गाय नहीं , ‘काऊ’ : ले . सुनील

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हिन्दी भाषियों पर अंग्रेजी की सवारी

    यह वाकया इन्दौर का है , जहाँ मेरे चाचा रहते हैं । मेरा चचेरा भाई अपनी कार से मुझे बस स्टैण्ड तक छोड़ने आया । घर से निकलते वक्त उसकी दो साल की बिटिया भी साथ चलने को मचल गई । उसे भी साथ लेना पड़ा ।

वह गाड़ी चलाने में दिक्कत कर रही थी , सो मैंने उसे बहलाने के लिए खिड़की के बाहर गाय दिखाई । बात बनी नहीं । तब मेरे भाई ने मुझे सुधारते हुए उसे दिखाया , ‘देखो काऊ’।वह तुरंत बाहर ‘काऊ’ देखने लगी । समस्या हल हो गयी । लेकिन मेरे दिमाग में एक गम्भीर सवाल छोड़ गई । क्या आने वाले समय में भारत की नयी पीढ़ी का दुनिया से परिचय एक विदेशी भाषा में ही होगा ? हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं का कोई भविष्य है या नहीं ?

    वैश्वीकरण का जो हमला भारत के जनजीवन पर हो रहा है , उसके आर्थिक पहलुओं की तो काफी चर्चा होती रहती है । लेकिन इस हमले का एक महत्वपूर्ण आयाम सांस्कृतिक  है। एक जबरदस्त और बुनियादी हमला भाषा और शिक्षा के क्षेत्र में हो रहा है । पिछले दस-पन्द्रह सालों में अचानक देश में अंग्रेजी माध्यम के अधकचरे स्कूलों की बाढ़ आ गई है । एकदम गरीब तबके को छोड़कर ,जिसकी भी थोड़ी-बहुत हैसियत है , वह पेट काटकर भी अपने बच्चे को ‘इंग्लिश मीडियम’ में पढ़ाने की कोशिश कर रहा है । जो हिन्दी का गौरवगान करते हैं , हिन्दी की दुर्दशा पर आंसू बहाते हैं , जो हिन्दी के प्राध्यापक , लेखक या पत्रकार हैं यानी हिन्दी की ही रोटी खा रहे हैं , वे भी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा दिला रहे हैं । सबको डर है कि प्रतिस्पर्धा की दौड़ में उनकी संतानें पीछे न छूट जाँए। और उन्हें इस प्रतिस्पर्धा में एक ही प्रमुख कसौटी दिख रही है – अंग्रेजी का ज्ञान और उस पर अधिकार ,फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने की क्षमता । इस दौड़ में आगे निकलने के लिए बच्चों को शुरु से अपनी भाषा छोड़कर अंग्रेजी शब्द सिखाए जा रहे हैं , गिनती भी अंग्रेजी में सिखाई जाती है । कई बच्चे तो ऐसे हैं , जो अब हिन्दी (या अपनी मातृभाषा) में पढ़ना या गिनना नहीं जानते हैं , और अटक जाते हैं ।

    भारतीय जनजीवन और दिलोदिमाग पर अंग्रेजी का वर्चस्व कोई नया नहीं है । दो सौ साल की गुलामी ने भारतीय समाज और व्यवस्था पए अंग्रेजी साम्राज्य की इस भाषा की पकड़ और जकड़ बहुत मजबूत कर दी थी । आजादी के आन्दोलन , गांधीजी की राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ,और आजादी के बाद राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में अंग्रेजी हटाओ आंदोलन ने इस जकड़-पकड़ को कुछ ढ़ीला किया था , लेकिन अब वह दुगुनी मजबूती से कायम हो गई है । अब तो अंग्रेजी अखबार ही नहीं , उनकी नकल करने वाले हिन्दी अखबार भी बड़े गर्व से हमें सूचना दे रहे हैं कि चाहे चीन बाकी सब मामले में भारत से आगे हो , लेकिन अंग्रेजी जानने वालों की संख्या में भारत आगे है । अब चीन भी अपने लोगों को अंग्रेजी सिखाने पर जोर दे रहा है । गुलामी की एक खासियत यह होती है कि गुलाम अपनी गुलामी की स्थिति में ही खूबियाँ और उसका औचित्य ढूंढ़ने लगता है , उसका गुणगान करने लगता है । हम उसी अवस्था में पहुंचते जा रहे हैं ।

