम्बर में ‘नारद’ पर जगह मिलने के पहले तक मात्र १ टिप्पणी मिली थी। राजनीति के प्रत्यक्ष दायरे से बाहर के कुछ विषयों पर भी इस चिट्ठे पर लिखा गया। सूची प्रस्तुत है ।

कविता

चार कौए उर्फ़ चार हौए ,भाईचारा,कठपुतली – भवानी प्रसाद मिश्र , सूरज का गोला - भवानी प्रसाद मिश्र ,  नल की हडतालजुगनू : अल्लामा इक़बाल की बाल कविता , मेहनतकशों का अपूर्ण ककहरा : रामकुमार कृषक , ‘चार कौए उर्फ़ चार हौए’ : [ चिट्ठालोक के बहाने ] , चौराहे पर रुकने की बात : कविताएँ , रिश्ते की खोज : सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, तुलना :दुष्यन्त , एक चिड़ा और एक चिड़ी की कहानी : जेपी ,  विफलता : शोध की मंजिलें : जयप्रकाश नारायण ,

चित्र

  कोक – पेप्सी विरोधी सभा में शैशव , बापू की गोद में : कुछ चित्र , जाड़े की धूप , मेरी बगिया , मेरी बगिया ( २ ) ,  एकलव्य -सम्मान ,

संस्मरण

बापू की गोद में : ले. नारायण देसाई : बापू की गोद में (२): प्रभात - किरणें , प्रभात किरणें (जारी ) , पूरे प्रेमीजन रे : बापू की गोद में (३) , पूरे प्रेमीजन रे ( २ ) : बापू की गोद में , हर्ष – शोक का ब‍ंटवारा : बापू की गोद में ( ४ ) , हर्ष शोक का बँटवारा ( २ ) , स्नेह और अनुशासन : बापू की गोद में ( ५ ) , स्नेह और अनुशासन ( २ ) , १९३० – ‘३२ की धूप – छाँह : बापू की गोद में (६ ) , नयी तालीम का जन्म : बापू की गोद में (७) , बापू की प्रयोग – शाला : बापू की गोद में (८) , यज्ञसंभवा मूर्ति : बापू की गोद में ( ९ ) , अग्निकुण्ड में खिला गुलाब : बापू की गोद में (१०) , वह अपूर्व अवसर : बापू की गोद में (११) , वह अपूर्व अवसर (२) , मोहन और महादेव : बापू की गोद में (१२) , बापू की गोद में (१३) : भणसाळीकाका , भणसाळीकाका (२) , बापू की गोद में (१४) : मैसूर और राजकोट , मैसूर और राजकोट (२) , बापू की गोद में (१५) : मेरे लिए एक स्वामी बस है ! , बापू की गोद में (१६) : परपीड़ा , बा , बा ( २) , बापू की गोद में (१८) : दूसरा विश्व-युद्ध और व्यक्तिगत सत्याग्रह , बापू की गोद में (१९) : आक्रमण का अहिंसक प्रतिकार , बापू की गोद में (२०) : जमनालालजी , बापू की गोद में (२१) : ९ अगस्त , १९४२ , बापू की गोद में (२२) : अग्नि - परीक्षा , बापू की गोद में : पुस्तक समर्पण , बापू की गोद में : प्रकाशकीय , बापू की गोद में : प्राक्कथन : दादा धर्माधिकारी 

खेल – खेल में थोड़ी सी राम-कहानी ,  बचपन की कुछ यादें , महादेव से बड़े : ले. स्वामी आनन्द , रेल – पुराण (२) : स्वामी आनन्द

खेल \ बुझौव्वल

विविध भारती के श्रोताओं के लिए एक बुझौव्वल , विविध भारती बुझौव्वल के परिणाम ,  एक बुझौव्वल फ़िल्मों पर , गूगल ने कर दिया मण्ठा ,

व्यक्तित्व

पू. साने गुरुजी का समग्र साहित्य हिन्दी में

एकलव्य -सम्मान , जिद्दू कृष्णमूर्ति की जबानी ,

चिट्ठाकारी

प्रिय अनूप , ‘अप्रिय निर्णय’ और असहाय सच , पचखा-मुक्त एग्रीगेटरों से जुड़ें ,ट्राफ़िक बढ़ायें ,

