Entries from July 2007

July 30, 2007

बचपन की कुछ यादें

Technorati tags: शैशव, संगीत
    अभय तिवारी ने हाल ही में ‘ बीटल्स ‘ और उनके एक गीत का सुन्दर परिचय दिया है । शैशव की कुछ यादें ताज़ा हो गयीं ।
    एक सब्जी बेचने वाली मुझे ‘ पेट – पोछनू ‘ कहती थी । वह बाजार में पटरी पर सब्जी बेचने के अलावा घर – [...]

July 24, 2007

महारानी अंग्रेजी , दासी हिन्दी : ले. सुनील

Technorati tags: अंग्रेजी का आधिपत्य, angreji ka adhipatya
[लेख का प्रथमार्ध यहाँ है । ]
    वैश्वीकरण के इस दौर में अंग्रेजी और हिन्दी का संकरन करके ‘हिन्दलिश’ या हिन्गलिश को प्रचलित करने की कोशिश की जा रही है । हमारे हिन्दी चैनलों , पत्रिकाओं और अखबारों में इसकी झांकी देखी जा सकती है । विज्ञापनों में [...]

July 24, 2007

विफलता : शोध की मंजिलें : जयप्रकाश नारायण

जीवन विफलताओं से भरा है ,
सफलताएँ जब कभी आईं निकट ,
दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से ।
 
तो क्या वह मूर्खता थी ?
नहीं ।
 
सफलता और विफलता की
परिभाषाएँ भिन्न हैं मेरी !
 
इतिहास से पूछो कि वर्षों पूर्व
बन नहीं सकता प्रधानमन्त्री क्या ?
किन्तु मुझ क्रान्ति-शोधक के लिए
कुछ अन्य ही पथ मान्य थे , उद्दिष्ट थे,
पथ त्याग के [...]

July 21, 2007

गाय नहीं , ‘काऊ’ : ले . सुनील

Technorati tags: english, dominence, hindi
हिन्दी भाषियों पर अंग्रेजी की सवारी
    यह वाकया इन्दौर का है , जहाँ मेरे चाचा रहते हैं । मेरा चचेरा भाई अपनी कार से मुझे बस स्टैण्ड तक छोड़ने आया । घर से निकलते वक्त उसकी दो साल की बिटिया भी साथ चलने को मचल गई । उसे भी साथ लेना [...]

July 20, 2007

एक चिड़ा और एक चिड़ी की कहानी : जेपी

Technorati tags: jp.poem, prison diary
एक था चिड़ा और एक थी चिड़ी
एक नीम के दरख़्त पर उनका था घोंसला
बड़ा गहरा प्रेम था दोनों में
दोनों साथ घोंसले से निकलते
साथ चारा चुगते ,
या कभी-कभी चारे की कमी होने पर
अलग अलग भी उड़ जाते ।
और शाम को जब घोंसले में लौटते
तो तरह-तरह से एक-दूसरे को प्यार करते
फिर घोंसले में [...]

July 11, 2007

विद्या – बुद्धि कुछ नहीं ‘पास’

Technorati tags: blog ban, narad
प्रविष्टी में आये नये अथवा कठिन शब्द : बालवाड़ी : प्राथमिक-पूर्व स्कूल , अन्वय : पद्य पंक्ति का गद्य-रूप ।
    बालवाड़ी की प्रार्थना की एक पंक्ति हमें विचित्र लगती थी – ‘ विद्या बुद्धि कुछ नहीं पास’ । इस पंक्ति का अन्वय जो हमारी परेशानी का सबब था , यह था – ‘ विद्या [...]

July 9, 2007

रिश्ते की खोज : सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, तुलना :दुष्यन्त

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रिश्ते की खोज
मैंने तुम्हारे दुख से अपने को जोड़ा
और -
और अकेला हो गया ।
मैंने तुम्हारे सुख से
अपने को जोड़ा
और -
और छोटा हो गया ।
मैंने सुख-दुख से परे
अपने को तुम से जोड़ा
और -
और अर्थहीन हो गया ।
-सर्वेश्वरदयाल सक्सेना (‘जंगल का दर्द’,राजकमल प्रकाशन)

तुलना
गडरिये कितने सुखी हैं ।
न वे ऊँचे दावे करते हैं
न उनको ले [...]

July 3, 2007

चौराहे पर रुकने की बात : कविताएँ

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एक छोटी-सी बात
अनकही ।
अभी – अभी नहीं सूझी -
लेकिन दबी रही ।

साथ चलने की बात -
दूर तक साथ चलने की बात
या
क़रीब ही कहीं जा कर,
साथ बैठ जाने की बात

जताने की बात
और जानने की बात,
पिछड़ने या बढ़ने की बात,
एक चौराहे की बात ।

चौराहे से
बाहों की तरह निकले अलग-अलग रास्ते।
एक ही रास्ते [...]