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एक था चिड़ा और एक थी चिड़ी
एक नीम के दरख़्त पर उनका था घोंसला
बड़ा गहरा प्रेम था दोनों में
दोनों साथ घोंसले से निकलते
साथ चारा चुगते ,
या कभी-कभी चारे की कमी होने पर
अलग अलग भी उड़ जाते ।
और शाम को जब घोंसले में लौटते
तो तरह-तरह से एक-दूसरे को प्यार करते
फिर घोंसले में साथ सो जाते ।
एक दिन आया
शाम को चिड़ी लौट कर नहीं आई
चिड़ा बहुत व्याकुल हुआ ।
कभी अन्दर जा कर खोजे
कभी बैठ कर चारों ओर देखे ,
कभी उड़के एक तरफ, कभी दूसरी तरफ
चक्कर काट के लौट आवे ।
अँधेरा बढ़ता जा रहा था ,
निराश हो कर घोंसले में बैठ गया ,
शरीर और मन दोनों से थक गया था ।
उस रात को चिड़े को नींद नहीं आई
उस दिन तो उसने चारा भी नहीं चुगा
और बराबर कुछ बोलता रहा ,
जैसे चिड़ी को पुकार रहा हो ।
दिन-भर ऐसा ही बीता ।
घोंसला उसको सूना लगे,
इसलिए वहाँ ज्यादा देर रुक न सके
फिर अँधेरे ने उसे अन्दर रहने को मजबूर किया,
दूसरी भोर हुई ।
फिर चिड़ी की वैसी ही तलाश ,
वैसे ही बार-बार पुकारना ।
एक बार जब घोंसले के द्वार पर जा बैठा था
तो एक नयी चिड़ी उसके पास आकर बैठ गयी
और फुदकने लगी ।
चिड़े ने उसे चोंच से मार मार कर भगा दिया
फिर कुछ देर बाद चिड़ा उड़ गया
और उड़ता ही चला गया
उस शाम को चिड़ा लौट कर नहीं आया
वह घोंसला अब पूरा वीरान हो गया
और कुछ ही दिनों में उजड़ गया
कुछ तो हवा ने तय किया
कुछ दूसरी चिड़िया चोचों में
भर-भर के तिनके और पत्तियाँ
निकाल ले गयीं ।
अब उस घोंसले का नमोनिशां भी मिट गया
और उस नीम के पेड़ पर
चिड़ा-चिड़ी के एक दूसरे जोड़े ने
एक नया घोंसला बना लिया ।
- जयप्रकाश नारायण.
( मेरी जेल डायरी , ९ सितम्बर , १९७५ )

इससे यही शिक्षा मिलती है कि चिडा पुरातनपंथी था.तभी उसने (पुरानी जॊ छॊड कर चली गई) के जाने के बाद भी नई वाली को भगाया और अपना बसा बसाया घर बरबाद कर दिया,
उसे आजकल की नई पिक्चरे देखनी चाहिये थी..:)
तो जे पी कवि भी थे? धन्यवाद इस प्रस्तुति के लिए.
एक सुझाव.
ये अमरीकावाला झंडा तो हटा दिजीए अपने चिट्ठे से. कुछ बनारसी फोटृ-सोटू लगा दिया जाए.
बहुत अच्छी व शिक्षा प्रद बात है मगर आज इसका मौल कम ही लोग समझते है,सच्चा प्रेम कभी किसी के आने से विचलित नही होता,हर कष्ट सह कर भी वहीं रहता है मगर आज एसा नही है…वही बात है जो अरूण भाई कह रहे है…
सुनीता(शानू)
जय प्रकाश जी कविता पहली बार पढ़ी. मन भाव विभोर हो गया. आपको जितना साधुवाद कहूँ कम है.
क्या आज और क्या कल-प्रेम की परिभाषायें बदल सकती हैं, प्रेम के प्रति नज़रिया बदल सकता है-समझोतावाद के तहत अन्य बदलाव भी संभव हैं मगर सच्चे और पावन प्रेम की मान्यातायें और अर्थ कभी नहीं बदलते.
बहुत सुन्दर रचना है।सच्चा प्रेम आज कल कही नही दिखता।