विद्या – बुद्धि कुछ नहीं ‘पास’ ,

विविध

नाम : स्फुट विचार ,  गाय नहीं , ‘काऊ’ : ले . सुनील , महारानी अंग्रेजी , दासी हिन्दी : ले. सुनील ,

7 Responses to “‘शैशव’ पर अतिक्रमण और शैशव की ताकत”


  1. 1 Shastri JC Philip August 14, 2007 at 8:03 pm

    कृ्पया इस सूची को बगलपट्टी पर या “परिचय” मे डाल कर इसे स्थाई बना दें जिससे नये पाठकों को भी ये लेख दिख जायें — शास्त्री जे सी फिलिप

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.Sarathi.info

  2. 2 उन्मुक्त August 16, 2007 at 1:18 pm

    साल पूरा करने पर बधाई

  3. 3 प्रियंकर August 16, 2007 at 3:56 pm

    हिंदी समाज में बच्चों की उपेक्षा का ही एक रूप है हिंदी में अपेक्षित मात्रा में बाल और किशोर साहित्य न होना . बांग्ला में तो कोई बड़ा लेखक कहला ही नहीं सकता अगर उसने प्रचुर मात्रा में बाल और किशोर साहित्य न रचा हो .

    अतिक्रमण के बावजूद ‘शैशव’ में पर्याप्त मात्रा में बाल/किशोरोपयोगी सामग्री है जो उन्हें लॉलीपॉप साहित्य से अलग, अपने समय और समाज से जोड़ने का ज़रूरी काम करेगी . खास तौर पर नारायण भाई देसाई की ‘बापू की गोद में’ सीरीज़ तो बहुत ही प्रेरक और आवश्यक पाठ्य सामग्री है .

    एक रिक्त स्थान को भरने के सार्थक प्रयास के लिए और इस खाली स्थान को बच्चों की रिहाइश के अनुकूल स्थान बनाने के लिए हार्दिक बधाई!

  4. 5 श्रीश शर्मा August 16, 2007 at 5:12 pm

    आपके संस्मरण जानना रुचिकर रहा।

  5. 6 अभय तिवारी August 16, 2007 at 9:11 pm

    बड़े हो जाओ का आशीर्वाद कैसे दे दूँ..ये तो उल्टा शैशव का अस्तित्व मिटाने वाला शाप हो जाएगा..बने रहो कैसा रहेगा.. मगर लिखने वाले की बुज़ुर्गियत का मामला फिर भी नहीं सुलझता.. तो बधाई ही ले लीजिये..वही सुरक्षित राह है.. बधाई..!!

  6. 7 ghughutibasuti August 17, 2007 at 1:06 am

    इस अद्भुत श्रृंखला बापू की गोद में को पढ़ते समय लगा कि मैं किसी और ही संसार में चली गयी हूँ । मेरे कुछ सुझाव हैं …
    १ विभिन्न पात्रों की एक सूची बनाकर उनका परिचय भी दीजिये ।
    २ यदि हो सके तो फोटो भी दीजिये ।
    मुझे बहुत और पढ़ना है, तब और कुछ कह पाऊँगी । अभी तो मैं आपके पिताजी के शैशव में ही हूँ । दो अध्याय बा पर भी पढ़े । एक बार आप स्वयं देखकर बताइये कि क्या सब अध्यायों के एक के बाद एक आने का कुछ साधन हो सकता है या क्या मैं ही गल्ती कर रही हूँ और कुछ आगे पीछे पढ़ रही हूँ ।
    स्वतंत्रता संग्राम के इन महा नायकों से हमारी जान पहचान करवाने के लिए धन्यवाद । अब तक जो पढ़ती थी वह इतिहास सा लगता था किन्तु ये वर्णन जीवंत लगता है और कुछ देर के लिए भूल जाती हूँ कि यह बहुत पुराने समय की बात है । इस लेखन को पढ़कर गाँधी जी कुछ और मानवीय लगने लगे
    हैं ।
    हो सके तो नारायण देसाई जी की लिखी पुस्तकों की एक सूची भी दें और वे किस किस भाषा में उपलब्ध हैं भी बताइये ।
    कुछ कविताओं के प्रिन्ट आउट्स ले लिए हैं । जितनी अधिक बाल्य कविताएँ यहाँ डाल सकें उतना ही अच्छा लगेगा ।
    घुघूती बासूती


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