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प्रविष्टी में आये नये अथवा कठिन शब्द : बालवाड़ी : प्राथमिक-पूर्व स्कूल , अन्वय : पद्य पंक्ति का गद्य-रूप ।
बालवाड़ी की प्रार्थना की एक पंक्ति हमें विचित्र लगती थी - ‘ विद्या बुद्धि कुछ नहीं पास’ । इस पंक्ति का अन्वय जो हमारी परेशानी का सबब था , यह था - ‘ विद्या - बुद्धि कुछ नहीं (चाहिए) , (हमे सिर्फ़) पास (कर दो)’ ।मानो शैशव की तालीम से यह विकृत हक़ीकत समझायी जा रही हो कि विद्या और बुद्धि नहीं चाहिए , पास होना जरूरी है ।
‘नारद’ के संचालकों और सलाहकारों का माहौल भी शिक्षा - व्यवस्था की इस विकृति से जुदा कैसे हो सकता है ? बुद्धि को ताक पर रख कर सिर्फ पास हो जाने की ललक यहाँ भी हावी है । येन-केन-प्रकारेण पास होने की ललक। तर्क , बुद्धि और विवेक के महत्व को बालवाड़ी से लगायत यहाँ तक नकारते रहने की छाप से निजात पाना बहुत मुश्किल हो जाता है।
राहुल के चिट्ठे को ‘नारद’ से रोकने के प्रकरण में नारद-संचालकों के फेल होने का ऐलान मानो कल अनूप ने अनहदनाद पर कर दिया है ।
एक तरफ़ अनूप अभय को यह समझाना चाहता है कि ब्लॉग संकलक नितान्त मशीनी माध्यम है। दूसरी ओर संजय बेंगाणी की प्रखर मेधा उसे असहाय महिला चिट्ठाकारों पर संभावित हमले की कल्पना से विचलित कर देती है । जगा देती है, एक संरक्षक पुरुष का अहम । मूछें तो समाज के इसी तबके में उगती हैं , मशीनों को भी नहीं उगतीं। सो मूछों का सवाल भी ऐसे ही दिमागों में उगता है।
यानी नितान्त-मशीनी संकलक साम्प्रदायिक नहीं हो सकता लेकिन पुरुषप्रधान मानसिकता का हो सकता है।अनूप, हम तो तकनीकी को भी विचार निरपेक्ष नहीं मानते। Technology और Ideology वाला पाठ , फिर कभी ।
संजय द्वारा सचेत किये जाने के पूर्व अनूप ने हम से कहा था कि राहुल द्वारा विवादित पेज हटाने तथा भाषा पर खेद प्रकट कर देने पर समाधान हो जाएगा। लेकिन महिला चिट्ठाकारों पर ‘संभावित हमले’ का गुरुतर भार उसी के कन्धों पर जो है ! ऐसे हमलों का मुकाबला करने की क़ुवत सामान्य चिट्ठेकारों(स्त्री और पुरुष) में आ जाएगी तब सागर चन्द नाहर का सुपरस्टार क्या करेगा ? मुकरी और केश्टो मुखर्जी वाले किरदार निभाएगा ?
हिन्दी चिट्ठेकारी में पुरुष-प्रधान मानसिकता से मुक्त चिट्ठेकारों की कमी नहीं है।इसीलिए सड़ी-गली मानसिकता पर चोट होगी और होती रहेगी ।
नैपकिन -विवाद के नाम से जाना गया विवाद(संजय बेंगाणी विवाद को यह नाम देते हैं) मुझे ‘पानी’ की तरफ जाता नहीं दिखायी दे रहा है। ‘द्वि-कंकडाणि’ की मजबूरियों में फँसता नजर आ रहा है - जहाँ न पानी है , न कागज ।
अनूप , हम परिणाम सुधारने के लिए अवसर देने में यक़ीन रख़ते हैं ।

समदर्शी होना जरूरी है।
बस अब बहुत हुआ दादा अब आप भी छोडो ना दुसरे बहुत मुद्दे है जहा मे…:)
आपकी बात में दम है . पर यहां किस-किस का कहें कि जुर्म कम है .
अमिताभ को मौका दीजिए ताकि वह मुकरी-केश्टो न बने ‘सुपर स्टार’ ही बना रहे .
यहां बड़ी गंभीर बाते हो रही हैं, फिर आते हैं.