    पहले माध्यमिक शालाओं में पांचवी या छठी कक्षा से अंग्रेजी विषय की पढ़ाई शुरु होती थी । अब अमूमन सभी राज्य सरकारों ने अंग्रेजी की पढ़ाई पहली कक्षा से अनिवार्य कर दी है । हर बच्चे को पहली कक्षा से लेकर कॉलेज तक अनिवार्य रूप से अंग्रेजी पढ़ना ही है । ‘सर्व शिक्षा अभियान’ चलाने वाली सरकारें और बीच में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की चिन्ता में सेमिनार आयोजित करने वाले शासक भूल जाते हैं कि आज भी सबसे ज्यादा बच्चे अंग्रेजी और गणित में ही फेल होते हैं । बच्चों के लिए दोनों विषय इतने ज्यादा दुरूह हैं कि वे नकल करके भी इनमें पास नहीं हो पाते हैं । गणित का मामला कुछ अलग है , लेकिन अंग्रेजी के मामले में तो यह स्वाभाविक है । एक विदेशी भाषा को क्यों बच्चों पर थोपा जा रहा है ?

    बच्चों पर सबसे बड़ा अत्याचार तब हो जाता है , जब उन्हें अंग्रेजी सिर्फ एक विषय के रूप में नहीं , सारे विषय ही अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने पड़ते हैं । दिन-रात घर में अंग्रेजी बोलने वाले परिवारों की बात छोड़ दें , उनकी संख्या भारत में ०.०१ प्रतिशत से भी कम होगी। शेष सारे बच्चों के लिए अंग्रेजी माध्यम से पढ़ना दोहरा बोझ हो जाता है । दुनिया से उनका परिचय तो अपनी मातृभाषा में ही होता है । ऐसी हालत में ,अंग्रेजी में जो पाठ पढ़ाया जाता है , उसे समझने के लिए बच्चे को पहले उसे अपने दिमाग में अपनी भाषा में अनुवाद करना पड़ता है । अनुवाद के बाद विषय वस्तु को समझने की बारी आती है । अक्सर बच्चे भाषा में ही उलझ जाते हैं , विषय को समझने की बारी आती ही नहीं है । तब भी परीक्षा पास होने का दबाव बच्चों पर रहता है ।ऐसी हालत में वे रटने लगते हैं । लेकिन रटने की एक सीमा है ।असाधारण मेहनत की क्षमता वाले बच्चे तो रटकर अच्छे अंक ले आते हैं , बाकी बच्चों की क्षमता जवाब देने लगती है । शिक्षा उनके लिए बोझ और यातना बन जाती है । हमारी शिक्षा व्यवस्था का बोझिलपन और तोतारटन्त चरित्र सिर्फ अंग्रेजी के कारण नहीं है , लेकिन अंग्रेजी का उसमें एक प्रमुख योगदान है ।

    इंग्लिश मीडियम के इस जुनून में कैसी शिक्षा भारत के नौनिहालों को परोसी जा रही है , इसका भी एक दिलचस्प वाकया है । मैं एक गाँव में रहता हूँ ।वहाँ भी कुछ साल पहले एक निजी इंग्लिश मीडियम स्कूल खुल गया । अंग्रेजी में उसके साईनबोर्ड में हिज्जे की दो अशुद्धियाँ थीं । मैं व मेरी पत्नी इस पर चर्चा करते हुए स्कूल के सामने से गुजर रहे थे।शायद स्कूल वालों ने सुन लिया ।उन्होंने एक गलती तो सुधारी , लेकिन दूसरी अशुद्धि कई साल बाद आज भी मौजूद है । उन्हें वह समझ में नहीं आई । स्पष्ट है कि ऐसे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे कहीं के नहीं रहेंगे – न घर के , न घाट के ।

