विफलता : शोध की मंजिलें : जयप्रकाश नारायण

जीवन विफलताओं से भरा है ,

सफलताएँ जब कभी आईं निकट ,

दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से ।

 

तो क्या वह मूर्खता थी ?

नहीं ।

 

सफलता और विफलता की

परिभाषाएँ भिन्न हैं मेरी !

 

इतिहास से पूछो कि वर्षों पूर्व

बन नहीं सकता प्रधानमन्त्री क्या ?

किन्तु मुझ क्रान्ति-शोधक के लिए

कुछ अन्य ही पथ मान्य थे , उद्दिष्ट थे,

पथ त्याग के , सेवा के , निर्माण के,

पथ संघर्ष के , सम्पूर्ण क्रान्ति के ।

जग जिन्हें कहता विफलता

थीं शोध की वे मंजिलें ।

 

मंजिलें वे अनगिनत हैं ,

गन्तव्य भी अति दूर है ,

रुकना नहीं मुझको कहीं

अवरुद्ध जितना मार्ग हो ।

निज कामना कुछ है नहीं

सब है समर्पित ईश को ।

 

तो , विफलताओं पर तुष्ट हूँ अपनी ,

और यह विफल जीवन

शत - शत धन्य होगा ,

यदि समानधर्मा प्रिय तरुणों का

कण्टकाकीर्ण मार्ग

यह कुछ सुगम बन जावे !

- जयप्रकाश नारायण

( चण्डीगढ़ के कारावास के दिनों में ९ अगस्त , १९७५ को लिखी गयी)

6 Responses to “विफलता : शोध की मंजिलें : जयप्रकाश नारायण”


  1. 1 प्रियंकर July 24, 2007 at 12:05 pm

    यह कविता मैंने शायद बहुत पहले धर्मयुग में पढी थी . जयप्रकाश नारायण पर लिखी दिनकर जी की वह प्रसिद्ध कविता भी डालिए जो कभी हम सबका हृदयहार हुआ करती थी .

  2. 2 chandrabhushan July 24, 2007 at 12:15 pm

    अफलातून जी, गांधी संग्रहालय पटना के रज़ी अहमद साहब ने खुद का किया इसी कविता का उर्दू तर्जुमा मुझे 1994 में सुनाया था(74-आंदोलन की बीसवीं बरसी के मौके पर समकालीन जनमत के लिए की गई एक बातचीत के दौरान)। यह काफी दिलचस्प था- जेपी के उद्वेग को उर्दू नज्म की रवानी में ढालता हुआ। अगर कहीं यह आपको मिल जाए (शायद कभी छपा हो) तो जुटाकर रख लेना अच्छा रहेगा। मुझे शुरू की और आखिर की पंक्तियां (वह भी शायद कुछ टेढ़े-मेढ़े ढंग से)याद हैं-

    जिंदगी नाकामियों से है भरी
    कामरानी जब कभी आई है पास
    रास्ते से दूर ठुकराया उसे
    क्या हिमाक़त थी मेरी…
    ……
    ……
    काश जो हमवार कर पाया अगर
    हमसफर प्यारे जवानों की रहे-पुरख़ार को

  3. 3 ashish maharishi July 24, 2007 at 5:17 pm

    it’s really good poem

  4. 4 rachna July 24, 2007 at 5:49 pm

    जयप्रकाश नारायण जी को मेरे पापा अपना गुरु मानते थे . स्मिरिति ताजा हो गयी

  5. 5 paramjitbali July 25, 2007 at 12:41 am

    बहुत बढिया!

  6. 6 Brij July 31, 2007 at 2:14 pm

    बहुत अच्छा लगा | जयप्रकाश नारायण जी कि कुछ यादें ताजा हो गयी |

    “मंजिलें वे अनगिनत हैं ,
    गन्तव्य भी अति दूर है ,
    रुकना नहीं मुझको कहीं
    अवरुद्ध जितना मार्ग हो ।
    निज कामना कुछ है नहीं
    सब है समर्पित ईश को” ।


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