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पिछले प्रसंग से आगे :
उन्हीं दिनों ठेकेदार ने अपने बाप के गांव में बगीचे में खाद के लिए वैगन भर कर बकरी की लीद पारडी भेजी । रेलवे रसीद में ८० मन लिखवा कर उतने ही वजन का भाड़ा दिया जबकि वैगन में ३०० मन माल भरा । छोटुभाई ने वैगन का नम्बर तथा उसकी क्षमता लिख ली और सीधी जाने वाली मालगाडी से तत्काल वैगन रवाना कर दिया। कोई रसीद नहीं बनाई। मुनीम से कहा, “रसीद कल ले जाना । वैसे भी आज की डाक से तो रसीद जाने वाली नहीं है।” उसे पता था कि वैगन को पहुंचने में एक सप्ताह लग जाएगा।
दूसरे दिन मुनीम पता लिखा हुआ लिफाफा ले कर आया। छोटुभाई ने वैगन
के पूरे नाप के हिसाब से ४६३ बंगाली - मन लीद की रसीद बनाई और उसके
सामने ही लिफाफे में बंद कर डाक से रवाना करने भेज दिया ।
वैगन तो डेढ दिन में पारडी पहुंच गया था ; और रसीद पहुंचे इसके पहले ही
ठेकेदार के बाप ने वैगन खाली करा कर लीद बगीचे में डलवा भी दी थी। माल की
डेलिवरी न लेने का बहाना भी उसके पास नहीं बचा। ४६३ मन का भाडा चुकाने
में बुड्ढे की कमर टूट गई । कमाऊ बेटे को पुरानी रीति रिवाज के बाप ने
कैसी चिट्ठी लिखी होगी इसकी कल्पना पाठक-श्रोता कर लें।
उन बैलगाड़ी वाले भील आदिवासी लोगों पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ भी,
गांव-गांव घूम कर, लोगों के बयान तथा भाड़ा न चुकाई गई पर्चियों को जमा कर,
शिकायत पत्र पर सैंकडों भीलों के अंगूठे की छाप इकट्ठा कर गवर्नर-इन-काउन्सिल को भेजी। जांच की मांग उठाई। पूरा मामला साबित हुआ। उसे सारी की सारी रकम चुकता करनी पड़ी और भील जनता को भविष्य में रक्षा मिले इस आशय का सरकार के पास प्रस्ताव (GR) भी पारित करवाया ।
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इसी प्रकार का पानी अपने से ऊपर के बड़े से बड़े रेलवे अधिकारियों को उन्होंने अनेक बार पिलाया। एक भी मौका न जाने दें। ऐसे प्रकरणों की सृष्टि भी करें।एक बार फ्रन्टीयर के रस्ते विलायत की डाक तथा यात्रियों को लेकर हर शनिवार को आने वाले और हार्बर ब्रान्च की लाइन पर सीधा बेलार्ड पीअर पर लगे पी.एन्ड.ओ. कंपनी के मेल जहाज को डाक तथा यात्री पहुंचाने वाले ‘ओवरलैन्ड’ को माहिम-वड़ाला के पास घंटे भर खड़ा कर दिया था ! कंन्ट्रोल विभाग ने गलती से एक लंबतडंग माल गाड़ी को उसी पटरी पर जाने दिया था और फिर छोटुभाई पर फोन की झड़ी लगा दी कि मालगाड़ी के लिए गिराया सिगनल उठा
कर ओवरलैन्ड मेल को पहले जाने दें ।
छोटुभाई ने घिस कर ना कह दी । रेल नियमों का हवाला दिया। एक बार गिराया
गया सिग्नल तब तक नहीं उठाया जा सकता जब तक ट्रेन निकल न जाए। चर्चगेट के रेल मुख्यालय तक तहलका मच गया। ट्राफिक सुपरिन्टेन्डेन्ट, ट्राफिक मैनेजर, बड़े से बड़े अधिकारियों के फोन की घंटियां बजने लगीं:
वह कमबख्त ६० डिब्बों वाली गुड्स ट्रेन घोंघे की गति से चलती थी। तिसपर उसे वड़ाला यार्ड में जहां मुंबई, कुर्ला, बांद्रा, हार्बर लाईन की पटरियों की भूलभुलैया थी वहीं एक दर्जन से ज्यादा शंटिंग कर के साठों डिब्बों को बिखेर कर साइडिंग में जाना था। छोटुभाई ने आराम कुर्सी टेलिफोन के सामने रख कर ठंडे दिमाग से जवाब देना शुरू कर दिया। चर्चगेट के मुख्यालय से वे लोग बोलें:
“हलो, हलो, मि. छोटुभाई देसाई, स्टेशन मास्टर माहिम। हलो, मैं डी.टी.एस.
बोल रहा हूं।.. हलो, मैं ट्राफिक सुपरिन्टेन्डेन्ट बोल रहा हूं। हलो, मैं जनरल मैनेजर स्पीकिंग। हलो, मि. देसाई! आप अरजेन्सी समझ सकते हो। हलो, ओवरलैन्ड मेल रुका हुआ है। उसे कैसे रोका जा सकता है? हलो, बेलार्ड पीअर पर पी.एन्ड ओ. मेल को देरी हो रही है। वीकली होम बाउन्ड मेल स्टीमर। समझ रहे हैं न ? उसे कैसे देरी करा सकते हैं?”
