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रिश्ते की खोज
मैंने तुम्हारे दुख से अपने को जोड़ा
और -
और अकेला हो गया ।
मैंने तुम्हारे सुख से
अपने को जोड़ा
और -
और छोटा हो गया ।
मैंने सुख-दुख से परे
अपने को तुम से जोड़ा
और -
और अर्थहीन हो गया ।
-सर्वेश्वरदयाल सक्सेना (’जंगल का दर्द’,राजकमल प्रकाशन)
तुलना
गडरिये कितने सुखी हैं ।
न वे ऊँचे दावे करते हैं
न उनको ले कर
एक दूसरे को कोसते या लड़ते-मरते हैं।
जबकि
जनता की सेवा करने के भूखे
सारे दल भेडियों से टूटते हैं।
ऐसी-ऐसी बातें
और ऐसे शब्द सामने रखते हैं
जैसे कुछ नहीं हुआ है
और सब कुछ हो जाएगा ।
जबकि
सारे दल
पानी की तरह धन बहाते हैं,
गडरिये मेडों पर बैठे मुस्कुराते हैं
– भेडों को बाड में करने के लिए
न सभाएँ आयोजित करते हैं
न रैलियाँ,
न कंठ खरीदते हैं, न हथेलियाँ,
न शीत और ताप से झुलसे चेहरों पर
आश्वासनों का सूर्य उगाते हैं,
स्वेच्छा से
जिधर चाहते हैं ,उधर
भेडों को हाँके लिए जाते हैं ।
गडरिये कितने सुखी हैं ।
-दुष्यन्त कुमार (’जलते हुए वन का वसन्त’,अनादि प्रकाशन ,६०९ कटरा,इलाहाबाद)

अच्छी कवितायें हैं!
जनता की सेवा करने के भूखे
सारे दल भेडियों से टूटते हैं।
Kitna sahi kaha hai!