    सारे शिक्षाशास्त्री इस बात पर एकमत हैं कि शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही होनी चाहिए। लेकिन इसके ठीक विपरीत ,अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा का बोलबाला बढ़ता ही जा रहा है । यदि ऐसा ही चलता रहा , तो एक पूरी पीढ़ी तैयार हो जाएगी , जो न तो अपनी भाषा जानेगी , न विषयों का ठीक ज्ञान व समझ उसे हो पाएगी । अंग्रेजी के इस बढ़ते साम्राज्य का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि किसी प्रकार के मौलिक चिन्तन , अध्ययन या विमर्श की संभावनाएं बहुत कम रह जाती हैं । हम हर विषय में सिर्फ नकल और अनुकरण करते रहते हैं ।आज हर विषय में बुनियादी शास्त्र , ग्रन्थ और सिद्धान्त अंग्रेजी से ही आते हैं । भारतीय परिवेश और परिस्थिति के मुताबिक मौलिक ढंग से शास्त्रों को गढ़ने , ज्ञान को परिमार्जित करने और उसके व्यावहारिक प्रयोग(जैसे तकनालॉजी) को विकसित करने का काम उपेक्षित रह जाता है ।हम अपनी परम्परा , विरासत,संस्कृति और अपने इतिहास से भी कटते जाते हैं । आधुनिक होना जरूरी है,लेकिन सिर्फ नकल और गुलामी को आधुनिकता नहीं कहा जा सकता । आधुनिकता की जड़ें हमारी परम्परा और अतीत में होनी चाहिए। इन्हीं जड़ों को काटने का काम अंग्रेजी के माध्यम से हो रहा है । दुनिया का कोई भी देश एक विदेशी भाषा के माध्यम से प्रगति नहीं कर सका है ।

    कई भोले भारतवासी सोचते हैं कि अंग्रेजी पूरी दुनिया की भाषा है । वे सोचते हैं कि अंग्रेजी हमारे लिये पूरी दुनिया और सारे ज्ञान-विज्ञान के दरवाजे खोलती है । दुनिया में हम कहीं भी जाएँगे,तो अंग्रेजी से हमारा काम चल जाएगा ।लेकिन दुनिया का बहुत बड़ा हिस्सा है,जो अंग्रेजों का गुलाम नहीं रहा । वहाँ स्पैनिश,फ्रेंच,जर्मन,रूसी,अरबी,फारसी,चीनी,जापानी और पता नहीं कितनी भाषाएं चलती हैं।वहाँ अंग्रेजी वही सीखता है,जिसे किसी खास अध्ययन ,शोध या व्यापार के सिलसिले में उसकी जरूरत है या फिर जिसे भाषाएं सीखने का शौक है ।भारत की तरह पूरी आबादी पर अंग्रेजी नहीं थोपी जाती ।अंग्रेजी को एक भाषा या एक विषय के रूप में सीखना-सिखाना एक चीज है,और उसे शिक्षा,प्रशासन ,व्यापार और विचार-विमर्श के माध्यम के रूप में १०० करोड़ लोगों पर थोपना दूसरी चीज है ।

    अंग्रेजी के वर्चस्व के पक्ष में एक तर्क यह दिया जाता है कि इसने देश को जोड़कर रखा है । इसे हटा दिया ,तो राष्ट्रीय कामकाज और व्यवहार की भाषा क्या होगी ? हिन्दी व अन्य भाषाओं में टकराव बढ़ेगा, देश टूट जाएगा । यह एक और भ्रम है । पहली बात तो यह है कि देश में आखिर अंग्रेजी जानने-बोलने वाले लोग कितने हैं। मुश्किल से पाँच फीसदी। तो अंग्रेजी से जो एकता बनती है,वह ऊपर के पाँच फीसदी संभ्रान्त वर्ग की एकता होती है,देश की ९५ फीसदी जनता इस ‘एकता’ के बाहर रहती है ।बल्कि अंग्रेजी के कारण एक बड़ा नुकसान हो रहा है । भारत के शिक्षित बौद्धिक वर्ग का काम अंग्रेजी से चल जाता है,इसलिए एक-दूसरे की भारतीय भाषाएं सीखने और एक एक -दूसरे के साहित्य व परम्पराओं को समझने की जरूरत ही नहीं महसूस होती है ।आज यदि किसी भारतीय को द्रविड़ आंदोलन एवं पेरियार के बारे में जानना है या महाराष्ट्र के संत तुकाराम के बारे में जानकारी हासिल करनी है या कश्मीर की सूफी परम्परा का अध्ययन करना है या कर्नाटक के किसान आंदोलन को समझना है , तो वह अंग्रेजी में उपलब्ध सामग्री को खंगालता है और इन भाषाओं को सीखे-समझे बगैर , मूल सामग्रियों को पढ़े बगैर , उसका अध्ययन पूरा हो जाता है । यदि अंग्रेजी रूपी बिचौलिया न होता , तो भारतीय भाषाओं को सीधे आपस में सीखने-समझने और एक-दूसरे में सीधे अनुवाद का दौर चलता ।हम एक-दूसरे के ज्यादा नजदीक आते। राष्ट्रभाषा का सवाल भी तब हल हो जाता । इस दृष्टि से अंग्रेजी ने हमारी राष्ट्रीय एकता का बहुत निकसान किया है ।

