रिश्ते की खोज : सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, तुलना :दुष्यन्त

Technorati tags: ,

रिश्ते की खोज

मैंने तुम्हारे दुख से अपने को जोड़ा

और -

और अकेला हो गया ।

मैंने तुम्हारे सुख से

अपने को जोड़ा

और -

और छोटा हो गया ।

मैंने सुख-दुख से परे

अपने को तुम से जोड़ा

और -

और अर्थहीन हो गया ।

-सर्वेश्वरदयाल सक्सेना (’जंगल का दर्द’,राजकमल प्रकाशन)

तुलना

गडरिये कितने सुखी हैं ।

न वे ऊँचे दावे करते हैं

न उनको ले कर

एक दूसरे को कोसते या लड़ते-मरते हैं।

जबकि

जनता की सेवा करने के भूखे

सारे दल भेडियों से टूटते हैं।

ऐसी-ऐसी बातें

और ऐसे शब्द सामने रखते हैं

जैसे कुछ नहीं हुआ है

और सब कुछ हो जाएगा ।

जबकि

सारे दल

पानी की तरह धन बहाते हैं,

गडरिये मेडों पर बैठे मुस्कुराते हैं

– भेडों को बाड में करने के लिए

न सभाएँ आयोजित करते हैं

न रैलियाँ,

न कंठ खरीदते हैं, न हथेलियाँ,

न शीत और ताप से झुलसे चेहरों पर

आश्वासनों का सूर्य उगाते हैं,

स्वेच्छा से

जिधर चाहते हैं ,उधर

भेडों को हाँके लिए जाते हैं ।

गडरिये कितने सुखी हैं ।

-दुष्यन्त कुमार (’जलते हुए वन का वसन्त’,अनादि प्रकाशन ,६०९ कटरा,इलाहाबाद)

2 Responses to “रिश्ते की खोज : सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, तुलना :दुष्यन्त”


  1. 1 अनूप शुक्ल July 9, 2007 at 7:18 pm

    अच्छी कवितायें हैं!

  2. 2 khadaksingh July 12, 2007 at 10:32 pm

    जनता की सेवा करने के भूखे
    सारे दल भेडियों से टूटते हैं।
    Kitna sahi kaha hai!


www.blogvani.com