छोटुभाई: एलाव, एलाव होम बाउन्ड हो या हेवेन बाउन्ड; खुद ब्रह्मा हो तो भी खड़ा कर दूंगा। एलाव, मैं छोटुभाई देसाई, माहिम स्पीकिंग। एलाव, एलाव, एक बार सिग्नल गिराने के बाद पटरी पर खड़ी गाड़ी जब तक अगले स्टेशन पर न पहुंच जाए तब तक उसे नहीं उठाया जा सकता। इसमें किसी को भी डिस्क्रीशन का अधिकार नहीं है।रीफर टू रेल्वे रेग्युलेशन्सस। एलाव, मेल लेट हो तो चल सकता है, दुर्घटना हो तो नहीं चल सकता। हां। Delay can be explained, accident cannot be explained. (गुजराती में) ऐसे समय तो तुम बच्चू लोग सभी खिसक जाओगे, और छोटुभाई अकेले को लटकना पडेगा!
“हलो, हलो, मि. छोटुभाई देसाई ! मैं आपको हुक्म देता हूं, सिगनल उठा कर
ओवरलैन्ड मेल को जाने दो। अपने ऊपरी अधिकारियों का आपको कोई डर नहीं है
क्या? आपको पछताना पड़ेगा। रीज़नेबल बनो। समय पहचानो। आप समझदार व्यक्ति
हो । “
“एलाव, एलाव। मैं समझदार व्यक्ति हूं इसीलिए तो समय समझ कर ही काम करता
हूं। आप ऊपरी अधिकारी जरूर हैं। लेकिन रेल नियमों के खिलाफ जाने का हुक्म
आप मुझे नहीं दे सकते। यदि आप ऐसा करें भी तो मैं नहीं मानूंगा। आप में
दम हो तो मुझे डिसमिस भले ही कर दो।”
(गुजराती में) “और जरा सुन लें …जहां तक डरने पछताने की बात है तो छोटुभाई जिस दिन अपना गांव छोड के निकला उसी दिन दीहण के हनुमानजी को तेल सिंदूर चढ़ा कर निकला था। समझ में आया? अब चुप चाप बैठे रहो — बड़ी कुर्सी पर।बोला-चाला रामकबीर !”
“य़ानि कि सॉरी। एलाव । मैं छोटुभाई देसाई स्टेशन मास्टर माहिम, स्पीकिंग.”
पूरे पचास मिनट के बाद सिग्नल उठाया गया। पी.एन्ड ओ. मेल स्टीमर एक घंटे
से भी ज्यादा देर से रवाना हुई।
बाद में महिनों तक इस लफ़ड़े का श्राद्ध पूरा करने में लगाया। छोटूभाई भैंसे की ताकत से लड़े और जीते। इतना ही नहीं, ऊपर से सत्ताधिकारियों से लिखित प्रशंसा भी प्राप्त की।
बड़े से बड़े अधिकारी छोटुभाई से हार मान कर नाक जमीन पर रगड़ते जहां तक हो
सके उनसे छेडखानी नहीं करते। कट कर चलते। मूर नामका एक गोरा अथवा अर्ध गोरा
अधिकारी उनके पीछे पड़ गया। ८७ चेतावनियां (caution), ४५ दंड और एक
तनख्वाह में कटौती (reduction), यह था उनकी उन तीन साल की कमाई का
रेकार्ड ! लेकिन छोटुभाई ने दिन रात कानूनी लड़ाई लड़ कर सत्ताधीशों की
नींद ऐसी हराम कर दी कि उन्हें उनकी हर सजा को रद करने को मजबूर होना
पड़ा । लेकिन इन सब दंड, लफ़ड़े तथा सजाओं का बाद में तो उन्होंने हिसाब ही
रखना छोड़ दिया था ।
नौकरी लगने के पहले दिन से रेल प्रशासन और विभाग के अधिकारियों के
पीछे वे जिस तरह हाथ धो कर पड़ गए वह रुका जब उन्होंने नौकरी छोड़ी और
जनसेवक बने तब ज्यों का त्यों वह तेवर कायम रहा । रेलवे मैन्युअल में देशी
कर्मचारियों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले native शब्द का विरोध करने से
लेकर एन्ग्लोइन्डियन, पारसी तथा हिन्दू कर्मचारियों के बीच, ग्रेड, प्रमोशन और युनिफॉर्म के कपड़े तक के मामलों में साम्प्रदायिक अन्याय एवं पक्षपात तथा ऊपरी अधिकारियों के जुल्म, तुनक मिजाजी स्वभाव एवं प्रशासनिक खामियों के कारण रोजमर्रा के कामकाज में होने वाले अनगिनत किस्सों में से ‘इस्यू’ खड़ा कर वे अंत तक लडते रहे; अनेक मामलों मे सत्ताधीशों को रेल नियमो में परिवर्तन करने को मजबूर होना पड़ा ।
वैसे अधिकारी उनसे त्राहीमाम कहते और कन्नी काट कर चलते और उन्हें न
छेड़ने में ही अपनी खैरियत समझते, फिर भी घटिया चरित्र के अधिकारियों के
अलावा ज्यादातर ऊपरी अधिकारियों के दिल में उनके लिए अपार श्रद्धा तथा आदर
भाव था। उनकी सच्चाई, भ्रष्ट न होने का गुण तथा ऊँचे चरित्र पर सबको
सम्पूर्ण विश्वास था। छोटुभाई को वे अपने रेल विभाग का आभूषण मानते थे।
[ जारी ]

अनोखी थी छोटू भाई देसाई की नियम और न्यायप्रियता . अनूठी थी उनकी ठसक . क्या आदमी थे . ‘रहिमन अब वे बिरछ कहं …….’
काश ऐसे अफ़सर अब भी होते।
मजा आ रहा है अगली कड़ी जल्दी प्रस्तुत करें।
छोटू भाई देसाई को हमारा सलाम,किन्तु रेलवे अधिकारियों से सहानुभूति भी है ।
घुघूती बासूती