    भारत के बच्चों पर अमानवीय अत्याचार करने , करोड़ों भारतवासियों को कुंठित करने , देश की प्रगति रोकने और देश का स्वाभिमान खतम करने वाली अंग्रेजी का कब्जा आज भी कायम है , तो इसके दो प्रमुख कारण हैं । एक तो भारतवासियों की गुलाम मानसिकता और दूसरा शासक वर्ग का निहित स्वार्थ ।अंग्रेजी का वर्चस्व बना रहने में मुट्ठी भर अंग्रेजीदां संभ्रान्त वर्ग का फायदा है । उनके और देश के बाकी जनसाधारण के बीच दीवार बनी रहती है,आम लोगों के आगे बढ़ने में अंग्रेजी का अवरोधक खड़ा रहता है और उनके विशेषाधिकार सुरक्षित रहते हैं । उनकी विशिष्ट स्थिति को चुनौती नहीं मिल पाती है । कुछ लोग ऊपर आते हैं, तो वे भी इस श्रेष्ठिवर्ग का हिस्सा बन जाते हैं ।

( जारी )

देखें : भाषा पर गाँधी

 

   

8 Responses to “गाय नहीं , ‘काऊ’ : ले . सुनील”


  1. 1 अतुल July 22, 2007 at 3:30 am

    पूर्णतः सहमत. मेरा उत्तर यहाँ पढ़िये:

    http://lakhnawi.blogspot.com/2005/05/blog-post.html

  2. 2 arun July 22, 2007 at 8:02 am

    दैट्स राईट्,ब्रोदर.

  3. 3 प्रियंकर July 22, 2007 at 11:17 am

    औपनिवेशिक अतीत और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की पीठ लदे दिखते प्रकाशमान (?)अमेरिकी भविष्य ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा . सांप-छछूंदर जैसी स्थिति है .

  4. 4 mamta July 22, 2007 at 2:07 pm

    बिल्कुल सही है आज हिंदी मे बात करने मे तो लोग बेइज्जती समझते है

  5. 5 yunus July 22, 2007 at 5:31 pm

    सच कहा आपने । आपको पता है मेरा एक मित्र डबिंग की दुनिया में है । वहां अकसर इस बात को लेकर संशय हो जाता है कि 89 को हिंदी में क्‍या पढ़ें । 69 को क्‍या और 59 को क्‍या । जब हर बार इस तरह के उसके फोन आने लगे तो मैंने उसे एक से सौ तक की गिनती हिंदी में लिखकर दी । जहां गड़बड़ हो इस शीट से पता कर लो किस संख्‍या को क्‍या कहते हैं । मुंबई में कई गायक गायिकाएं और अभिनेता-अभिनेत्रियां रोमन हिंदी में लिखकर संवाद याद करते हैं । कई शब्‍दों के तो अब अंग्रेज़ी प्रयोग ही चलते हैं, हिंदी प्रयोग तो गये । मुंबई में तो इस मामले में हद है । बच्‍चों को हिंदी के शब्‍द पता ही नहीं होते । उनके लिए सारे जानवर—काउ, डॉग हैं । चिडिया नहीं है बर्ड है । तीसरी नहीं है थर्ड है । परीक्षा नहीं है एक्‍ज़ाम है । और भी पता नहीं क्‍या क्‍या है ।

  6. 6 Sanjeet Tripathi July 22, 2007 at 7:06 pm

    सटीक!!
    साधुवाद!!

  7. 7 sanjay tiwari July 23, 2007 at 12:18 am

    पढ़े नहीं. लेकिन फोटो देखके तबियब प्रसन्न हो गयी. एकाध और जगह उलझा हूं लेकिन लौटकर पढूंगा जरूर, इसी विषय पर हम भी लिखते-पढ़ते रहते हैं.

  8. 8 अनुराग श्रीवास्तव July 23, 2007 at 7:33 am

    मेरी टिप्पणी देख कर आप चकित अवश्य हुये होंगे! :) लेकिन इतना सराहनीय लेख देख कर रुका नहीं गया.

    गर्जट!


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